अंबेडकर को समझने की शर्त

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

 

यह ठीक है कि भारतीय समाज ने विदेशी शासन को कभी चुपचाप बैठकर स्वीकार नहीं किया, परंतु मूल प्रश्न यह है कि आखिर इतना बड़ा समाज मुट्ठीभर आक्रांताओं से पराजित कैसे हो जाता था? अलग-अलग महापुरुषों ने इन कारणों की खोजबीन अपने-अपने ढंग से की और जाहिर है कि उन्होंने अपने-अपने उत्तर भी तलाशे। अंबेडकर भी इसी मार्ग के पथिक थे। उन्होंने भारत की पराजय का मुख्य कारण यहां की जाति व्यवस्था को माना...

भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन को जिन्होंने नई दिशा दी, ऐसे डा. भीमराव अंबेडकर का समग्र मूल्यांकन अभी भी नहीं हुआ है। उनका व्यक्तित्व विशाल था और अध्ययन का क्षेत्र अति विस्तृत था। लेकिन यह देश का दुर्भाग्य ही कहना होगा कि अंबेडकर अंततः अपनी पहचान के लिए केवल दलित नेता के रूप में ही स्थापित हो गए। यह बाबा साहिब अंबेडकर के व्यक्तित्व के साथ सचमुच अन्याय ही कहा जाएगा। किसी के व्यक्तित्व और चिंतन को समझने के लिए जरूरी है कि वह जिस रास्ते पर चलकर गया है, उसी के पदचिन्हों का पीछा किया जाए। उसी रास्ते से जाकर उसके लिखे की व्याख्या की जा सकती है, लेकिन परिस्थितिजन्य सुख-दुख की अनुभूति हर व्यक्ति की निजी होती है। इसी से चिंतन परिपक्व होता है। परंतु एक व्यक्ति के सुख-दुख की अनुभूति को दूसरा कैसे अनुभव कर सकता है? वह ज्ञान के स्तर पर उसे यथासंभव समझने का प्रयास तो कर सकता है, लेकिन केवल पढ़कर या देखकर स्वयं अपने भीतर उसकी अनुभूति हो जाए, यह कठिन है, खासकर जब मामला स्पृश्य और अस्पृश्य के भीतर का हो। व्यवहार के स्तर पर समाज में अस्पृश्य होने की वेदना को कोई स्पृश्य समाज का व्यक्ति, चाहे वह कितना ही संवेदनशील क्यों न हो, अनुभव कर सकता है क्या? इस अनुभव के लंबे दरिया को पार करके ही अंबेडकर के चिंतन को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। दरिया को पार करने के भी दो तरीके हैं। पहला भोक्ता होने का और दूसरा दृष्टा होने का। ‘जाके पैर न फटी विआई, सो क्या जाने पीर पराई’। देखी हुई आग और भोगी हुई आग में जमीन आसमान का अंतर आ जाता है। अंबेडकर का किस्सा भोगी हुई आग का था और उनको समझने का दावा करने वालों में से अधिकांश का किस्सा आग को देखने वालों का ही है, लेकिन अंबेडकर के चिंतन के मामले में एक और बात का ध्यान रखना भी जरूरी है। सामाजिक अस्पृश्यता का जो दरिया वह पार करके आए थे, उसके बाद भी उनके चिंतन की पृष्ठभूमि में क्रोध और बदले की भावना हो सकती थी। खासकर उनके प्रति जिन्होंने अंबेडकर की दृष्टि में अस्पृश्यता की यह आग जला रखी है, लेकिन अंबेडकर  के चिंतन में कहीं भी क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती। वहां संतुलन विद्यमान है। यह उनकी अपनी साधना का सफल ही कहा जा सकता है। इसलिए भीमराव अंबेडकर  के चिंतन और दृष्टि को समझने के लिए कुछ बिंदु ध्यान में रखना जरूरी हैं। सबसे पहले तो यह कि वह अपने चिंतन में कहीं भी दुराग्रही नहीं हैं, उनके चिंतन में जड़ता नहीं है। वह निरंतर अपने अनुभव और ज्ञान से सीखते रहे और अपने अनुभवजन्य ज्ञान के आधार पर अपने निष्कर्षों को परिष्कृत करते रहे। अंबेडकर ने अपने लिए एक बार इमर्सन को उद्धृत किया था, ‘विचारों की स्थिरता गधे का गुण है और मुझे अपने आप को गधा बनाना अभीष्ट नहीं है। केवल सातत्य के लिए किसी भी विचारशील प्राणी को एक ही मत से नहीं बंधे रहना चाहिए। अमूर्त सातत्य की अपेक्षा मूर्त परिस्थिति ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और मनुष्य को सीखी हुई बात को भूलना भी जरूरी है। एक जिम्मेदार आदमी में पुनर्विचार करने और अपने विचारों को बदलने का साहस होना चाहिए। जरूरी बात यह है कि विचारों की अंतिमता को बदलने के लिए अच्छे और पर्याप्त कारण होने चाहिएं।’ (1)अंबेडकर को सरसरी तौर पर पढ़ने पर अनेक स्थानों पर हिंदुओं के प्रति गुस्सा दिखाई देता है। यद्यपि यह तार्किक गुस्सा है, परंतु वह मोटे तौर पर समग्र हिंदू समाज के लिए नहीं, बल्कि सवर्ण समाज के लिए ही है। उन्होंने जगह-जगह अपने लेखन में हिंदू अथवा हिंदुओं इत्यादि शब्दों का प्रयोग किया है, लेकिन ज्यादातर ये दोनों रूढि़वादी सवर्णों के अर्थ में ही प्रयोग किए गए हैं। अंबेडकर अपने निष्कर्षों में सुधार के लिए सदा तत्पर रहते थे। हिंदू समाज में जाति की उत्पत्ति का अपना सिद्धांत उन्होंने पच्चीस साल की उम्र में प्रतिपादित किया था, लेकिन उसी समय उन्होंने यह घोषणा भी की थी, मुझे इस बात पर गर्व है कि मैंने जाति प्रथा पर एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है, परंतु यदि यह आधारहीन लगेगा, तो मैं इसे तिलांजलि दे दूंगा। (2) चिंतन जगत में यही प्रवृत्ति गतिशीलता कहलाती है। प्रगति का यही आधारभूत लक्षण है। अंबेडकर ज्ञान और निष्कर्षों के मामले में प्रगतिशील थे। प्रगतिशील का अर्थ हिंदी साहित्य में प्रचलित मुहावरों से नहीं, जिसमें प्रगतिशीलता को साम्यवादी के अर्थ में जाना जाता है। इसका अर्थ है कि जब उन्हें कोई नई जानकारी मिलती थी, तो उसके प्रकाश में वह अपने पुराने विचार को बदलते या संशोधित कर लेते थे। कोई कितना भी योग्य क्यों न हो, यदि उसके विचार, निष्कर्ष अंबेडकर को प्रभावित नहीं कर सकते, तो वह उनको सार्वजनिक रूप से तुरंत नकार देते थे। डा. भीमराव अंबेडकर अंगे्रजों के विरुद्ध संघर्षकाल के ऐसे युग पुरुष थे, जिन्होंने नए सिरे से भारतीय अथवा हिंदू समाज को संगठित करने का कार्य किया। उस युग में अनेक महापुरुष भारतीय समाज की भीतरी कमजोरियों को लेकर चिंतित थे और उसके निराकरण के लिए प्रयत्नशील भी। भारतीय समाज, जिसको एक लंबे अरसे से विदेशी आक्रांता पद्दलित करते रहे थे, किन कारणों से पराजित होता रहा है, इसके कारण की मीमांसा अनेक स्तरों पर होने लगी थी। यह ठीक है कि भारतीय समाज ने विदेशी शासन को कभी चुपचाप बैठकर स्वीकार नहीं किया और सतत संघर्ष में लगा रहा, परंतु मूल प्रश्न यह है कि आखिर इतना बड़ा समाज मुट्ठीभर आक्रांताओं से पराजित कैसे हो जाता था? अलग-अलग महापुरुषों ने इन कारणों की खोजबीन अपने-अपने ढंग से की और जाहिर है कि उन्होंने अपने-अपने उत्तर भी तलाशे। अंबेडकर भी इसी मार्ग के पथिक थे। उन्होंने भारत की पराजय का मुख्य कारण यहां की जाति व्यवस्था को माना। इस व्यवस्था ने देश के बहुत बडे़ वर्ग को शस्त्र धारण करने के अधिकार से ही वंचित कर दिया। यही कारण था कि वह भारत के भविष्य की कामना करते हुए जाति-विहीन समाज का सपना देखते थे और उसके लिए क्रियात्मक संघर्ष करते थे।

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