Saturday, January 25, 2020 11:36 PM

अगर शहरों में मिले कम खाना, तो जिद्द होगी कम

बंदरों को मारना समस्या का हल नहीं; एचपीयू के शोधकर्ताओं का दावा, बंदर मारने से बिगडे़गी पर्यावरण श्रृंखला

शिमला-सावधान हो जाइए, बंदरों को मारने से आपकी समस्या हल नहीं होगी। एचपीयू के शोधकर्ताओं ने बंदरों को मारने पर चुनौती दे डाली है। शोधकर्ताओं का मानना है कि शिमला सहित अगर हिमाचल में दवाई देकर या किसी और तरीके से बंदरों को मारा जाता है, तो इससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाएगा। जी हां यह हम नहीं बोल रहे हैं, यह खुलासा एचपीयू के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की रिसर्च में हुआ है। विश्वविद्यालय में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर अरविंद भट्ट ने कहा कि अगर शिमला में बंदरों को मारा जाता है, तो इससे पर्यावरण की श्रंखला बिगड़ जाएगी, जिससे मानव जीवन पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि अगर बंदरो के आतंक से बचना है, तो इसका एक ही समाधान है कि लोग गीला और सूखा कूड़ा अलग-अलग फेंके। वहीं, कूड़े का निष्पादन खुले में न कर सही जगह किया जाए, ताकि बंदर शहरों में न आकर जंगलों में ही रहें, इससे पर्यावरण की बिगड़ती तस्वीर को बदला जा सकता है। प्रोफेसर अरविंद भट्ट का कहना है कि अगर शिमला में भी बंदरों को मारा जाता है, तो इससे शहर की बिगड़ रहे पर्यावरण पर और भी बुरा असर पड़ जाएगा। उनका मानना है कि बंदरों को मारने से पर्यावरण की श्रृखंला तहस नहस हो जाएगी। यानी इसका प्रभाव जहां जंगलों की रौनक कम करेगा, वहीं मानव जीवन पर इसका बुरा असर पड़ेगा। मानव जीवन पर प्रभाव पड़ने का सबसे बड़ा कारण यह होगा कि प्राकृतिक रूप से खेतों व जंगलों मंे उगाए जाने वाले वेजिटेबल में जहर मिल जाएगा। एचपीयू के जैव प्रोद्योगिकी विभाग के शोध में यह भी खुलासा हुआ है कि अगर बंदरों को शहरों में खाने के लिए ज्यादा मात्रा में खाद्य पदार्थ न मिलंे, तो इससे वे शहरों को छोड़ जंगलों में ज्यादा रहेंगे। हैरानी है कि बंदरों के खूंखार होने का कारण यह भी है कि उन्हें शहरों में खाने के लिए ज्यादा मात्रा में खाना मिल रहा है। इस वजह से अब उनका व्यवहार भी ऐसा हो चुका है कि वह किसी के हाथ में भी खाना देखते हैं, तो झपट उठते हैं। फिलहाल इस मामले पर शोधकर्ताओं की दो टूक है कि बंदरों को जंगलों की ओर भेजना है, तो इसके लिए जरूरी है कि लोग खुद सतर्क हो जाएं।

दवा देकर मारने से फसलों में जहर

शोधकर्ताओं का कहना है कि शहरों व गांव में बंदरों को दवाई देकर मारा जा रहा है, जिससे इन बंदरों को मार कर जंगलों में फेंका जा रहा है। इससे पर्यावरण को तो नुकसान हो ही रहा है, इसके साथ ही प्राकृतिक रूप से उगाई जाने वाली वेजिटेबल व अन्य फसलों में भी जहर घुल रहा है।