Monday, June 01, 2020 02:18 AM

अदालत तक लॉकडाउन

कोरोना संकट मानवीय आचरण के कई पैबंद उतार कर साबित कर रहा है कि आधुनिकता में प्रभावशाली होने के लिए व्यवस्थाएं, किस तरह व्यवहार करने लगी हैं और एक छदम वैल्यू सिस्टम के इर्द-गिर्द हम नकाब पहन कर घूम रहे थे। कोरोना काल भले ही परिदृश्य की चीख में अनिश्चितता की सूचना है, लेकिन यह समयावधि उन व्यवस्थाओं को घूर रही है जिन पर इतराते हमारे चरित्र ने कई दुर्ग खड़े कर लिए थे। ये दुर्ग कानून व्यवस्था की एक ऐसी सोहबत में खड़े हो गए हैं, जहां न्याय की परिभाषा इसे हासिल करने की परिकल्पना है। जाहिर है लॉकडाउन के सामने सामान्य अदालती मसले भी घूंघट पहन कर बैठ गए या देश-प्रदेश की सामाजिक -आर्थिक व्यवस्था ने कानून को चादर ओढ़ा दी। हिमाचल का ही जिक्र करें तो कानून-व्यवस्था के सामने सामाजिक विषय आसान हैं, लेकिन जहां अदालत एक आदत की तरह हर विषय में विषाद चुनती है तो आंकड़े बढ़ जाते हैं, फिर भी यहां अदालती मामलों का निपटारा तुलनात्मक दृष्टि से बेहतर आंका गया है। राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल ज्यूडीशियल डाटा ग्रिड के अनुसार लटके मामलों की तादाद के कुल तीन करोड़ में से 86 फीसदी निचली अदालतों में चल रहे हैं। बहरहाल अदालतों में लॉकडाउन का असर इस दृष्टि से देखना होगा कि जीवन के ऐसे संकट में मानवीय व्यवहार पुनः किस पटरी पर बैठता है। यानी कोरोना महामारी ने जिस तरह कानून की डिस्टेंसिंग की है, उसे देखते हुए क्या आइंदा इसकी शक्ल बदलेगी। क्या जनता अपने कानूनी पचड़े कम करेगी या अदालत से पहले मानवीय व्यवहार की समीक्षा में अदालती आदत घट जाएगी। जो भी हो इसका एक असर वकालत के प्रोफेशन में सीधे तौर पर आंका जा रहा है। देश भर में करीब बीस लाख वकीलों के लिए अदालती लॉकडाउन का अर्थ रोजी-रोटी के पेशेवर तर्क तो हैं ही,साथ में भविष्य की तड़प भी। कोरोना से निपटते-निपटते देश के आर्थिक व वित्तीय दबाव सभी पेशों पर रहेंगे, तो इसका एक अर्थ न्याय की परंपराओं में भी मिलेगा। कानूनी विषयों की प्राथमिकता घटती है, तो कई मामले अब वरिष्ठतम के बजाय कनिष्ठ वकीलों के लिए नई संभावना बन सकते हैं। जाहिर है भारी फीस के आधार पर कानूनी सफलता की तलाश अब नहीं रहेगी, जबकि प्रोफेशन में नए चेहरों को अपनी क्षमता के आधार पर सारी प्रक्रिया को सरल व सस्ती दरों पर सक्षम बनाने का अवसर उपलब्ध होगा। हिमाचल के परिप्रेक्ष्य में कानूनी प्रोफेशन इस वक्त कठिन दौर में है। कुल 7921 पंजीकृत वकीलों के साथ हिमाचल का अदालती परिदृश्य राज्य की कानूनी  ताकत है, लेकिन पूरे संचालन में इसके भीतर रोजगार की क्षमता भी है। पिछले पांच सालों में 1770 नए वकील सामने आए हैं और अगर कानूनी शिक्षा के मध्य भविष्य देखा जाए तो यह रफ्तार आगे बढ़ने का एक मार्ग प्रशस्त करती है। हिमाचल में कानून के प्रति जागरूकता ने 7921 वकीलों को प्रोफेशनल बनाया है, जबकि इसके मुकाबले जम्मू-कश्मीर में 5951 एडवोकेट ही सक्रिय हैं। बहरहाल लॉकडाउन की वजह से प्रदूषण की अनेक परतें हटी हैं और लोगों ने जालंधर से धौलाधार पर्वत श्रृंखलाओं का नया स्वरूप देखा है। इसी तरह की अपेक्षा हर प्रोफेशन के बीच खड़ी परतों को हटा कर नए सिरे से देखने की पनप रही है। अब बाजार भी खुले हैं, तो ग्राहक व उपभोक्ता के बीच एक नया रिश्ता तथा विश्वास कायम हो रहा है। कोरोना वारियर की नई संज्ञा में डाक्टर, पुलिस कर्मी, सफाई कर्मी तथा मीडिया कर्मी अपने-अपने आचरण की बदौलत संकट की इस घड़ी के बीच लक्ष्य, संकल्प, मर्यादा और सामाजिक विश्वास को ऊंचा कर रहे हैं। कुछ इसी तरह अब कानून को नए परिप्रेक्ष्य में देखने, समझने और आत्मसात करने की जरूरत है। लॉकडाउन के बीच अगर सामाजिक मसले अपनी सीमित परिधि चुन सकते हैं, तो कोरोना काल के बाद भी कानून के सामने मानव को फिर से ताकतवर होना है। कानून के प्रति सामाजिक आस्था को इसके साथ जुड़े प्रोफेशन का विश्वास चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे लॉकडाउन की बंदिशों ने पर्यावरण को फिर से चमका दिया।