अध्यात्म के बिना जीवन

श्रीश्री रवि शंकर

यदि शरीर में कोई पोषक तत्त्व नहीं हो, तो शरीर में इसकी कमी हो जाती है। इसी तरह आत्मा भी है। आत्मा सुंदर, सत्य, आनंद, सुख, प्रेम और शांति है। मेरे अनुसार अध्यात्म वह है, जिससे ये सारे गुण बढ़ते हैं और सीमाएं खत्म हो जाती हैं…

प्रेम सभी नकरात्मक भावनाओं का जन्म दाता है। जिनको उन्मत्तता से प्रेम होता है वे शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं। वे सब कुछ उत्तम चाहते हैं। वे हर चीज में पूर्णता ढूंढते हैं। ईर्ष्या प्रेम के कारण होती है। आप किसी से प्रेम करते हो, तो ईर्ष्या भी आती है। लालच आता है, जब आप लोगों की बजाय वस्तुओं को अधिक चाहते हो। जब आप अपने आप को बहुत ज्यादा प्रेम करते हो, तो अभिमान बन जाता है। अभिमान अपने आप को विकृत रूप से प्रेम करना है। इस ग्रह पर कोई एक भी ऐसा नहीं है, जो प्रेम नहीं चाहता और प्रेम से अलग रहना चाहता हो। फिर भी हम प्रेम के साथ आने वाले दुःख को नहीं लेना चाहते। ऐसी अवस्था कैसे प्राप्त की जा सकती है। अपने अस्तित्व और आत्मा को शुद्ध करके जो कि अध्यात्म द्वारा ही संभव है। हम पदार्थ और आत्मा दोनों से बने हैं। हमारे शरीर को विटामिन की आवश्यकता होती है। यदि शरीर में कोई पोषक तत्त्व नहीं हो, तो शरीर में इसकी कमी हो जाती है। इसी तरह आत्मा भी है। आत्मा सुंदर, सत्य, आनंद, सुख, प्रेम और शांति है। मेरे अनुसार अध्यात्म वह है, जिससे ये सारे गुण बढ़ते हैं और सीमाएं खत्म हो जाती हैं। हम अपने बच्चों और युवाओं की इस आध्यात्मिक तरीके से परवरिश कर सकते हैं। आजकल कालेज कैंपस में हिंसा आम बात हो गई है। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है। यदि वहां हिंसा है, तो वहां मूलरूप में कुछ गलत है। स्कूल और कालेजों में शांति, खुशी, उत्सव और आनंद लाना होगा, पर अगर हम स्वयं दुःख में हैं, तो यह संभव नहीं होगा। पहले हमें अपने दुःख की ओर ध्यान देना होगा। यह कैच 22 की तरह है। यदि आप खुश नहीं हो, तो आप दूसरों को खुश करने के लिए कुछ नहीं कर सकते। आप कैसे खुश हो सकते हो। खुश रहने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है। दुखी होने के लिए एक तरीका है। यदि आप हर समय केवल अपने बारे में सोचते रहोगे, मेरा क्या होगा, तो आप उदास हो जाओगे। हमें अपने आप को किसी सेवा परियोजना में व्यस्त रखने और आध्यात्मिक अभ्यास की आवश्यकता है, जिससे नकारात्मक भाव खत्म होते हैं। इससे हमारा अस्तित्व शुद्ध होता है, भाव में खुशी आती है और सहज ज्ञान प्राप्त होता है। अंतर्ज्ञान आवश्यक है, यदि आप कोई व्यापारी हो, तो आपको किस शेयर में पैसे लगाए जाएं, यह जानने के लिए अंतर्ज्ञान की आवश्यकता होगी। यदि आप कोई कवि हो या साहित्य से संबंध रखते हो, तो भी आपको अंतर्ज्ञान की जरूरत होगी। यदि आप डाक्टर हो, तो आप को अंतर्ज्ञान की जरूरत होगी। डाक्टर दवाई का सुझाव केवल अवलोकन के आधार पर ही नहीं देते। उसमें किसी और कारण का योगदान भी होता है अंतर्ज्ञान। अंतर्ज्ञान तब आ सकता है, जब हम अपने भीतर जाते हैं। बिना अंतर्ज्ञान और अध्यात्म के जीवन नीरस है। हम प्रार्थना करते हैं परंतु उस स्रोत से संपर्क में नहीं होते।

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