Wednesday, September 18, 2019 05:14 PM

अनुकूल, अच्छे शहरों की जरूरत

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

 

दुनियाभर के 140 शहरों के सर्वेक्षण में नई दिल्ली छह स्थान फिसलकर 118वें पायदान पर तथा मुंबई दो स्थान फिसलकर 119वें पायदान पर आ गया है। जिन पैमानों पर विवेचना की गई है उनमें स्थिरता, संस्कृति, परिवेश, स्वास्थ्य सेवा, मूलभूत ढांचा और शिक्षा क्षेत्र को शामिल किया गया है। ईआईयू के अनुसार मुंबई रैकिंग में दो स्थान फिसल गया है। गौरतलब है कि इस सूची में आस्ट्रिया का वियना लगातार दूसरी बार पहले स्थान पर रहा है...

इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ‘ईआईयू’ के द्वारा चार सितंबर को प्रकाशित जीवन अनुकूलता सूचकांक ‘लिवेबिलिटी इंडेक्स’ में कहा गया है कि नई दिल्ली और व्यावसायिक राजधानी मुंबई जीवन की विभिन्न अनुकूलताओं और रहने की बेहतर योग्यता के मामले में पहले की तुलना में पीछे हो गए हैं। दुनियाभर के 140 शहरों के सर्वेक्षण में नई दिल्ली छह स्थान फिसलकर 118वें पायदान पर तथा मुंबई दो स्थान फिसलकर 119वें पायदान पर आ गया है। जिन पैमानों पर विवेचना की गई है उनमें स्थिरता, संस्कृति, परिवेश, स्वास्थ्य सेवा, मूलभूत ढांचा और शिक्षा क्षेत्र को शामिल किया गया है। ईआईयू ने कहा है कि सांस्कृतिक क्षेत्र के अंक में गिरावट के कारण मुंबई रैकिंग में दो स्थान फिसल गया है। वहीं सांस्कृतिक, पर्यावरण स्कोर और अपराध दर में वृद्धि के कारण स्थिरता स्कोर में गिरावट से सूचकांक में नई दिल्ली की स्थिति कमजोर हुई है।

गौरतलब है कि इस सूची में आस्ट्रिया का वियना लगातार दूसरी बार पहले स्थान पर रहा है। अध्ययन में कहा गया है कि दुनिया के रहने लायक शहरों में कुल मिलाकर एशियाई शहरों का प्रदर्शन औसत से नीचे है। पपुआ न्यू गिनी का पोर्ट मोर्सबी 135वें, पाकिस्तान का कराची 136वें और बांग्लादेश का ढाका 138वें स्थान के साथ रहने के लिहाज से सबसे कम उपयुक्त 10 शहरों में शामिल हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार नई दिल्ली को कुल मिलाकर 563 अंक मिले हैं, जबकि मुंबई ने 562 अंक अर्जित किए। शीर्ष स्थान पर काबिज वियना को 991 अंक मिले हैं। निश्चित रूप से हमारे प्रमुख शहरों में जीवन अनुकूलता संबंधी चुनौतियों के कारण हमारे शहर रहने योग्य बेहतर शहरों की सूची में पीछे हुए हैं। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि आने वाले वर्षों में बढ़ते हुए वैश्वीकरण के कारण अच्छे रहने वाले शहरों की वैश्विक कारोबारी उपयोगिता बढ़ेगी।

पिछली कुछ वैश्विक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तेजी से विकसित होते हुए नए शहरों का लाभप्रद परिदृश्य दिखाई देगा। विश्व के प्रतिष्ठित थिंकटैंक आक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के द्वारा पिछले दिनों प्रकाशित दुनिया के 780 बड़े और मझोले शहरों की बदलती आर्थिक तस्वीर और आबादी की बदलती प्रवृत्ति को लेकर प्रकाशित की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि 2019 से 2035 तक दुनिया के शहरीकरण में काफी बदलाव देखने में आएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय दुनिया के अधिकांश विकसित शहर जैसे न्यूयार्क, टोक्यो, लंदन, लास एंजिलिस, बीजिंग, पेरिस, दिल्ली, मुंबई तथा कोलकाता दुनिया में अपना दबदबा बनाए रखेंगे। लेकिन तेजी से विकसित होते हुए नए वैश्विक शहरों की रफ्तार के मामले में टॉप के 20 शहरों में से पहले 17 शहर भारत के होंगे और उनमें भी सबसे पहले दस शहर भारत के ही होंगे। पहले 10 शहरों में  सूरत, आगरा, बंगलुरू, हैदराबाद, नागपुर, त्रिपुरा, राजकोट, तिरुचिरापल्ली, चेन्नई और विजयवाड़ा चमकीले वैश्विक शहरों के रूप में दिखाई देंगे। इसमें कोई दोमत नहीं कि भारत के शहरों में उद्योग-कारोबार का जो विकास हो रहा है उससे भारत दुनिया के आर्थिक परिदृश्य पर तेजी से उभरता हुआ दिखाई दे रहा है। अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि शहरों के कारण ही भारत की वैश्विक काराबोर, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, वैश्विक नवाचार के क्षेत्र में विशेष पहचान बनी है।

विश्व बैंक की डूइंग बिजनेस रिपोर्ट 2018 में भारत को 190 देशों की सूची में 77वां स्थान दिया गया। यह रैंकिंग रिपोर्ट 2019 में बढ़ सकती है। विश्व प्रतिस्पर्धा केंद्र रिपोर्ट 2018 के अनुसार 63 देशों की वैश्विक प्रतिस्पर्धी रैंकिंग में भारत 44वें स्थान पर रहा। वर्ष 2019 में भारत दुनिया की सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में दिखाई दे रहा है। भारत की विकास दर दुनिया में सर्वाधिक है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि भारत में सूचना-प्रौद्योगिक क्षेत्र में नवाचार तथा नई प्रौद्योगिकी के लिए दुनिया की कंपनियां तेजी से कदम बढ़ा रही हैं। अमरीका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां नई प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीय आईटी प्रतिभाओं के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत में अपने ग्लोबल इन हाउस सेंटर ‘जीआईसी’ तेजी से बढ़ाते हुए दिखाई दे रही हैं। निश्चित रूप से देश में बढ़ते हुए औद्योगिकरण और कारोबार विकास के कारण भी शहरीकरण रफ्तार बढ़ रही है। शहरों की बढ़ी आबादी मूलभूत चिकित्सा सेवा से भी वंचित है। सड़क, बिजली, पानी के मोर्चे पर भी समस्याएं बढ़ी हुई हैं। बढ़ी संख्या में बच्चे उपयुक्त शिक्षा से वंचित हैं। जरूरी है कि शहर सुनियोजित रूप से विकसित हों।

शहर आधुनिक बुनियादी सुविधाओं, यातायात और संचार साधनों से सुसज्जित हों। शहरों में विकास की मूलभूत संरचना, मानव संसाधन के बेहतर उपयोग, जीवन की मूलभूत सुविधाओं तथा सुरक्षा कसौटियों के लिए सुनियोजित प्रयास करना आवश्यक हैं। हमें नए शहरों की मौजूदा नई जरूरतों के लिए रोड मैप बनाना होगा। नए शहरों में सड़क का उपयुक्त मॉडल अपनाया जाना होगा। नए शहरों को तत्परता से निर्मित करने के लिए सरकार के द्वारा आसान कर्ज के साथ-साथ निजी क्षेत्र से निवेश का सार्थक प्रयास करना होगा। निश्चित रूप से नए शहरों के इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप ‘पीपीपी’ मॉडल उपयुक्त होगा। हाल ही में इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ईआईयू के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के मद्देनजर हमें हमारे शहरों की चिंता करनी होगी।

वैश्विक जरूरतों की पूर्ति करने वाले शहरों के विकास की दृष्टि से भारत के लिए यह एक अच्छा संयोग है कि अभी देश में ज्यादातर शहरी ढांचे का निर्माण बाकी है और शहरीकरण की चुनौतियों के मद्देनजर देश के पास शहरी मॉडल को परिवर्तित करने और बेहतर सोच के साथ शहरों के विकास का पर्याप्त समय अभी मौजूद है। ऐसे में हमें वियना, मेलबर्न, सिडनी, टोक्यो जैसे गुणवत्तापूर्ण शहरों से सीख लेना होगी। शहरों को जीवन अनुकूल बनाने के लिए शासन-प्रशासन के साथ-साथ सभी वर्गों के लोगों के द्वारा एकजुट होकर प्रयास करना होगा। ऐसा होने पर निश्चित रूप से हम वैश्वीकरण के लिए चमकीले और लाभप्रद शहरों वाले देश के रूप में अपनी पहचान बना पाएंगे। हम आशा करें कि सरकार देश के शहरों को एक बेहतर सोच, दृढ़ इच्छा शक्ति और सुनियोजित रणनीति से सजाएगी-संवारेगी, ताकि हमारे ये शहर राष्ट्रीय और वैश्विक जरूरतों की पूर्ति के अनुरूप लाभप्रद दिखाई दें और देश में जीवन अनुकूलता मापदंडों की बुनियादी ताकत बन जाएं।