Friday, October 18, 2019 11:25 AM

अनुच्छेद 370 का सच

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

इस अनुच्छेद को संघीय संविधान में शामिल करने के पीछे तर्क यही था कि जम्मू-कश्मीर में अभी विवाद चला हुआ है। मामला सुरक्षा परिषद में लंबित है। इसलिए अभी संघीय संविधान वहां लागू नहीं किया जाना चाहिए, नहीं तो अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की छवि खराब होगी। स्पष्ट था, माऊंटबेटन दंपति जो खिलौना नेहरु को दे गए थे वे उसे उसी कुशलता से बजा रहे थे जिसकी कल्पना माऊंटबेटन दंपति ने की थी...

अनुच्छेद 370 उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनके मित्र शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के आपसी संबंधों और राजनीति की उस जमीन  में से उपजा था , जिनकी जुताई माऊंटबेटन दंपति ने जाने से पहले कर दी थी । यह अनुच्छेद संघीय संविधान के कई अनुच्छेदों को प्रदेश में लागू होने से रोकता था। इस अनुच्छेद को संघीय संविधान में शामिल करने के पीछे तर्क यही था कि जम्मू-कश्मीर में अभी विवाद चला हुआ है। मामला सुरक्षा परिषद में लंबित है। इसलिए अभी संघीय संविधान वहां लागू नहीं किया जाना चाहिए, नहीं तो अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की छवि खराब होगी । स्पष्ट था, माऊंटबेटन दंपति जो खिलौना नेहरू को दे गए थे वे उसे उसी कुशलता से बजा रहे थे जिसकी कल्पना माऊंटबेटन दंपति ने की थी। लेकिन सुरक्षा परिषद में निश्चय ही भारत जीतेगा और तब पूरा संविधान जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो जाएगा, ऐसी आशा नेहरू को थी। इसलिए अनुच्छेद 370 को अस्थायी ही रखा गया था। लेकिन शेख मोहम्मद अब्दुल्ला इस पूरे सवाल को ही अलग नजरिया से देख रहे थे। उनका मानना था कि जम्मू-कश्मीर को लेकर विवाद सुरक्षा परिषद में है और वहां भारत सरकार ने स्वीकार किया है कि राज्य में विलय के सवाल पर जनता की राय ली जाएगी, ये सभी तर्क ही बेमानी हैं।

शेख अब्दुल्ला का कहना, यानी जम्मू -कश्मीर की जनता का कहना। दरअसल शेख अब्दुल्ला, नेहरू को ब्लैकमेल कर रहा था और अनुच्छेद 370 की आड़ में जम्मू-कश्मीर को अपनी जागीर की तरह इस्तेमाल करना चाहता था। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि नेहरु, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के सामने किस लिए झुके रहते थे? इसी मरहले पर संघीय संविधान में अनुच्छेद 370 का ताना-बाना बुनना शुरु किया गया। यह शेख और नेहरू के दिमाग में से निकला था। लेकिन सीधे-सीधे यह अनुच्छेद संविधान सभा में लाने का साहस नेहरू में  भी  नहीं था। भारत के संविधान में अनुच्छेद 370 चोर दरबाजे से ही डाला गया था। बाबा साहिब अंबेडकर में तो इसे हाथ लगाने से भी इनकार कर दिया था तब इसे नेहरु ने अपने मित्र गोपालस्वामी आयंगर से संविधान सभा में पेश करवाया था। नेहरु जानते थे कि कांग्रेस में इस अनुच्छेद का बहुत विरोध है और वे उसका सामना नहीं कर पाएंगे। इसलिए वे स्वयं देश से बाहर चले गए। जब कांग्रेस में यह अनुच्छेद विचार हेतु लाया गया तो नेहरू के विदेश में होने के कारण, इस पर चर्चा करवाने का दायित्त्व सरदार पटेल पर आ गया। जाहिर था कि कांग्रेस की उस बैठक में इस अनुच्छेद का बहुत विरोध होता, और ऐसा  हुआ भी। कांग्रेस के भीतर की राष्ट्रवादी शक्तियों ने इसका घोर विरोध किया था। लेकिन अंतत यह अनुच्छेद येन केन प्रकारेण स्वीकार्य हुआ। जम्मू- कश्मीर का भारत में विलय महाराजा हरि सिंह की इच्छा और हस्ताक्षर से हुआ था, नेहरू और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के बीच हुई किसी संधि से नहीं। इसके विपरीत जम्मू-कश्मीर लद्दाख के लोग तो पूरा संघीय संविधान लागू करवाने के लिए आंदोलन कर रहे थे।

इस प्रकार अनुच्छेद 370 में जम्मू- कश्मीर के लिए अलग से संविधान सभा की व्यवस्था की गई। दरअसल उस समय सभी रियासतों को अपने अपने यहां संविधान सभा गठित कर संविधान बनाने का अधिकार दिया । कालांतर में सभी राजाओं ने यह स्वीकार कर लिया कि उन पर भी संघीय संविधान ही लागू होगा लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरु ने इस पूरी प्रक्रिया में जम्मू- कश्मीर के महाराजा हरि सिंह को बाहर ही कर दिया। उन्होंने महाराजा को यहां तक लिखा कि तुम्हारी औकात क्या है? जबकि नेहरु जानते थे कि हरि सिंह की औकात से ही जम्मू-कश्मीर भारत की संघीय सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा बना है। यहां तक कि नेहरू ने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ मिल कर, जिनकी उस समय कोई कानूनी औकात नहीं थी, हरि सिंह को रियासत से निर्वासित ही कर दिया। नेहरू को आशा थी कि जम्मू-कश्मीर की  संविधान सभा से  दो काम तुरंत पूरे हो जाएंगे और उससे उनकी भूल सुधार हो जाएगी।   संविधान सभा द्वारा विलय के पक्ष में प्रस्ताव पारित हो जाने का अर्थ होगा कि राज्य के लोगों ने विलय को स्वीकार कर लिया है। उनको दूसरी आशा थी कि संविधान सभा राज्य का संविधान बना लेने के बाद सिफारिश कर देगी कि अब अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया जाए क्योंकि अब इसकी जरूरत नहीं है। लेकिन क्योंकि राज्य संविधान सभा में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का कब्जा हो चुका था, इस लिए अब वह अपने असली रंग में आना शुरू हो गया था। नेहरू भी समझ गए कि पटेल ठीक ही कहते थे कि शेख अवसर आने पर धोखा देंगे ।

शेख ने तो सचमुच धोखा दे दिया लेकिन बख्शी गुलाम मोहम्मद के नेतृत्व में राज्य की संविधान सभा में 26 जनवरी 1954 को विलय को मान्य कंपने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर में राज्य के लोगों की राय जानने की भी शर्त पूरी हुई। लेकिन संविधान सभा ने अपनी वैधानिक मौत से पहले अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का प्रस्ताव पारित नहीं किया। उनकी इच्छा बहुत थी कि अनुच्छेद 370 अब समाप्त हो जाए। इसलिए उन्होंने अनेक बार संसद में भाषण दिए कि यह अनुच्छेद समय पाकर हट जाएगा। लेकिन राज्य संविधान सभा ने उनकी यह इच्छा पूरी नहीं की। नेहरु सचमुच ठगे गए थे । वे धोखा खा गए थे । इस मामले में पटेल ही सही सिद्ध हुए थे। नेहरु चाहते तो इसके बावजूद अनुच्छेद 370 हट सकता था। लेकिन इसके लिए न तो उनकी हिम्मत थी न ही प्रकृति । यदि ऐसा होता तो शायद देश का ही विभाजन न होता। लेकिन नेहरु को यह श्रेय देना पड़ेगा कि वे अंत तक अंडे रहे कि यह अनुच्छेद अस्थायी व्यवस्था होगी, जबकि शेख का षड्यंत्र इसे स्थायी बनाने का था।

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