Monday, October 21, 2019 07:55 AM

अनुच्छेद 370 की समाप्ति

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

दरअसल यह अनुच्छेद पंडित नेहरू और उनके मित्र शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के षड्यंत्र का परिणाम था। शेख अब्दुल्ला नेहरू को ब्लैकमेल कर रहे थे और भारतीय संविधान की आड़ में जम्मू-कश्मीर को अपनी जागीर की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। अनुच्छेद 370 उसमें शेख की सहायता कर रहा था। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि नेहरू, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के सामने किसलिए झुके रहते थे? यदि थोड़ा और पीछे जाएं, तो कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर का यह षड्यंत्र नेहरू, माउंटबेटन दंपति और शेख अब्दुल्ला द्वारा अलग-अलग चरणों में अभिनीत किया गया था। कभी न कभी तो जम्मू-कश्मीर को इस षड्यंत्र से मुक्ति मिलनी ही थी, लेकिन इसके लिए जिस साहस की जरूरत थी, वह अब तक की सरकारों में से किसी ने नहीं दिखाया...

जम्मू-कश्मीर में पिछले दिनों इतिहास का एक नया अध्याय लिखा गया। संघीय संविधान में से विवादास्पद अनुच्छेद 370 को प्रभावहीन बना दिया गया है। यह अनुच्छेद संघीय संविधान और जम्मू-कश्मीर के बीच दीवार बन कर खड़ा था। संविधान नागरिकों को जो अधिकार देता है, वे जम्मू-कश्मीर में इस अनुच्छेद के कारण नहीं पहुंच पाते थे। इस अनुच्छेद का लाभ उठाकर राज्य में शेखों और सैयदों ने कब्जा जमा लिया था और अपनी तानाशाही में आम कश्मीरियों को लूट रहे थे। राज्य में आने वाले बजट का बड़ा हिस्सा इन चंद परिवारों और उनके सगे संबंधियों की जेब में चले जाते थे। इन शेखों और सैयदों ने आम कश्मीरी के हाथ में 370 का झुनझुना दे रखा था, जिसे वे बजाते रहते थे और पिछवाड़े में बैठे ये शेख और सैयद एक ओर लूट-खसूट करते रहते थे और दूसरी ओर अलगाववादियों की भाषा बोल कर केंद्र सरकार को डराते रहते थे। अनुच्छेद 370 था तो अस्थायी, लेकिन कांग्रेस सरकार ने अपने व्यवहार से इसको स्थायी बनाने की कोशिश बराबर जारी रखी थी। इस पूरे परिदृश्य में शेखों और सैयदों को छोड़कर बाकी सभी राज्य निवासी पिस रहे थे।

राज्य में बारह जनजातियां हैं, जिनको कोई अधिकार इन शेखों और सैयदों ने नहीं दिया है। विधानसभा में इन जनजातियों के लिए कोई सीट सुरक्षित नहीं है, जबकि शेष राज्यों की विधानसभाओं में जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के हिसाब से सीटें आरक्षित हैं। यही स्थिति अनुसूचित जातियों की है। उनकी हालत तो अमानवीय है। दलितों को जो राज्य निवासी प्रमाण पत्र जारी किया हुआ है, उसमें अंकित है कि यह केवल सफाई सेवक का काम कर सकता है। दलितों के अधिकारों के लिए बाबा साहिब अंबेडकर जीवनभर संघर्ष करते रहे और संविधान में उनको सभी प्रकार के अधिकार मुहैया करवाए, लेकिन जम्मू-कश्मीर की सरकार दलितों को ये अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थी। 1947 में विभाजन के समय लाखों लोग पश्चिमी पंजाब से पूर्वी पंजाब, दिल्ली और अन्य प्रदेशों में गए। उन्हें भारत सरकार और राज्यों की सरकारों ने सभी प्रकार की सहायता प्रदान की। पाकिस्तान में रह गई संपत्ति का मुआवजा भी उन्हें दिया। पश्चिमी पंजाब के दो जिले स्यालकोट और रावलपिंडी जम्मू-कश्मीर के नजदीक थे। वहां से लाखों पंजाबी जम्मू-कश्मीर में आ गए, लेकिन आज 70 साल बाद भी उनको वहां बसाया नहीं जा रहा। वे जो संपत्ति वहां छोड़ आए थे, उसका मुआवजा देने की बात तो दूर, उनके बच्चों को प्रदेश के व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा। वे राज्य में नौकरी नहीं कर सकते। विधानसभा व पंचायतों में चुनाव लड़ने की बात तो दूर, वहां वोट तक नहीं दे सकते। अनुच्छेद 370 ने शेखों और सैयदों के कुछ परिवारों, मुल्ला-मौलवियों व मीरवायजों को छोड़ कर शेष निवासियों के लिए राज्य को एक बड़ा यातना शिविर बना रखा था। लद्दाख के लोग तो 370 की व्यवस्था से इतने दुखी थे कि उन्होंने 1948 में ही यह प्रस्ताव पारित किया था कि लद्दाख को पूर्वी पंजाब में शामिल कर दिया जाए, लेकिन वे कश्मीर के साथ मिलने को तैयार नहीं हैं। अनुच्छेद 370 संघीय संविधान में चोर दरवाजे से ही डाला गया था। बाबा साहिब अंबेडकर ने तो इसे हाथ लगाने से भी इनकार कर दिया था, तब इसे नेहरू ने अपने मित्र गोपालस्वामी आयंगर से संविधान सभा में पेश करवाया था।

दरअसल यह अनुच्छेद पंडित नेहरू और उनके मित्र शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के षड्यंत्र का परिणाम था। शेख अब्दुल्ला नेहरू को ब्लैकमेल कर रहे थे और भारतीय संविधान की आड़ में जम्मू-कश्मीर को अपनी जागीर की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। अनुच्छेद 370 उसमें शेख की सहायता कर रहा था। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि नेहरू, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के सामने किसलिए झुके रहते थे? यदि थोड़ा और पीछे जाएं, तो कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर का यह षड्यंत्र नेहरू, माउंटबेटन दंपति और शेख अब्दुल्ला द्वारा अलग-अलग चरणों में अभिनीत किया गया था, लेकिन कभी न कभी तो जम्मू-कश्मीर को इस षड्यंत्र से मुक्ति मिलनी ही थी, लेकिन इसके लिए जिस साहस की जरूरत थी, वह अब तक की सरकारों में से किसी ने नहीं दिखाया। नरेंद्र मोदी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने उस षड्यंत्र का अंत कर दिया, जिसकी शुरुआत नेहरू, माउंटबेटन दंपत्ति और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने 70 साल पहले की थी। इसके लिए निश्चय ही मोदी बधाई के पात्र हैं, लेकिन आश्चर्य की बात है कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस आज भी उसी षड्यंत्र को स्थायी रखने के प्रयास में अडिग दिखाई दे रही है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और अधीर रंजन ने संसद में इस विषय को लेकर जो भाषण दिया, यदि उसके भाषणकर्ता के नाम की घोषणा न की जाए, तो उसे कोई भी किसी पाकिस्तानी प्रतिनिधि का भाषण कह सकता है। यह स्थिति 1948 में भी पैदा हुई थी, जब भारत के प्रतिनिधि गोपालस्वामी आयंगर संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में भारत का पक्ष रख रहे थे। तब किसी ने टिप्पणी की थी कि यदि श्रोता को यह न पता हो कि बोलने वाला भारत का प्रतिनिधि है, तो वह इनके भाषण को सुन कर यही कहेगा कि पाकिस्तान का प्रतिनिधि बोल रहा है। आज 79 साल बाद भी कांग्रेस वहीं की वहीं खड़ी है, जबकि देश बहुत आगे निकल गया है।

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