Tuesday, August 20, 2019 01:35 PM

अनुच्छेद 370 हटाने के मायने

सोमवार, पांच अगस्त, 2019 का दिन कश्मीर के इतिहास में किन्हीं भी विशेषणों और शब्दों में याद किया जाए, लेकिन यह मोदी सरकार के ‘क्रांतिकारी बदलाव’ और ऐतिहासिक संकल्प के तौर पर जरूर याद किया जाएगा। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस संदर्भ में तुलनात्मक व्याख्याएं भी की जाएंगी। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में मोदी कैबिनेट ने अनुच्छेद 370 हटाने का जोखिम भरा फैसला लिया है। अब राज्य को दो टुकड़ों में विभाजित किया जाना है। अब जम्मू-कश्मीर संघ शासित क्षेत्र होगा और इससे अलग लद्दाख भी केंद्र शासित क्षेत्र होगा। विधानसभा का अस्तित्व लद्दाख में नहीं होगा, जबकि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा होगी, अपनी पुलिस होगी, लेकिन पुलिस राज्यपाल को रपट करेगी। अब सही मायनों में जम्मू-कश्मीर भारत का समावेशी हिस्सा होगा। दरअसल जो सपना पचास के दशक में जनसंघ और उसके संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संजोया था, संघर्ष किया था, अब उसे भाजपा की मोदी सरकार साकार कर रही है। डा. मुखर्जी ने ‘एक हिंदोस्तान, एक विधान, एक निशान’ नारे के लिए ‘शहादत’ दी थी, लेकिन आज भाजपा सरकार ने उस शहादत को एक नया सम्मान दिया है। कैबिनेट के इस फैसले के कुछ देर बाद ही राष्ट्रपति के हस्ताक्षर समेत भारत के राजपत्र में यह संवैधानिक बदलाव दर्ज कर दिया गया। साफ है कि पहले से ही तैयारी थी कि राष्ट्रपति कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर नया आदेश जारी करेंगे। संसद के बिल पारित करने के बाद ही जम्मू-कश्मीर का ‘विशेष दर्जा’ समाप्त हो जाएगा। बेशक आप मोदी सरकार के इस ‘क्रांतिकारी फैसले’ से असहमत हों, लेकिन यह सवाल तो स्वाभाविक रहा है कि भारतीय गणराज्य में ‘कश्मीर’ नाम का एक और देश क्यों बसा हुआ है? कश्मीर का अपना संविधान, झंडा, अपने विशेषाधिकार, दोहरी नागरिकता, संसद और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को न मानने की जिद, विधानसभा का छह साल का कार्यकाल और अपने सामाजिक-पारिवारिक कायदे-कानून थे। कश्मीर में बाहर का कोई भी व्यक्ति न तो नागरिक बन सकता था और न ही संपत्ति खरीद सकता था। कश्मीर से बाहर कश्मीरी नेताओं और संभ्रांत जमात के बंगले और महंगे फ्लैट हैं। कई और विरोधाभास रहे हैं, जिनके कारण कश्मीर का शेष भारत से जुड़ाव सवालिया रहा है। कश्मीरी खुद को अलग देश का नागरिक मानते हैं और शेष देश को हिंदोस्तान कहते रहे हैं। सवाल है कि क्या यह स्थिति संवैधानिक और राष्ट्रीय मानी जा सकती थी? दरअसल जम्मू-कश्मीर का विलय भारतीय गणराज्य में हुआ था। उसे अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा दिया गया। वह तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तात्कालिक गलती थी या वह शेख अब्दुल्ला के साथ मित्रता के कारण मजबूर हुए थे, लेकिन इसे नेहरू की ही ऐतिहासिक गलती माना जाएगा। देश उसे कब तक झेलता? नेहरू-शेख, इंदिरा गांधी-शेख, राजीव गांधी-फारूख के दरमियान समझौते होते रहे, लेकिन इस गलती को कभी भी सुधारने की कोशिश नहीं की गई। कोई तो मां भारती का ऐसा सपूत सामने आना ही था, जो इन विसंगतियों को दुरुस्त करता। यह श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाएगा और कश्मीर को भारत में समावेशी करने के मद्देनजर गृह मंत्री अमित शाह को ‘छोटे सरदार पटेल’ का विशेषण दिया जा रहा है। बेशक यह कोई सामान्य निर्णय नहीं था। शायद इसीलिए बसपा, अन्नाद्रमुक, टीडीपी, वाईएसआर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बीजद सरीखी भाजपा विरोधी पार्टियों ने राज्यसभा में सरकार के बिल का समर्थन किया है। यानी ये दल 370 को खत्म करने के पक्षधर हैं। यह भी स्वाभाविक है कि कांग्रेस नेतृत्व वाला विपक्ष इस निर्णय को ‘संविधान की हत्या’ और ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार देगा ही, लेकिन उसे एहसास कराना चाहिए कि देश के भीतर देश क्यों? ये विष-बीज किसने बोए थे? भारत सरकार ने इन 70 सालों में कश्मीर पर जो करीब 25 लाख करोड़ रुपए खर्च किए हैं, उनकी जवाबदेही किसकी है? गृह मंत्री ने तो राज्यसभा में साफ कहा है कि कश्मीर घाटी के तीन सियासी परिवारों ने जमकर लूटा है, लिहाजा अब अचानक जमीन पर गिरने की नौबत से चिल्ला रहे हैं। इस ‘क्रांतिकारी संशोधन’ के फलितार्थ क्या होंगे, हम आपको कल वाले संपादकीय में बताएंगे।