अनेक फलों का प्रदाता है अमावस्या का व्रत, अमावस्या की तिथि का हिंदू धर्म में बड़ा ही महत्त्व बताया गया है

अमावस्या की तिथि का हिंदू धर्म में बड़ा ही महत्त्व बताया गया है। जिस तिथि में चंद्रमा और सूर्य साथ रहते हैं, वही अमावस्या तिथि है। इसे अमावसी भी कहा जाता है। अमावस्या माह की तीसवीं तिथि होती है। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को कृष्ण पक्ष प्रारंभ होता है तथा अमावस्या को समाप्त होता है। अमावस्या पर सूर्य और चंद्रमा का अंतर शून्य हो जाता है।

महत्त्व

अमावस्या के स्वामी ‘पितर’ होते हैं। इस तिथि में चंद्रमा की सोलहवीं कला जल में प्रविष्ट हो जाती है। चंद्रमा का वास अमावस्या के दिन औषधियों में रहता है, अतः जल और औषधियों में प्रविष्ट उस अमृत का ग्रहण गाय, बैल, भैंस आदि पशुचारे एवं पानी के द्वारा करते हैं जिससे वही अमृत हमें दूध, घी आदि के रूप में प्राप्त होता है और उसी घृत की आहुति ऋषिगण यज्ञ के माध्यम से पुनः चंद्रादि देवताओं तक पहुंचाते हैं। वही अमृत फिर बढ़कर पूर्णिमा को चरम सीमा पर पहुंचाता है।

अमावस्या पर व्रत

धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि अमावस्या को व्रत करना चाहिए, अर्थात निराहार रहकर उपवास करना चाहिए। उप-समीप, वास-निवास अर्थात परमात्मा के समीप रहना चाहिए। अमावस्या के दिन ऐसे ही कार्य करने चाहिएं जो परमात्मा के पास में ही बिठाने वाले हों। सांसारिक खेती-बाड़ी, व्यापार आदि कर्म तो परमात्मा से दूर हटाने वाले हैं। संध्या हवन, सत्संग, परमात्मा का स्मरण, ध्यान कर्म परमात्मा के पास बैठाते हैं। इसलिए माह में एक दीन उपवास अवश्य ही करना चाहिए और वह दिन अमावस्या का ही श्रेष्ठ मान्य है क्योंकि सूर्य और चंद्रमा ये दोनों शक्तिशाली ग्रह अमावस्या के दिन एक ही राशि में आ जाते हैं। चंद्रमा सूर्य के सामने निस्तेज हो जाता है। अर्थात चंद्र की किरणें नष्ट प्रायः हो जाती हैं। संसार में भयंकर अंधकार छा जाता है। चंद्रमा ही सभी औषधियों को रस देने वाला है। जब चंद्रमा ही पूर्ण प्रकाशक नहीं होगा तो औषधि भी निस्तेज हो जाएगी। ऐसा निस्तेज अन्न, बल, वीर्य, बुद्धिवर्धक नहीं हो सकता, किंतु बल, वीर्य, बुद्धि आदि को मलीन करने वाला ही होगा। इसलिए अमावस्या का व्रत करना चाहिए। उस दिन अन्न खाना वर्जित किया गया है और व्रत का विधान किया गया है।

श्राद्ध

पितरों के निमित्त अमावस्या तिथि में श्राद्ध व दान का विशेष महत्त्व बताया गया है। सूर्य की सहस्र किरणों में से एक ‘अमा’ नामक किरण प्रमुख है, जिसके तेज से सूर्य समस्त लोकों को प्रकाशित करता है। उसी अमावस्या में तिथि विशेष को चंद्रमा निवास करते हैं। इसी कारण से धर्म कार्यों में अमावस्या को विशेष महत्त्व प्रदान किया जाता है। पितृगण अमावस्या के दिन वायु रूप में सूर्यास्त तक घर के द्वार पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। पितृ पूजा करने से मनुष्य आयु, पुत्र, यश-कीर्ति, पुष्टि, बल, सुख व धन-धान्य प्राप्त करते हैं।