Sunday, September 22, 2019 07:23 AM

अपने सपनों को कभी मारो नहींउनको जीने की कोशिश करो

मेरा भविष्‍य मेरे साथ-2

करियर काउं‌सिलिंग/कर्नल (रिटायर्ड) मनीष धीमान

गांव के स्कूल में जब भी हम खेलने की बात करते थे ,वहां पर हॉकी, कबड्डी, खो-खो, बैडमिंटन आदि खेल खेले जाते थे और उन्हीं की ही जिला और राज्य स्तर की प्रतिस्प्रदा होती थी। जब हम शहर के कालेज में पहुंचे तो कालेज के गेट के पास एक बास्केटबॉल कोर्ट बना था, हालांकि इस खेल को कभी-कभी दूरदर्शन पर खेलकूद वाले प्रोग्राम मे हमने देखा था पर सच में जानो तो हकीकत में पहली बार ही इसको देखा। मैंने देखा कालेज के कुछ लड़के और लड़कियां सुबह और शाम पूरे बास्केटबॉल कोर्ट में गेंद को लेकर ड्रिबल करते रहते और शूटिंग की प्रैक्टिस करते रहते, जब कभी भी बास्केटबॉल मैच, जो कि दोस्ताना तौर पर खेला जाता था, तो पूरा कालेज उसको देखने के लिए इकट्ठा हो जाता और बड़े जोर शोर के साथ अपन-अपने खिलाडि़यों की हौसला अफजाई तालियां और गाने गाकर करते ।

मैंने एक और चीज महसूस की की मेरे जैसा गांव से आया लड़का किसी तरह अपने घर, गांव, दोस्तों की याद को भूलकर रात-दिन केमिस्ट्री के रिएक्शन याद करता, गणित की अलग-अलग तरह के फॉर्मूले याद करता और भौतिक विज्ञान में अपनी रातें तक खपाता रहता, प्रोफेसर के द्वारा दिए गए होमबर्क को पूरी तरह करता और कक्षा में हर सवाल का जवाब सबसे पहले देता पर फिर भी सारे स्टूडेंट्स उसको पढ़ाकू, दब्बू , पेन्डू, किताबी कीड़ा कहकर ही पुकारते और सारा दिन बास्केटबॉल ग्राउंड में मस्ती करने वाले लड़के जब भी कोई क्लास लगवाने आते तो हर प्रोफेसर उनसे सहानुभूति दिखाते, सारे स्टूडेंट्स उनको इज्जत की नजरों से देखते और बहुत सारी लड़कियां अपने अच्छे बनाए हुए नोट्स भी उनको देने को तैयार हो जातीं । इन सब चीजों से मेरे मन में आया कि मैं क्यों न बास्केटबॉल खेलना शुरू करूं और अगले दिन सुबह ही हम भी पूरे जोश खरोश में बास्केटबॉल कोर्ट में पहुंच गए वहां पर आलम कुछ और ही निकला हमें न बाल पकड़ने आती थी न ड्रिबल करने आती, न ही शूटिंग करने आती कछ देर तो बाकी प्लेयर्स ने हमें देखा पर देखते ही देखते कुछ ही क्षणों में हम हंसी का पात्र बन गए और अपना सा मूंह बनाकर वापस हो लिए। मैं दुखी होकर अपने कमरे में पहुंचा और रात को अपने चचेरे भाई को बताया कि सपनों को जीना ठीक है पर अगर आपको उसके बारे में कुछ भी पता नहीं है, तो आप किसी का कैसे मुकाबला करोगे और किसी को कैसे हराओगे और मैं दुखी मन के साथ सो गया जब मैं सुबह उठा तो मेरे बिस्तर के सामने दीवार पर कुछ ऐसे लिखा था : तुम कभी भी जीत नहीं पाओगे, अगर शुरुआत नहीं करोगे अगली सुबह कालेज में जाते ही मैंने खेल परिसर से बास्केटबॉल अपने नाम पर लिया और सुबह शाम दो- दो घंटे बास्केटबॉल कोर्ट में प्रैक्टिस करना शुरू किया। प्रथम वर्ष के अंत तक मैं बास्केटबॉल का खिलाड़ी बन चुका था और मेरी दिलचस्पी देखकर टीम के दूसरे खिलाड़ी भी मुझे पसंद करने लगे थे और तृतीय वर्ष मैं कालेज टीम का कैप्टन बना तथा हमने यूनिवर्सिटी लेवल की ट्राफी भी जीती।  इससे मेरे मन में एक विश्वास आया कि अगर हम चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं, हमारे मन का विश्वास पक्का होना चाहिए। मेरी इस  सफलता को हम अंग्रेजी भाषा की 5डी के साथ समझ सकते हैं पहली डी का मतलब ‘डिजायर’ यानी सपना, हम सब सपने देखते हैं कि हम ये करेंगे  या वे करेंगे जिससे कि हमें दुनिया में एक नाम मिले और लोग पसंद करें, वह आप एक जिलाधीश, एक पुलिस अफसर, एक फौजी अफसर नेता, अभिनेता कुछ भी बनने के लिए सपना देख सकते हैं, उसके बाद उन सारे सपनों में से आपको दूसरी डी जिसका मतलब है ‘डिसाइड’ यानी फैसला, आपको यह फैसला करना है कि आप जिंदगी में क्या हासिल करना चाहते हैं, आप अपनी डिजायर में से किसी एक पर अपना पक्का मन बनाओगे और उस पर फैसला लोगे, उसके बाद तीसरा डी जिसका मतलब है ‘डिटेल नॉलेज’ यानी पूरा ज्ञान,  जो आप ने फैसला लिया है वे आपका सपना , आपका लक्ष्य कैसे प्राप्त होगा , आपको उसके बारे में पूरा ज्ञान होना चाहिए कौन सी किताबें पढ़नी है, किस तरह से मेहनत करनी है, कहां पर कोचिंग लेनी है, कैसे एग्जाम होगा, उसको  कैसे फेस करना है, कब उसके फॉर्म भरे जाएंगे आदि ,इत्यादि । यह सब पता होने के बाद आपको चौथी डी पर काम करना है इसका मतलब है। ‘डेडीकेशन’ यानी तन, मन, धन से मेहनत। जब आपने अपने सपनों में से किसी एक पर फैसला  लिया ,उसके बारे में पूरा  ज्ञान लिया , अब  24 घंटे 7 दिन आपको उसको हासिल करने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। उसके बाद आता है पांचवा डी इसका मतलब है ‘डिटरमिनेशन’ यानी  यह जरूरी नहीं कि आपको सफलता पहली बार ही मिल जाए, ये एक लंबा प्रोसेस है और इसके  लिए आपको बार-बार पूरी तरह समर्पित होकर मेहनत करनी पड़ेगी और वह दिन दूर नहीं होगा जब आपको अपना लक्ष्य और फैसला प्राप्त होगा। मैं देखता था कि कॉलेज में प्रोफेसर, स्टूडेंट्स और सारे लोग किस को पसंद करते हैं क्या वह पढ़ने वाले को पसंद करते हैं, गाने वाले को पसंद करते हैं या फिर अच्छे खिलाड़ी को पसंद करते हैं उस वक्त मैंने डिसाइड किया कि मेरे को लोगों की पसंद बनने के लिए अच्छा बास्केटबॉल खिलाड़ी बनना है, वह खिलाड़ी बनने के लिए मेरे को बास्केटबॉल चाहिए था, प्रैक्टिस करने के लिए कोर्ट चाहिए था, समय चाहिए था मैंने उस सब का ज्ञान प्राप्त किया, उसके बाद मैंने चौथी डी जो कि डेडीकेशन था पूरी तरह से उसको सीखने के लिए मेहनत की और अपने 3 साल के डटरमीनेशन  और सच्ची लगन के बाद मैं कालेज की टीम का कैप्टन बना और ट्राफी भी जीती। उसी तरह अगर जिंदगी में आपको कुछ हासिल करना है तो आपको कुछ चीजें याद रखनी पड़ेगी । सबसे पहले कि अपने सपनों को मरने मत दो, इनकोे जीना सीखो दूसरी बात कि आप  तब जीतोगे जब आप शुरुआत करोगे । उसके बाद काम आता है 5डी का बहुत सारे सपनों में से एक सपने को हासिल करने का फैसला करो, उसके बारे में कैसे हासिल होगा संपूर्ण ज्ञान हासिल करो उसके बाद पूरी शिद्दत के साथ उसको प्राप्त करने के लिए मेहनत करो और अगर आप पहली बारी, दूसरी बारी में सफलता नहीं पाते हो तो। याद रखो ये शब्द :  कि करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, आप अगर मेहनत करते रहोगे और अपने सपनों को प्राप्त करने के लिए डिटरमिन रहोगे तो एक दिन आपको सफलता जरूर मिलेगी।