Sunday, September 22, 2019 07:22 AM

अपुरस्कृतों को प्रणाम

अशोक गौतम

साहित्यकार

(पुरस्कृत बंधुओं को बधाई के बाद क्षमा याचना सहित)

अबके जब उन्होंने पुरस्कार हेतु पेपर मंगवाए थे तो मुझ जैसे नासमझ ने उन्हें बहुत समझाया था, ‘मास्साब! दो-चार महीने ये पढ़ाना-बढ़ाना छोड़ सच झूठ के इधर-उधर से अपनी बहुआयामी कार्यकुशलता के कागज इकट्ठा करो तो पुरस्कार की बात बने,’ पर मेरे समझाने को तब वे सिरे से खारिज करते बोले थे, ‘कागज बोले तो?’ ‘यह कहकर अपनी झूठी प्रशंसा में इससे लिखवाओ, उससे लिखवाओ। जो भी मिल जाए उससे लिखवाओ। अपने को कभी यहां तो कभी वहां जनसेवा करते फोटो खिचवाओ तो...’ ‘या मतलब तुहारा’? ‘मास्साब मेरा मतलब यह कि... कोरे बच्चों को ईमानदारी से पढ़ाने पर यहां कुछ नहीं मिलने वाला।’ ‘पर मास्टर का काम तो बच्चों को पढ़ाना है,’ फिर वही बेहुदगी। ‘पर केवल कागज में, ‘मैं अपने अनुभव पर जितना उनसे कह सकता था, उतना उनसे कहा भी, ‘अरे मास्साब! पुरस्कार पाने के लए बच्चों को पढ़ाने के सिवाय और भी बहुत कुछ मास्साब के पास होना चाहिए। उसे कहने को ही सही सामाजिक कार्यकर्ता होना चाहिए। उसे काम के बदले उन अनपढ़ों का प्रिय होना चाहिए जिनसे वह अपनी प्रशंसा खुद अपने मनमाफिक लिख उस पर उनका हाथ पकड़ उनके साइन करवा सके। उन्हें अपनी प्रशंसा करवाने के बदले में खिला- पिला सके। ‘मतलब? समझदार मास्साब चौंके तो चौंकते रहें। जो अपना सच था सो कह दया।  ‘ज्यों तालाब में खड़े हो नहाते बच्चों के साथ फोटो खिचवाया और पुरस्कार के लिए अप्लाई करते फाइल में उसे चिपका उसके नीचे लिखा- बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में बाढ़ से पीडि़त की सहायता करते बच्चों के मसीहा मास्साब! बच्चों के आगे मिड-डे-मील खिलाते हुए अपने पल रखे और फोटो खिचवा उसके नीचे लिख दिया- भूखे बच्चों को खाना खिलाते हुए मास्साब! हाथ में टूटी हत्थी वाला बेलचा पकड़ाए फोटो भर खिचवाया , उस फोटो के नीचे लिखा-महीनों से गिरी सड़क ठीक करते मास्साब!। अपनी मरती बीमार मां के पास महीनों बाद गांव गए और उसके मुंह के आगे अपना खाली हाथ ले जाकर फोटो खिचवा डाला और उसके नीचे लिख दिया- आदर्श रामआरेजी गरीब-बेसहारा को दवाई खिलाते हुए... खाली पानी का....’ ‘पुरस्कार पाने को यह सब झूठ-मूठ करना पड़ता है?’ रामआसरेजी पूछते चौंके तो मैंने अपने अनुभव को आगे बढ़ाते कहा, ‘यह नहीं। इससे भी आगे बहुत कुछ। जब मुझे बेस्ट टीचर का अवार्ड मिला था तो मैंने स्कूल से दो महीने गायब रहकर ऐसे ही बहुत से कागज जुटाए थे।’ ‘गायब रहकर?’ ‘तो क्या छुट्टी लेता? इसमें बुरी बात क्या है? पुरस्कार सरकारी था। तो उसे पाने की कोशिश भी तो सरकारी टाइम में ही होनी चाहिए न!’ ‘फिर!’ ‘फिर क्या! देखते ही देखते मेरे पास इतने सचे झूठे प्रमाणपत्र हो गए कि.... मैंने वे सब आगे बढ़ाए और मैं पुरस्कार को प्यारा हो गया!’ ‘मतलब, तुमने केवल बच्चों को पढ़ाने को लेकर ही अप्लाई नहीं किया था?’ ‘बिलकुल नहीं। अरे छोड़ो रामआसरे जी! यहां पढ़ाने वालों को पूछता ही कौन है? इसलिए पुरस्कृत होना है तो नकाम टीचर नहीं सकाम टीचर बनो। अगली बार जरा संभल कर.... अपने हिसाब से मैं जितना उनको समझा सकता था उनको उतना समझाया और आगे हो लिया। जो आपसे उनका याराना हो तो आप भी उनको समझा बुझा दीजिएगा। आपका भी भला होगा। अच्छा लगेगा जो किसी के समझाने से पात्र पुरस्कृत हो जाए।