Monday, October 14, 2019 10:55 AM

अपेक्षाओं का बही-खाता

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

 

वित्त मंत्री को चाहिए था कि देश में बढ़ते जल संकट को देखते हुए रिचार्ज वेल, जिसमें बरसात के पानी को सीधे भूगर्भीय जलाशयों में डाला जाता है, उसके लिए विशाल रकम उपलब्ध कराती। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ने कहा था कि देश में एक करोड़ इस प्रकार के रिचार्ज वेल बनाने के लिए लगभग 80 हजार करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी, जिसको बजट को उपलब्ध कराना था...

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा एक अच्छा एवं संतुलित बजट पेश किया गया है। पेट्रोल के आयात पर एक रुपए प्रति लीटर की कस्टम ड्यूटी बढ़ाई है, जो कि स्वागत योग्य है। इससे सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी, देश में पेट्रोल की खपत कम होगी और साथ-साथ हमारी आयातों पर निर्भरता घटेगी। उन्होंने तमाम माल जैसे पीवीसी, काजू, टाइल्स, ऑटो पार्ट्स, आप्टिकल फाइबर, केबल इत्यादि पर आयात कर बढ़ाए हैं। यह कदम सही दिशा में है, क्योंकि ऐसा करने से आयातित माल महंगे हो जाएंगे और घरेलू उत्पादन को बढ़ाने का मौका मिलेगा। साथ ही कुछ कच्चे माल पर आयात कर घटाए हैं, जो भी सही दिशा में है, क्योंकि इससे घरेलू उत्पादन की लागत घटेगी और देश में उत्पादन बढ़ेगा। तमाम देशों को समझ में आ गया है कि मुक्त व्यापार से उन देशों को लाभ होता है, जो कि अपने पर्यावरण को नष्ट करके सस्ता माल बनाते हैं, जैसे चीन। इसलिए संपूर्ण विश्व संरक्षणवाद की ओर बढ़ रहा है। घरेलू उत्पादन बढ़ेगा, तो उसमें रोजगार बढ़ेंगे, रोजगार बढ़ेंगे, तो घरेलू बाजार में मांग बढ़ेगी और हमारी जीडीपी में भी वृद्धि होगी। वित्त मंत्री ने सेवा क्षेत्र के विस्तार के लिए अप्रत्यक्ष रूप से कई बातें कही हैं, जो कि सही दिशा में हैं। जैसे अंतरिक्ष में इसरो द्वारा किए गए रिसर्च का वाणिज्यिक लाभ उठाने के लिए न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड नाम की इकाई की स्थापना की बात कही है।

आम आदमी की कुशलता बढ़ाने में विदेशी भाषा को पढ़ाने को बढ़ावा दिया है, जो कि सही दिशा में है। इससे भारत के नागरिक तमाम विदेशी भाषाओें में अनुवाद आदि का कार्य कर सकेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के उभरते क्षेत्रों में निवेश की बात की है। आने वाले समय में इन क्षेत्रों में रोजगार बनने की संभावना है। पारंपरिक उत्पादों के ग्लोबल इंडिकेटर को हासिल करने का प्लान बनाया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत विशेष स्थान पर कारीगरों द्वारा बनाए गए विशेष उत्पाद जैसे बनारस की साड़ी के ऊपर वैश्विक पेटेंट मिल सकेगा और उस प्रकार की साड़ी किसी दूसरे देश को बनाने तथा बेचने का अवसर नहीं मिलेगा। 17 विशेष पर्यटन स्थानों को विश्व स्तर का बनाने का संकल्प लिया है। ये तमाम कार्य भारत में सेवा क्षेत्र के विस्तार की तरफ सरकार की रणनीति को इंगित करते हैं, जो कि पूर्णतया स्वागत योग्य है। फिर भी वित्त मंत्री को कुछ बिंदुओं पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। पहला बिंदु वित्तीय घाटे का है। एनडीए प्रथम सरकार ने वित्तीय घाटे पर लगातार नियंत्रण किया है। उसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए वित्त मंत्री ने वर्तमान वर्ष में वित्तीय घाटे को 3.4 प्रतिशत से घटा कर 3.3 प्रतिशत करने की बात कही है, लेकिन वित्तीय घाटे में यह कटौती पूर्णतया पूंजी निवेश में कटौती करके हासिल की गई है। सरकार की खपत में निरंतर वृद्धि हो रही है। वित्तीय घाटे के दो हिस्से होते हैं- पूंजी घाटा और चालू घाटा। सरकार द्वारा बाजार से निवेश को लिए गए ऋण को पूंजी घाटा कहते हैं। सरकार द्वारा बाजार से अपनी खपत, जैसे सरकारी कर्मियों को वेतन देने को लिए गए ऋण को चालू घाटा कहते हैं। सरकार को चाहिए कि पूंजी घाटे को बढ़ने दे, लेकिन चालू घाटे पर नियंत्रण करे। पूंजी घाटे के बढ़ने से यदि वित्तीय घाटा बढ़ता है, तो चिंता न करे। दूसरा कदम जीएसटी के ढांचे में परिवर्तन का होना चाहिए था। वर्तमान में जीएसटी का मूल चरित्र छोटे उद्योगों के विपरीत है। पूरे देश में एक बाजार होने से उन बड़े उद्योगों को विशेष लाभ हुआ है, जो कि एक राज्य से दूसरे राज्य को अपना माल बड़ी मात्रा में भेजते हैं। छोटे उद्योगों को पूर्व में अपने राज्य की सरहद पर मिलने वाला स्वाभाविक संरक्षण समाप्त हो गया है। जैसे सूरत के कपड़े को हरिद्वार लाने में जो पूर्व में उत्तराखंड की सरहद पर हरिद्वार के व्यापारी को संरक्षण मिलता था, वह अब समाप्त हो गया है। इस कारण छोटे उद्योग दबाव में हैं, रोजगार दबाव में हैं, अर्थव्यवस्था में मांग नहीं है और हमारी जीडीपी की ग्रोथ रेट सपाट पड़ी हुई है। जीएसटी में छोटे उद्योगों के लिए कंपाउंडिंग स्कीम है, लेकिन इस स्कीम में छोटे उद्योगों द्वारा जो कच्चा माल खरीदा जाता है, उस पर जो जीएसटी अदा की जाती है, उसका उन्हें रिफंड नहीं मिलता है। आज यदि कोई बड़ा उद्योग कंपाउंडिंग स्कीम वाले छोटे उद्योग से माल खरीदे, तो छोटे उद्योग द्वारा अदा किया गया जीएसटी का सेट ऑफ नहीं मिलता है। बड़ा उद्योग यदि दूसरे बड़े उद्योग से खरीदे, तो विक्रेता द्वारा अदा किए गए जीएसटी का सेट ऑफ मिलता है। इसलिए बड़े उद्योगों के लिए यह लाभप्रद होता है कि किसी माल को छोटे उद्योग से खरीदने के बजाय वे बड़े उद्योगों से खरीदें। इस मसलों का उपाय यह है कि कंपाउंडिंग स्कीम में छोटे उद्योगों द्वारा कच्चे माल की खरीद पर अदा की गई जीएसटी का नगद रिफंड देने की व्यवस्था की जाए। तब छोटे उद्योग की लागत कम हो जाएगी। वे अपना माल बड़े उद्योग की प्रतिस्पर्धा में बेच सकेंगे। तीसरा, क्षेत्र जहां पुनर्विचार करने की जरूरत है, वह सार्वजनिक बैंकों का है।

बजट में वित्त मंत्री ने आगामी वर्ष में सत्तर हजार करोड़ रुपए की विशाल रकम सरकारी बैंकों की पूंजी में वृद्धि के लिए आवंटित करने की बात कही है। यह रकम मुख्यतः सरकारी बैंकों के भ्रष्टाचार एवं अकुशलता को पोषित करने में व्यय हो जाएगी। जरूरी था कि सरकारी बैंकों का निजीकरण कर दिया जाता। निजी बैंकों को वांछित दिशा में धकेलने के लिए रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त अधिकार उपलब्ध हैं, जैसे प्रायोरिटी सेक्टर को ऋण देने को मजबूर करने के लिए रिजर्व बैंक निजी बैंकों को आदेश दे सकता है अथवा पिछड़े क्षेत्रों में शाखा खोलने के लिए रिजर्व बैंक उन्हें कह सकता है। अतः इन बैंकों को सरकारी छतरी के अंदर रखे रहने का कोई औचित्य नहीं है। इनका भी एयर इंडिया की तरह निजीकरण करने का सरकार को प्रयास करना चाहिए था। चौथा बिंदु पानी की समस्या पर है। यद्यपि वित्त मंत्री ने कहा है कि भूगर्भीय जल के पुनर्भरण के लिए बोरवेल बनाने का कार्यक्रम सरकार लेगी, लेकिन इसके लिए राशि उन्होंने सरकारी बजट में आवंटित नहीं की है, बल्कि जंगल के पुनर्स्थापन के लिए बनाए गए फंड कांपा के माध्यम से यह रकम उपलब्ध कराने की बात कही है।

यह रास्ता पेचीदा और अनिश्चित है। वित्त मंत्री को चाहिए था कि देश में बढ़ते जल संकट को देखते हुए रिचार्ज वेल, जिसमें बरसात के पानी को सीधे भूगर्भीय जलाशयों में डाला जाता है, उसके लिए विशाल रकम उपलब्ध कराती। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ने कहा था कि देश में एक करोड़ इस प्रकार के रिचार्ज वेल बनाने के लिए लगभग 80 हजार करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी, जिसको बजट को उपलब्ध कराना था। इन कुछ पहलुओं के बावजूद यह बजट एक अच्छा बजट है। इसमें विशेष दो बातें हैं। एक  यह कि आयात कर बढ़ाकर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया गया है और दूसरा सेवा क्षेत्र में सरकारी निवेश बढ़ाकर देश की अर्थव्यवस्था को इस तरफ मोड़ा गया है।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com