Sunday, November 17, 2019 03:24 PM

अप्रासंगिक होते शहरी स्कूल

कम संख्या के सरकारी स्कूलों के दरवाजे बंद करने की हिम्मत अगर हिमाचल सरकार दिखाती है, तो यह कवायद कालेजों की छात्र संख्या को देखते हुए भी लागू होनी चाहिए। जाहिर तौर पर दस से बीस छात्रों पर आधारित प्राथमिक स्कूल चलाने में आर्थिक व व्यावहारिक दिक्कतें हो सकती हैं, लेकिन खामियां तो बिना किसी शैक्षणिक आधार के शिक्षा विस्तार से बढ़ी हैं। मसलन छात्र संख्या या भौगोलिक कारणों के बिना जांचे परखे शिक्षण संस्थानों को स्तरोन्नत करके सरकारों ने महज सियासी उत्कंठा को संतुष्ट किया है। ऐसे कई जमा दो स्कूल हैं, जहां छात्र तो दस से बीस हैं, लेकिन हर विषय को पूरी तरह से पढ़ाने के लिए पीजीटी अध्यापकों की नियुक्तियों से खर्चे की कोई पाबंदी नहीं रही। कमोबेश हर स्कूल में विज्ञान, कॉमर्स व आईटी जैसे विषय पढ़ाने के लिए राजनीतिक दबाव रहता है, जबकि विषय के प्रति रुचि या स्वाभाविक ज्ञान की शर्तें पूरी नहीं होतीं। हिमाचली शिक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक धन का व्यय सही अर्थों में, शिक्षा के निष्कर्ष और लक्ष्य पूरे नहीं कर रहा। सरकारी स्कूल का प्रति छात्र व्यय निरंतर बढ़ रहा है। प्राथमिक सरकारी स्कूलों में प्रति छात्र व्यय करीब 27073 रुपए है, जबकि निजी स्कूलों में यह 4383 रुपए आंका गया है। यहां व्यय का सबसे अधिक हिस्सा शिक्षकों के वेतन हैं, जबकि निजी स्कूलों में खर्च की किफायत में अध्यापक पर किए खर्च से कहीं अधिक छात्र अपना शुल्क अदा करते हैं। उच्च शिक्षा में हिमाचल के व्यय का मूल्यांकन गुणवत्ता के लिहाज से करें, तो निराशा बढ़ जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर कालेजों में छात्र संख्या की औसत 707 के करीब रही है, जबकि हिमाचल में यह औसतन 505 छात्रों पर एक कालेज है। दिल्ली के हिसाब से मूल्यांकन करें, तो हिमाचल में कुल उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या (उपलब्ध सर्वेक्षण के अनुसार) 236 है, जबकि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में यह संख्या 153 तक ही पहुंची, लेकिन गुणवत्ता के हिसाब से हिमाचल ने उच्च शिक्षा का महत्त्व ही खो दिया। कालेज सामान्य हों, व्यावसायिक हों या विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा हो, हिमाचली छात्र के लिए केवल डिग्री की उपासना ही पूरी हो रही है। ऐसे में एक दिन वे स्कूल भी निकम्मे माने जाएं, जहां शिक्षा में विस्तार के लक्ष्यों में छात्र ज्ञान अपने निचले स्तर पर है। कम से कम शहरी परिधि में सरकारी स्कूलों का संचालन कड़ी शर्तों पर हो यानी वहां छात्र-अध्यापक अनुपात की न्यूनतम दर पर प्रश्न उठें। यह आश्चर्यजनक स्थिति है कि प्रमुख शहरों की परिधि में स्कूलों की तादाद को अगर आठ से दस किलोमीटर के दायरे में पढ़ा जाए, तो सबसे कम छात्रों के लिए अधिकतम शिक्षक उपलब्ध हैं। ये सभी अध्यापक एक तरह से वीआईपी फर्ज अदायगी में शिक्षा को गौण कर रहे हैं। अतः शहरी स्कूलों में व्यवस्थागत परिवर्तन की जरूरत है। हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि कोई भी सरकार स्थानांतरण नीति या नियमों की फेहरिस्त को पारदर्शी बनाएगी और न ही यह संभव है कि हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम पढ़ा कर ऐसे स्कूलों में शहर का उच्च वर्ग पढ़ने आएगा। अतः शहरी स्कूलों में इनकी प्रासंगिकता का प्रश्न समझना होगा। प्रति छात्र लागत में हिमाचल के शहरी स्कूल सबसे अधिक शिक्षा का बजट जाया कर रहे हैं, जबकि अधोसंरचना व शिक्षकों की तादाद की अति न्यूनतम दर से छात्र लाभान्वित हो रहे हैं। ऐसे में इन स्कूलों को प्रासंगिक बनाने के लिए या तो पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत चलाना होगा या इन्हें सीबीएसई या आईसीएसई पाठ्यक्रम के तहत चलाना होगा ताकि प्रतिभाशाली बच्चे पढ़े सकें, वरना प्रवासी मजदूरों के बच्चे ही अब ऐसे स्कूलों की इज्जत बचा रहे हैं।