Monday, June 01, 2020 12:58 AM

अलमारी में सजी किताबें आजाद हो रही हैं

पवन चौहान

मो.-9805402242

पिछले कुछ समय से पूरी दुनिया कोरोना के संकट से गुजर रही है और इससे भारत भी अछूता नहीं रहा है। संकट के इस दौर में जब लॉकडाउन जारी हुआ तो सब घरों में कैद हो गए। अब समय ही समय था। बहुत कुछ किया जा सकता था। बहुत कुछ रचा जा सकता था। लेकिन इस महामारी के शुरुआती दिनों में कुछ भी पढ़ना-लिखना न हो सका। बस, एक उदास माहौल से घिरा रहा। फिर धीरे-धीरे जब इस सबकी आदत-सी हो गई तो कुछ पढ़ने-लिखने का मन बनने लगा। सबसे पहले भीष्म साहनी द्वारा अनुदित चिंगिज आइत्मातोव का लघु उपन्यास ‘पहला अध्यापक’ दोबारा पढ़ा। बहुत मजा आया। एक पत्रिका द्वारा मांगे गए आलेख ‘शारीरिक श्रम के प्रति सम्मान पैदा करने में बाल साहित्य की भूमिका’ को कलमबद्ध किया। इस विषय को लेकर अपने समकालीनों के साथ-साथ वरिष्ठों के साथ भी चर्चा हुई। जब आलेख पूरा हुआ तो काफी संतोष मिला। एक बाल कहानी भी लिखी जो लड़कियों की हिम्मत और बहादुरी को दर्शाती है। मुरारी शर्मा का सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह ‘ढोल की थाप’ और नीलिमा शर्मा के संपादन में प्रकाशित पुस्तक ‘लुकाछिपी’ भी पढ़ी। मुरारी जी का संग्रह जहां गांव का ताजा चेहरा पेश करता है, वहीं ‘लुकाछिपी’ प्रौढ़ साहित्यकारों की कहानियों से सजा साझा संग्रह है जो बाल मनोविज्ञान पर बात करता है। एसआर हरनोट जी का कहानी संग्रह ‘कीलें’ अधूरा रह गया था। अब उसे पूरा कर रहा हूं।

प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित ‘सुशील कुमार फुल्ल की लोकप्रिय कहानियां’ को इसके बाद शुरू करना है। पठन का कार्य जारी है और सुखकर भी। हम कभी अपने बुजुर्गों से भारत-विभाजन, चीन युद्ध और 84 के दंगों के डरावने और परेशान कर देने वाले किस्से अक्सर सुनते थे। किसी आपदा से हमारा भी पाला पड़ना था, कभी सोचा नहीं था। परंतु कोरोना का यह वैश्विक संकट अब तक लाखों लोगों को लील चुका है। यह बहुत दुखद और परेशान कर देने वाला है। हम सबके जीवनकाल का यह एक काला अध्याय है। इस बीच सोशल मीडिया से संपर्क व्हाट्सऐप, फेसबुक आदि के साथ रहा। समाचारपत्र को अब भी ई-पेपर के माध्यम से पढ़ता हूं। मीडिया में हर तरफ  सिर्फ  कोरोना का ही शोर है। परंतु इसी बीच साहित्य की कुछ पोस्ट बहुत सुकून देती रहती हैं। कुछ नया पढ़ने और समझने का प्रयास करवाती हैं। बहुत सारे व्हाट्सऐप ग्रुप हैं, लेकिन इनमें चाहकर भी शामिल नहीं हो पाता हूं। परंतु इक्का-दुक्का ग्रुप्स ऐसे हैं जहां की साहित्यिक चर्चाएं (विशेषतः बाल साहित्य और प्रौढ़ कविता पर) साहित्यिक खुराक देती रहती हैं। यह बहुत तसल्ली देता है। लेकिन प्रौढ़ कहानी पर ऐसे ग्रुप्स में बहुत कम बात हो पाती है। कई बार यह बात बहुत अखरती है। बड़ी कहानी मोबाइल में पढ़ने पर जरूर मुश्किल पैदा करती है, लेकिन इसका दूसरे तरीकों से भी लुत्फ  उठाया जा सकता है। जैसे कहानी रिकार्ड करके सुनाकर आदि-आदि। वैसे इन दिनों अपनी दो किताबों पर भी कार्य कर रहा हूं। एक बाल कहानी और दूसरी लोक संस्कृति के एक पक्ष को लेकर है। बाल कहानियों की पुस्तक के चित्र मेरी बेटी आस्था स्वयं बना रही है जिसे लेकर मैं बहुत उत्साहित हूं।

इस समय पढ़ने में जितना मन रम रहा है, उतना लिखने में नहीं। बस इस लॉकडाउन में सुखद यही है कि जो लंबे समय तक एक स्थान पर बैठने की आदत लेखक में बनी होती है, वह इस वक्त काम आ रही है। अपनी रुचि की किताबों की सूची बना ली है। कब से अलमारी में सजी किताबें पंख फैलाए एक-एक कर आजाद हो रही हैं तथा इस समय को सहजता और रचनात्मकता में बिताने में बराबर का सहयोग कर रही हैं। अच्छा लग रहा है किताबों के बीच में लॉक होना। इन सबके बीच एक उम्मीद जरूर बार-बार दस्तक दे रही है कि हम जल्द ही कोरोना से जंग जीतकर प्रकृति के साथ किए अपने दुर्व्यवहार को याद करते हुए फिर से खुली हवा में सांस लेंगे।