अविवेकी मानव गतिविधियों से ढहता हिमाचल

किशन बुशैहरी

नेरचौक, मंडी

नब्बे प्रतिशत भू-स्खलन मानसून में तथा शीतकालीन वर्षा के दौरान ही होते हैं, परंतु मानव द्वारा घटित कई गतिविधियां इसकी प्रमुख कारक हैं। जैसे प्रदेश में विभिन्न विद्यतु परियोजनाआें के निर्माण व पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण स्थलों पर किए जा रहे शक्तिशाली विस्फोट, अत्यधिक निर्माण भी इसके प्रमुख कारक हैं...

अगर वर्तमान में मानव प्रकृति की स्वतंत्रता व संतुलन का पक्षधर होता, तो शायद मानव प्रगति के नए आयाम स्थापित करने में और अधिक सक्षम होता, परंतु विडंबना यह है कि मानव प्रकृति के अपने संतुलन व सामंजस्य को समझने में निरंतर पिछड़ रहा है। प्रारंभिक विश्लेषणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि देश व प्रदेश में होने वाली प्राकृतिक आपदाओं की अधिकतता में मानव निर्मित कारकों का योगदान अत्यधिक है। हिमाचल प्रदेश की विकट भौगोलिक परिस्थितियां व हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं का घटित होना एक स्वाभाविक प्राकृतिक प्रक्रिया है, परंतु प्रदेश में इन घटनाओं की निरंतर बढ़ोतरी एक चिंतनीय विषय बनकर उभरा रहा है। प्रदेश में भू-स्खलन वास्तव में एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है, जो प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं के उपरांत सबसे अधिक अप्राकृतिक मौतों से मानवीय क्षति पहुंचा रही है, जिसके परिणामस्वरूप प्रदेशवासी असमय ही मृत्यु का ग्रास बन रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण विगत वर्ष अगस्त माह में मंडी जिला के कोटरूपी में भू-स्खलन से लगभग 50 से अधिक मानवीय अकाल मौतें हमारे समक्ष हैं। इस स्थान पर निरंतर हो रहा भू-स्खलन स्थानीय प्रशासन के लिए एक गंभीर समस्या बन कर उभरी है। भू-स्खलन का शाब्दिक अर्थ है कि भूमि का अपने मूल स्थान से खिसकना या पहाड़ी क्षेत्र में मिट्टी या मलबे का नीचे और बाहर की ओर खिसकने की प्रक्रिया को ही भू-स्खलन कहते हैं। भू-स्खलन एकमात्र हिमाचल प्रदेश की ही समस्या नहीं है, अपितु भारतवर्ष व संपूर्ण विश्व के प्रत्येक पहाड़ी क्षेत्र की समस्या है। विश्व के विकसित देश जैसे अमरीका, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस आदि देशों ने भू-स्खलन रोकने संबंधी तर्कसंगत कानून एवं नियम तय करने के अतिरिक्त अत्याधुनिक तकनीक के माध्यम से इस प्राकृतिक आपदा को एक निर्धारित सीमा तक रोकने में सफलता प्राप्त कर चुके हैं। लंदन के शेफिल्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार विश्व में भू-स्खलन की घटनाओं से होने वाली आपदाओं की दृष्टि से भारत शीर्ष पर है। जून, 2013 को उत्तराखंड के केदारनाथ तीर्थ धाम में लगभग 6000 लोग भू-स्खलन की चपेट में आ गए थे। परंतु विगत तीन दशकों से हिमाचल प्रदेश में जिस प्रकार से मानव गतिविधियों के कारण अत्यधिक एवं अव्यवस्थित विकास के नाम पर विभिन्न विद्युत परियोजनाओं का निर्माण, अवैध व अवैज्ञानिक खनन एवं अंधाधुंध वन कटाव के परिणामस्वरूप प्रदेश में भू-स्खलन, भूक्षरण, बादल फटना एवं भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं निरंतर जारी हैं। प्रदेश में भू-स्खलन सर्वाधिक मात्रा में हो रहा है। आज प्रदेश में यह स्थिति है कि बिना किसी अवरोध के भारी व अत्याधुनिक मशीनों द्वारा रात भर में ही पहाड़ी को अवैज्ञानिक व गैर कानूनी ढंग से खनन कर, पहाड़ों को काटकर समतल भू-खंड तैयार किए जा रहे हैं, जिसके कारण प्रदेश में भू-स्खलन की घटनाओं से प्रदेशवासियों को अत्यधिक आर्थिक हानि हो रही है। विगत दिनों भारी वर्षा के कारण प्रदेश के विभिन्न जिलों में भयंकर बाढ़ के उपरांत, भू-स्खलन की घटनाओं के कारण प्रदेश की सड़कों के क्षतिग्रस्त होने से यातायात व्यवस्था का अवरुद्ध होना व प्रदेश की शिक्षण संस्थाओं को दो कार्य दिवसों के लिए बंद करना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। भू-स्खलन की घटनाओं का विश्लेषण एवं चिंतन करने पर यह स्पष्ट होता है कि इसका कोई भी एक विशेष कारण नहीं है।

नब्बे प्रतिशत भू-स्खलन मानसून में तथा शीतकालीन वर्षा के दौरान ही होते हैं, परंतु मानव द्वारा घटित कई प्रकार की गतिविधियां इसकी प्रमुख कारक हैं। जैसे प्रदेश में विभिन्न विद्यतु परियोजनाआें के निर्माण व पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण स्थलों पर किए जा रहे शक्तिशाली विस्फोट, अवैध अवैज्ञानिक खनन, वनों का सिकुड़ना और मानव आबादी का विस्तार, अत्यधिक निर्माण भी इसके प्रमुख कारक हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि मानवीय गतिविधियों के कारण भू-स्खलन की घटनाओं में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है, जो कि भविष्य में प्राकृतिक असंतुलन को इंगित करता है। भू-स्खलन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसकी भयावहता से होने वाली आर्थिक व जान-माल की क्षति से बचने के लिए हम कुछ उपाय करके इस आपदा से बचाव कर सकते हैं।

हिमाचल प्रदेश में इस प्राकृतिक आपदा में कमी या इसको रोकने के लिए सर्वप्रथम प्रदेशवासियों को इस आपदा की भयावहता के प्रति जागरूक करना होगा, क्योंकि प्रदेश में अधिकांश निर्माण तकनीकी रूप से निर्धारित कानून की अवहेलना करके ही किया जाता है। सरकार को प्रदेश विधानसभा में भू-संरक्षण व भू-स्खलन की रोकथाम करने हेतु प्रभावी बिल या अधिनियम पास करवाकर मजबूत नियम एवं कानून बनाना चाहिए। सरकार द्वारा प्रदेश के सभी जिलों में भू-स्खलन से प्रभावित क्षेत्रों व भू-खंडों को चिन्हित कर उन स्थलों पर किसी भी प्रकार के निर्माण के लिए स्थानीय प्रशासन को सशक्त कानूनी अधिकार देने होंगे। प्रमुखतः प्रदेश की पंचायती राज संस्थाएं एवं नगर निकाय इस आपदा में कमी लाने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वहन कर सकते हैं, क्योंकि किसी भी स्थल पर निर्माण हेतु इन संस्थानों की अनुमति लेना आवश्यक होता है, प्रशासन को चिन्हित भू-स्खलन प्रभावित स्थल पर निर्माण हेतु विशेष अनुमति का प्रावधान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त विभिन्न सरकारी विभागों जैसे वन विभाग, लोक निर्माण विभाग, राजस्व विभाग, भवन निर्माण विभाग में इसके लिए समन्वय स्थापित कर इस आपदा को खत्म तो नहीं, परंतु कुछ सीमा तक कम किया जा सकता है।

 

Related Stories: