Wednesday, October 23, 2019 08:52 AM

अशोक चक्र का कर्ज

अशोक चक्र विजेता के परिवार को अगर अपने सम्मान की चिंता करनी पड़ रही है, तो शहीदों के प्रति हमारे ढकोसले कब जक सफेदपोश बने रहेंगे। शांतिकाल के सर्वोच्च सम्मान में लिपटा शहीद मेजर सुधीर वालिया का शौर्य, आज अगर एक दरख्वास्त के मानिंद प्रशासन और सरकार से विनती कर रहा है, तो इसे क्या कहेंगे। अंततः पालमपुर के उपमंडलाधिकारी के पास शहीद परिवार की फरियाद का निष्पादन अपने आप में विडंबना है, क्योंकि वर्षों बाद भी एक अदद प्रतिमा के लिए यह नौबत आ गई। आश्चर्य व दुख इस बात को लेकर कि शहीद परिवार की मांग को लेकर शौर्य के सारे मेडल पैरवी कर रहे हैं। बीस साल कम नहीं होते और न ही अशोक चक्र का देश पर कर्ज इतना कमजोर है कि वर्षों बाद एक प्रतिमा की स्थापना न हो पाए। ऐसा भी नहीं कि हिमाचल की सरकारों ने शहीदों की याद में दीपक नहीं जलाए या शौर्य के प्रतीक समर्पित नहीं किए, फिर भी शहीद वालिया की याद का चिराग क्यों उदास रहा। पालमपुर को अपने बेटों की शहादत ओढ़ने का गौरव प्रदान है, तो तमाम प्रतीकों के बीच शहीद वालिया का स्थान क्यों रिक्त रहा। जो भी सवाल शहीद परिवार ने उठाए हैं, उन पर गौर करें, तो ताज्जुब होता है कि इन्हें आज तक नजरअंदाज किया जाता रहा या अवसर विशेष पर भी आमंत्रित नहीं किया गया। शहीद परिवार की व्यथा किसी सामान्य और जीवित इनसान के बजाय उस महान योगदान से जुड़ती है जो हर शहादत के ऐतिहासिक उल्लेख से राष्ट्र की अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने का वचन है। कोई भी सैनिक अपने प्राणों की आहुति किसी शर्त या सम्मान के बजाय राष्ट्रीय जज्बात और फर्ज की पराकाष्ठा पर देता है। जब 29 अगस्त, 1999 को कुपवाड़ा क्षेत्र में आतंकियों के खिलाफ मेजर सुधीर वालिया ने अपने पराक्रम की अमर कहानी लिखी, तो पलभर भी यह न सोचा होगा कि जान को हथेली पर रखकर पीछे परिवार का क्या होगा और न ही मां-बाप ने बेटे की शहादत का अफसोस किया होगा, लेकिन परिस्थितियों ने एक जटिल प्रश्न खड़ा किया है। देश की खातिर जो शहीद होते हैं, क्या उनके नाम से हमारा स्वाभिमान इतना उदासीन हो सकता है कि बार-बार उन राहों को याद दिलानी पडे़गी, जिनसे गुजरकर कोई हिमाचली सिर पर कफन बांध कर निकला होगा। हिमाचल के कई शिक्षण संस्थानों के माथे पर राजनेताओं के निशान चस्पां हैं, तो क्या यही हमारी विरासत बन जाएगी। वे तमाम समारोह, राष्ट्रीय त्योहार और शहीदों को मिलती सलामी अप्रासंगिक हो जाएंगी, अगर कहीं शहीद वालिया के परिवार को शिकायत रहेगी कि उनके साथ इनसाफ नहीं हुआ। मां-बाप के सामने औलाद की कुर्बानी का गौरव यही है कि सरकार और समाज ऐसे योगदान को सदा याद रखे। विडंबना यह भी है कि हिमाचल के शिक्षा विभाग या स्कूल शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में ऐसे पाठ नहीं पढ़ाए गए, जो ऐसे नायकों को समर्पित रहते। हमारे वजूद की ऐसी निशानियों को अगर कुंठित रखा गया, तो जज्बात की आंधियां कैसे पैदा होंगी। हिमाचल को अपने सैन्य शौर्य को हमेशा-हमेशा जिंदा रखना है, तो त्वरित शहीद वालिया के परिवार को न्याय देना होगा। यह मसला यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि नीतिगत आधार पर हर शहादत को पूजने की एक सशक्त परिपाटी बनानी होगी तथा समय-समय पर पुस्तक प्रकाशनों, डाक्यूमेंटरी और स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रमों के जरिए आने वाली पीढ़ी को ऐसे नायकत्व से वाकिफ भी कराना होगा।