‘असंगठित’ उद्योग की महत्ता

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

युवाओं की बड़ी आबादी का मतलब है कि छोटे से छोटे अवसर के लिए भी युवाओं की बड़ी संख्या उस अवसर का लाभ उठाने की जुगत कर रही होगी। नौकरी की तो बात ही छोडि़ए, फीस देकर पढ़ाई करने वालों में भी ऐसी गलाकाट प्रतियोगिता है। आज हालत यह है कि बड़े शहरों में नर्सरी क्लास में नन्हे-नन्हे बाल-गोपालों के दाखिले के लिए तगड़ी सिफारिश, रिश्वत या डोनेशन आम बात है...

135 करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में युवाओं की संख्या विश्व भर में सर्वाधिक है और हम इस बात पर बहुत गर्व करते प्रतीत होते हैं कि हम विश्व के सर्वाधिक युवा देश हैं। देश में युवाओं की आबादी सर्वाधिक होने के अपने लाभ हैं, लेकिन इसी कारण जो चुनौतियां दरपेश हैं उनकी चर्चा बहुत कम है। युवाओं की बड़ी आबादी का मतलब है कि छोटे से छोटे अवसर के लिए भी युवाओं की बड़ी संख्या उस अवसर का लाभ उठाने की जुगत कर रही होगी। नौकरी की तो बात ही छोडि़ए, फीस देकर पढ़ाई करने वालों में भी ऐसी गलाकाट प्रतियोगिता है कि किसी अच्छे कालेज में दाखिला लेना भी एक प्रोजेक्ट हो जाता है। आज हालत यह है कि बड़े शहरों में नर्सरी क्लास में नन्हे-नन्हे बाल-गोपालों के दाखिले के लिए तगड़ी सिफारिश, रिश्वत या डोनेशन आम बात है। पंजाब एक ऐसा प्रदेश है जो हाल ही में युवाओं में फैलते नशे की आदत के कारण बदनाम हुआ जबकि इससे पहले यह कबूतरबाजी के लिए भी बदनाम रहा है। पंजाब से विदेशों में पढ़ाई के लिए जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी काफी है। विदेश जाकर पढ़ाई करने के इच्छुक एक विद्यार्थी से जब मैंने इस बारे में पूछताछ की तो उसने बताया कि भारतवर्ष में उसे अपने मनचाहे कालेज में दाखिला नहीं मिल रहा है, इसलिए उसने विदेश जाकर पढ़ाई करने का निश्चय किया है। जिस देश में नर्सरी क्लास में दाखिले के लिए रिश्वत देनी पड़े, वहां युवकों को नौकरी के कैसे लाले होंगे यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। यही कारण है कि बैंकों में चपरासी तथा रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती के लिए उच्च शिक्षित युवकों में भी होड़ लगी रहती है। यह खबर बहुत चर्चा का विषय बनी थी कि राजस्थान में एक विधायक के बेटे को चपरासी की नौकरी के लिए चुना गया है।

समस्या यह है कि हमारे देश में यह धारणा आम है कि नौकरी देना सरकार का कर्त्तव्य है। यह समझना आवश्यक है कि सरकारी नौकरियां न केवल सीमित हैं, बल्कि वे हमेशा सीमित ही रहेंगी। सरकार का काम नौकरी देना नहीं है। सरकार का काम है कि वह ऐसे नियम-कानून बनाए कि उद्योग फल-फूल सकें और अधिक से अधिक रोजगार पैदा कर सकें। समस्या यह है कि यह धारणा सिर्फ जनता में ही नहीं है बल्कि राजनीतिज्ञों में भी आम है कि नौकरी देना सरकार का कर्त्तव्य है। यही कारण है कि सरकारें बार-बार नई नौकरियां देने की घोषणाएं करती हैं और फिर अपनी ही घोषणाओं के जाल में फंस कर जोड़-तोड़ से नौकरियां बनाने के चक्रव्यूह में उलझ जाती हैं। इसी तरह की एक दूसरी गलतफहमी यह है कि बड़े उद्योग लगने से रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी। तकनीक में तेजी से उन्नति के लिए हमें विश्व भर में फैले वैज्ञानिकों का आभारी होना चाहिए, लेकिन तकनीकी उन्नति ने जहां हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं बड़े उद्योगों में मशीनों, कम्प्यूटरों और रोबोट का दखल बढ़ते जाने से इनसानों के लिए रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं। यह सही है कि आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस के चलते उद्योगों का विकास हुआ है, लेकिन इससे रोजगार के अवसर संकुचित हुए हैं। एक और बड़ी गड़बड़ यह है कि रोजगार कार्यालयों में दर्ज बेरोजगारों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो कम पढ़े-लिखे तो हैं ही, उनमें कोई तकनीकी योग्यता भी नहीं है। इस कारण उन्हें या तो नौकरी मिलती ही नहीं, और अगर मिलती भी है तो तनख्वाह चिडि़या के चुग्गे जैसी होती है। उन्हें रोजगार के काबिल बनाना एक बड़ी चुनौती है और इसके बिना मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया जैसी सभी घोषणाएं कागजी बन कर रह जाती हैं।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कुछ श्रम शक्ति का एक बहुत छोटा भाग ही संगठित क्षेत्र में कार्यरत है। सच तो यह है कि हमारी बहुसंख्य श्रमशक्ति कृषि, बागबानी तथा अन्य छोटे-छोटे काम धंधों में संलग्न है। आकार के कारण अकसर हम बड़े रोजगारों के प्रति विस्मय, आदर और डर की मिलीजुली भावना से ग्रस्त रहते हैं, जबकि असलियत यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था असंगठित क्षेत्र के योगदान के कारण ही जिंदा है वरना हम बहुत पहले ही पाकिस्तान की तरह मदद के लिए फरियाद कर रहे होते। इस तथाकथित असंगठित क्षेत्र के बारे में और भी ऐसे बहुत से तथ्य हैं, जिनकी ओर हम ध्यान ही नहीं देते और असंगठित क्षेत्र की अनदेखी की गलती करते हैं। असंगठित क्षेत्र ही एक ऐसा क्षेत्र है जहां उद्यमिता खुल कर पनपती है। असंगठित क्षेत्र ही ऐसा क्षेत्र है जहां औरत, मर्द, बच्चे, बूढ़े और दिव्यांग तक को रोजगार हासिल है जबकि संगठित क्षेत्र की बहुत सी सीमाएं हैं। असंगठित क्षेत्र में ठेला लगाने वाले बहुत से लोग मौसम बदल जाने पर प्रोडक्ट बदल देते हैं।

सर्दियों में सूप बेचने वाले लोग गर्मियों में कुल्फी बेचने का काम करने लगते हैं। पटरियों पर बैठ कर सामान बेचने वाले लोग होली के समय रंग बेचते हैं, दीवाली के समय पटाखे लगाते हैं, क्रिसमस के समय वे सांता की लाल टोपियां बेचने लगते हैं तो पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को वे तिरंगा बेचने में मशगूल हो जाते हैं। ऐसा हर उत्पाद ज्यादा से ज्यादा तीन सप्ताह तक ही प्रासंगिक रहता है और इस समय सीमा के बाद उन्हें हमेशा क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि तीन सप्ताह की समय सीमा बीतते ही ये लोग अपना उत्पाद बदल लेते हैं। उल्लेखनीय है कि यह कोई आसान प्रक्रिया नहीं है बल्कि उत्पाद बदलने का मतलब है कि सभी शहरों के सभी पटरी वालों से पुराना सारा सामान वापस लेना, उसका हिसाब रखना, वापस लिए गए बचे हुए माल का भुगतान करना या अगले दिए गए सामान की कीमत में उसे एडजस्ट करना एक लंबा काम है जिसे असंगठित उद्योग से जुड़े लोग अत्यंत कुशलतापूर्वक निभाते हैं और उसमें कोई चूक भी नहीं होती। प्रोडक्ट लाइन बदलने का यही काम संगठित क्षेत्र के उद्यमों को करना पड़े तो वे सोच-विचार में ही चार-पांच साल खपा दें। मजेदार बात यह है कि असंगठित क्षेत्र अपने अधिकतर काम बिना किसी तकनीकी सहायता के निपटाता है, तेजी से निपटाता है और बिना गलती के निपटाता है। उसके पास कोई सैप, कोई ईआरपी नहीं होती, तो भी उसकी कुशलता देखते ही बनती है। बड़े उद्योगों की बात करें तो हर जगह घमंड और सेवा में कमियों की भरमार है। उदाहरण के लिए टेलीकॉम क्षेत्र की ही बात करें तो खराब सिगनल, कॉल ड्रॉप से हम परेशान हैं पर हमारा हो कर हमें हर रोज सही समय पर सही अखबार पहुंचाता है। खोमचे वाले, पटरी वाले, घूम-घूम कर सामान बेचने वाले इन लोगों की हम उपेक्षा करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि हमारी रोजमर्रा की अधिकांश जरूरतें यही लोग पूरी करते हैं। बड़े उद्योग घाटे में जाएं तो सरकारों में हड़कंप मच जाता है और उनके लिए राहत पैकेज की बात होने लगती है जबकि असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए सरकार कुछ नहीं करती। हमारी अर्थव्यवस्था में संगठित क्षेत्र का योगदान सिर्फ  25 प्रतिशत है, जबकि असंगठित क्षेत्र अर्थव्यवस्था में 70 प्रतिशत तक योगदान देता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि एक समाज के रूप में हम असंगठित उद्योग की महत्ता को समझें और अपने जनप्रतिनिधियों को भी इस ओर ध्यान देने के लिए विवश करें ताकि हमारी अर्थव्यवस्था के इस मजबूत पाए की मजबूती बनी रह सके। 

ई-मेलः indiatotal.features@gmail  

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