Tuesday, March 31, 2020 07:37 PM

असहज शहरी परिस्थितियां

शहरीकरण की मुलाकात में टीसीपी कानून की छत उड़ रही है, तो समुदाय के साथ शहरी विकास महकमे की जद्दोजहद का परिणाम क्या निकलेगा। करीब चार दशकों में अमल में आए ग्राम एवं नगर योजना कानून की परिधि में आई जनता क्यों इसके खिलाफ खड़ी है और क्यों शहरी विकास योजनाओं के साथ मानवीय, भौगोलिक, भौतिक व पर्यावरणीय सामंजस्य स्थापित नहीं हो पा रहा। शहरी विकास योजनाएं एक बड़े उद्देश्य की आपूर्ति तथा भविष्य की रखवाली में तैयार हुईं, लेकिन इसके खाके से न नागरिकों का जीवन बेहतर सुविधाओं से परिपूर्ण हुआ और न ही आर्थिक विकास का सृजन क्षेत्र बढ़ा। आज हिमाचल की शहरी परिस्थितियां इतनी असहज हो चुकी हैं कि टीसीपी में आए गांव मुक्त होना चाहते हैं। दरअसल हिमाचल में शहरीकरण को एक सीमित परिधि में रखा गया और आज भी यह अवधारणा है कि इसकी जद में आने से अनावश्यक कर बोझ बढ़ेगा। दूसरे राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण भी सत्तर के दशक से तीव्रता से बढ़ रहे शहरीकरण को संबोधित नहीं किया जा सका। भले ही टीसीपी के कार्यभार से लदा एक विभाग बन गया, लेकिन इसे न शक्तियां मिलीं और न ही सामर्थ्य। आज अगर राज्य की एक समिति यह फैसला लेना चाहती है कि शहरी विकास योजनाओं से कितने गांव बाहर किए जाएं, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि पिछले चार दशकों में दिशाहीन मंतव्य से तमाम शहरी विकास योजनाएं बनाई गईं या पूरी योजनाएं ही औचित्यहीन मानी गईं। केवल कागज पर विकास योजनाएं उतार कर, जनता के सामने आज तक कोई मॉडल क्यों नहीं बनाया गया। योजना क्षेत्र को विकास का आधार देने के लिए ग्राम एवं नगर योजना कानून की शर्तें नजरअंदाज की गईं, क्योंकि इसके लिए बाकायदा एजेंसी के तहत कार्य होना था। ऐसे में अगर शिमला विकास प्राधिकरण बना भी तो इसे अज्ञात कारणों के तहत खुर्द-बुर्द कर दिया गया। जाहिर है हिमाचल अपनी वित्तीय व्यवस्था को केंद्र के सहारे चलाते हुए ग्रामीण विकास के खातों में अपनी मांग पूरी करता रहा, जबकि प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय में हुई वृद्धि ने जीवन का अंदाज बदल दिया। हिमाचल में सरकारी नौकरी ने शहरी समुदाय का प्रसार किया, जो बाद में गांव-कस्बे तक पहुंचा। इसी के साथ पर्यटन व धार्मिक स्थलों के विकास ने शहरीकरण को लंबी लकीरों की तरह खींच दिया जो बाद में हर सड़क के छोर पर तन गया। हिमाचल के अर्बन ट्रेंड में टीसीपी कानून की उपयोगिता आज तक इसलिए पारंगत नहीं हुई, क्योंकि शहरी विकास योजनाओं को जमीन पर उतारा ही नहीं गया। इसलिए शहरी गांव के लोग टीसीपी की मजदूरी अदा करने से कतरा रहे हैं। हिमाचल में टीसीपी की शर्तें तभी पूरी होंगी, जब इसके दायरे में विकास का शंखनाद होगा। इस प्रश्न का हल जनता की महत्त्वाकांक्षा को कैद करके या विकास योजनाओं के दायरे को समेट कर पूरा नहीं होगा, बल्कि पूरे प्रदेश का योजनाबद्ध विकास इसलिए अहम है ताकि पर्यावरण का संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण न हो। ऐसे में शहरीकरण की फैलती भुजाओं को क्लस्टर योजनाओं के विस्तृत दायरे में व्यवस्थित करना होगा। प्रदेश भर में कम से कम आधा दर्जन शहरी विकास प्राधिकरणों का गठन करके दो से तीन शहरों को जोड़ते हुए क्लस्टर प्लानिंग करनी होगी ताकि हरित पट्टी संवरे, पर्यावरण बचे तथा नागरिक सुविधाओं के साथ-साथ रोजगार भी पनपे। उदाहरण के लिए नौदान-हमीरपुर-भोटा की परिधि में अगर एक शहरी विकास प्राधिकरण गठित हो तो इसके भीतर ग्राम एवं शहरी विकास योजना का प्रारूप अपनी व्यापकता में गांव से शहर तक नियोजित होगा। इससे नए निवेश क्षेत्र, आवासीय सुविधाएं, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क तथा नागरिक सुविधाओं का प्रसार होगा। हिमाचल में नागरिक जागरूकता, संपन्नता तथा जानकारी के हिसाब से सुविधाओं की परिपाटी पहले भी विद्युत व जलापूर्ति, सड़क व परिवहन, शिक्षा व चिकित्सा के हिसाब से राज्य को उन्नतशील बनाती है। अब केवल नागरिक सुविधाओं को शहरीकरण के अनुशासन, अनुपात व अपेक्षाओं के हिसाब से चिन्हित तथा प्रमाणित करना होगा। यह कार्य शहरी तथा ग्रामीण विकास मंत्रालयों को एक-दूसरे के नजदीक खड़ा करके होगा। आश्चर्य यह कि मंत्रिमंडल की उपसमिति में न शहरी विकास मंत्री और न ही ग्रामीण विकास मंत्री दिखाई दे रहे हैं। समाधान के लिए ये दोनों विभाग एक ही मंत्री या मुख्यमंत्री के पास होने चाहिएं।