Tuesday, February 18, 2020 07:31 PM

असहमति के अर्थ गाली नहीं

असहमति एक लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति है। लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के इस कथन से हम सौ फीसदी सहमत हैं। असहमति का सम्मान और उसकी गरिमा भी उतनी ही आवश्यक है। हमारे पुराने नेताओं ने असहमति के बावजूद राष्ट्रवाद के अनूठे उदाहरण पेश किए हैं। वे आज के दौर में बहुत याद आते हैं। राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल संयुक्त राष्ट्र में जाना था। उन्होंने अपने कट्टर विरोधी नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भी उस प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बनाया। एक और उदाहरण तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के कालखंड का है। उन्होंने तब के नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा। अटल जी को प्रतिनिधिमंडल का नेता भी तय किया गया। ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जो असहमति के बावजूद राष्ट्रीय गरिमा के प्रतीक रहे हैं। यही हमारी लोकतांत्रिक, राजनीतिक संस्कृति रही है। असहमति के मायने गाली नहीं हो सकते। यह देश सभी भारतीयों के बाप का ही नहीं, बेटों और दादा-परदादाओं का भी है। अधीर रंजन चौधरी को इस संदर्भ में हदें नहीं लांघनी चाहिए थीं। वह लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता हैं। उनका दर्जा एक किस्म से विपक्ष के नेता का है। उस पद की गरिमा रखें। उन्होंने देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को ‘रंगा-बिल्ला’ कहा है। यह अनपढ़, असभ्य और आदिम कबीलों की भाषा है। यह देश लोकतांत्रिक है। जिस तरह एक क्षेत्र की जनता ने अधीर रंजन को चुनकर लोकसभा भेजा है, उसी तरह देश के लोगों ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पार्टी को बहुमत प्रदान किया है, लिहाजा वह देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं और गृहमंत्री उनकी कैबिनेट के दूसरे सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं। अधीर और देश का एक तबका नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी, बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, घटते उत्पादन और व्यापार सरीखे मुद्दों पर प्रधानमंत्री का विरोध कर रहे हैं और करते रहें, क्योंकि यह आपका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन प्रधानमंत्री पद की गरिमा बनाए रखना और शालीन भाषा का इस्तेमाल भी उतना ही संवैधानिक है। यदि आप चुने हुए प्रधानमंत्री को गाली दे रहे हैं, तो वह व्यक्ति का अपमान तो राजनीतिक माना जा सकता है, लेकिन वह भारत जैसे संप्रभु राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय अपमान भी है। कोई भी सचेत नागरिक इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। दरअसल गाली की ऐसी राजनीतिक संस्कृति की जरूरत ही क्या है? क्या उससे ज्यादा वोट हासिल होते हैं? मणिशंकर अय्यर की उम्र करीब 78 साल की है। वह केंद्रीय मंत्री रहे हैं और देश के सम्मानित राजनयिक भी रह चुके हैं। साहित्यिक तौर पर भी वह प्रबुद्ध व्यक्ति हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के लिए कई बार अपशब्दों का प्रयोग किया है। उनकी पार्टी तो लोकसभा में सिर्फ  52 सांसदों पर अटक गई है। अभी हाल ही में वह पाकिस्तान के लाहौर शहर से लौटे हैं, लेकिन दिल्ली के शाहीन बाग में आंदोलनरत भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को ‘कातिल’ करार दिया है। क्या लोकतंत्र में इसी भाषा में राजनीति की जाती है? एक पुराना प्रसंग है। यह भी अटल जी से जुड़ा है। किसी कांग्रेस सांसद ने उन्हें ‘झूठा’ करार दे दिया था। अटल जी संसद में ही अपनी सीट पर खड़े हुए और सवाल करने लगे कि उन्हें ‘झूठा’ किस आधार पर कहा गया? मुद्दा गरमाने लगा, तो उस सांसद को सदन में ही माफी मांगनी पड़ी थी। अब तो तमाम मर्यादाएं टूट रही हैं। यह कौन-सी कांग्रेस है? कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी को इतनी गालियां दी हैं कि नए सिरे से उन्हें दोहराना हम उचित नहीं समझते, लेकिन सवाल है कि उससे हासिल क्या होता है? हमारी राजनीति में यह अभद्र, अश्लील आचरण कहां से शुरू हुआ है? जरा इस पर भी आत्ममंथन किया जाना चाहिए और जुबान को कुछ लगाम देना चाहिए, क्योंकि यह पूरे देश के चरित्र का मामला है। दुनिया हमें देख रही है और हमारा विश्लेषण कर रही है कि हम कितने सभ्य हुए हैं?