Sunday, November 17, 2019 04:28 PM

असहमति के मंच पर कसौली

कसरतें जब हाशियों के बाहर और शब्द जब अपनी बेडि़यों से उन्मुक्त हों, तो खाट पर लेटे विषय यकायक चेतना लोक में लौट आते हैं। कसौली लिट फेस्ट ने देश के हालात पर अपनी तरह से वृत्तांत पेश किया, तो नाराजागी के लम्हे वहां एकत्रित हो गए। खुशवंत सिंह को याद करने का यह आठवां पड़ाव किताबों से बाहर निकल कर, देश के चुभन भरे माहौल में खुद को इंगित कर गया, तो स्वाभाविक तौर पर जो होना था, होने लगा है। हिंदू जागरण मंच का विरोध और पूर्व सांसद वीरेंद्र कश्यप का क्रोध लेखकों की भीड़ पर बरपा है, बल्कि दिल्ली के गलियारों का बौद्धिक बारूद कसौली को कसैला कर गया। असहमत वीरेंद्र कश्यप ने कसौली के जमावड़े को टुकड़े-टुकड़े गैंग में पहचान लिया है। लिट फेस्ट के बहाने जो भारत कसौली में इकट्ठा हुआ और जिन मुहानों पर बहस के मुहावरे गढ़े गए, उससे असहमत होने का अर्थ अलोकतांत्रिक नहीं, लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग का देश के प्रति एहसास-ए-जुर्म यह नहीं हो सकता कि वह असहमत न हो। धारा-370 के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र की वाणी, इसकी उत्पत्ति से अंत तक व्याप्त है और ऐसा भी नहीं है कि पूर्व सरकारों की नीतियों के खिलाफ बौद्धिक मंच अकसर कबूतर बने रहे हों। लेखकीय  उद्गार तर्कसंगत थे या नहीं, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन यह आईने बदलने की कोशिश तो नहीं कि राष्ट्र को देखने में प्रतिबिंब ही अपराधी घोषित हो। विषय भारतीय लोकतंत्र से ही निकले और हालात का जिक्र अगर खुली आंखों से किया जाए, तो क्या यह अभिव्यक्ति का चरम है या राष्ट्रीय सीमाओं का उल्लंघन। इसलिए सागरिका घोष जैसी पत्रकार एवं लेखिका जब न्यूज चैनल न देखने की सलाह देती हैं, तो यह टिप्पणी मीडिया के वर्तमान संदर्भों की अपंगता को जाहिर करती है। जाहिर है कसौली लिट फेस्ट में पुस्तकें और पर्सनेलिटी का जिक्र, जिस पक्ष को उद्वृत करता रहा, वह असामान्य व अनकही व्याख्या है। मोटे तौर पर धारा-370 का उल्लेख, राष्ट्रवाद के वैचारिक मंथन को अकाट्य प्रसंग बनाने की दक्षता तक परोसा जा चुका है और इसलिए कसौली लिट फेस्ट इसकी मुखालफत में खड़ा असहनीय पल हो सकता है। क्या यहां शरीक हुई लेखक जमात को टुकड़े-टुकड़े गैंग ठहरा कर राष्ट्रीय चिंतन का कारवां सुरक्षित हो जाएगा या लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच मतांतर कबूल नहीं होगा। चर्चाओं में आए कसौली लिट फेस्ट ने अपने दायरे की चुभन में जो खोजा, उसका बुनियादी अंतर स्पष्ट है। यह प्रत्यक्ष विरोध का मजमा ठहराया जा सकता है, क्योंकि विषय राष्ट्रीय फलक पर सत्ता से सीधी असहमति जताते हैं या अंतरराष्ट्रीय हदों के बाहर भारतीय पक्ष की अवहेलना करते हैं। जाहिर है अभिव्यक्ति की संवेदना में जब घर्षण इस कद्र होगा तो शर्मिला टैगोर सरीखी अदाकारा पर अंगुलियां उठेंगी, फिर भी हमें लेखकों की मानवीय पीड़ा को बेअसर करने से पहले सोचना पड़ेगा। यह लेखकों का जमावड़ा था, राजनयिकों का नहीं और राजनेताओं का तो कतई नहीं, इसलिए वर्जनाओं से बाहर ताक झांक हुई है। लेखिका तवलीन सिंह ने अपने मानवीय दृष्टिकोण को चुनिंदा उदाहरणों की चादर ओढ़ कर देखा, तो चर्चा धर्म विशेष के चिन्हित संदर्भों में ही अटक गई जबकि शब्दों के तराजू पर घटनाओं का घाटा इस तरह नहीं होना चाहिए।  बेशक लेखक समाज मंद पड़े विपक्ष और आर्थिक मंदी से एक सरीखा आहत दिखा, लेकिन इसके लिए मंच पर कही गई बात से कहीं अधिक जरूरी है कि उस संघर्ष को भी जिया जाए जो खेत-खलिहान या गांव-देहात में जारी है। विषयों को पलटने और राष्ट्रीय बहस के नए नियमों को नजरअंदाज करने की गुंजाइश सदैव वैचारिक मतभेद पैदा करेगी, लेकिन लोकतंत्र सार्थक विरोध से ही पैदा होता है। कसौली लिट फेस्ट को राज्य व्यवस्था के विरोध में न मानते हुए यह गौर करने की आवश्यकता कहीं अधिक है कि अंततः देश हमेशा एकतरफा नहीं हो सकता और न ही असहमत समाज या वर्ग को केवल लांछित करके दरकिनार किया जा सकता है। अगर कसौली लिट फेस्ट ने राष्ट्रीय बहस के मुद्दों को फिर से परिभाषित किया, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्यों नहीं। देश को एक सीमित काल में देखना मजबूरी हो सकती है, लेकिन सीमित काल को राष्ट्रव्यापी संवेदना में स्वीकृत करवाने के लिए कई कड़वे घूंट और असहमतियों के बीच खंगालने की आवश्यकता रहेगी। कसौली लिट फेस्ट को केवल एक दो विषयों के विवाद के अलावा उस सृजनशीलता के संदर्भों में देखना होगा, जो समाज के भीतर सत्य की कसौटियों में कह पाने की बुलंदी है।