Monday, October 21, 2019 10:22 AM

अस्तित्व के किनारे छोड़ रही पहाड़ी भाषा

राजेश शर्मा

लेखक रोहड़ू से हैं

जब हिंदुस्तान अंग्रेजी दासता के चंगुल में जकड़ा घुटी-घुटी सांसें ले रहा था, उस वक्त अंग्रेजी शासन का मकसद न केवल हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों को गुलाम बनाना था, बल्कि वे चाहते थे कि हिंदुस्तान की भाषा व संस्कृति को समाप्त करके अपनी संस्कृति के रंग में रंग लें। वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए। आजादी के बाद वे अपनी भाषा और संस्कृति के ऐसे कतरे हिंद की धरती पर  छोड़ गए कि आज तक हम रंग रहे हैं। आज हमारी भाषा रंगीन है। संस्कृति बोलती नहीं क्योंकि उसने पश्चिमी पोषाकें पहन ली हैं।

हम जिसे विकास कह रहे हैं, यह पश्चिमी सभ्यता की कोरी नकल है। असल में हम भी सच्चे हैं क्योंकि हमारे लिए विकास के यही पैमाने रह गए हैं। कुछ लोग तो यहां तक मानते हैं कि जो लोग अंग्रेजी पढ़े-लिखे हैं, वे अन्य लोगों के मुकाबले 35 प्रतिशत अधिक आय कमाते हैं। यह तथ्य गहन शोध का विषय होना चाहिए। विश्व में दूसरे नंबर की आबादी को समेटने वाला राष्ट्र यदि यह स्वीकार कर ले कि हम किसी दूसरे देश, जिसकी आबादी हमारी आबादी के मुकाबले आधी आबादी से भी कम है, का अनुसरण करने लगे तो यह राष्ट्रभाषा व संस्कृति के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आज जिस कदर हमारी सोच पश्चिमी सभ्यता तथा संस्कृति की ओर झुकी हुई है, हमारे व्यवहार और रहन-सहन के हर तौर-तरीके अंग्रेजी संस्कृति की एक छाप बनकर रह गए हैं। फलस्वरूप हमारी शिक्षा के स्तर बदले हैं। हिंदी शिक्षा स्तरहीन हो गई है। आज हमारी हर चीज अंग्रेजों की तरह हो गई है। हम बोलते अंग्रेजी हैं, लिखते अंग्रेजी हैं, पहनते अंगे्रजी हैं, हम अंग्रेजों जैसा व्यवहार करते हैं। हमें अंग्रेजों की तरह रहना पसंद करते हैं। यहां हर चीज ऊपर से नीचे तक अंग्रेजी है। शिक्षा अंगे्रजी में, न्याय अंग्रेजी में, सरकारों के मसौदे बनते हैं, वे भी अंगे्रजी में। दीक्षाएं भी अंग्रेजी में, परीक्षाएं भी अंग्रेजी में। समझ में यह नहीं आता कि हिंदी फिर है कहां? कागजों से चिपकी, पुस्तकालयों की अलमारियों में छुप कर बैठी है हिंदी। देहातियों की भाषा हो गई है हिंदी। हिंदी क्या, हिंदी से बदतर हो चला है उन भाषाओं का संसार जो क्षेत्र दर क्षेत्र अपना शब्दकोश बदलती हैं। पहाड़ों की भाषा पहाड़ी भी इसी श्रेणी में आती है। हिमाचल प्रदेश के अंदर पहाड़ों के बीच कितनी बोलियां अलग-अलग अंदाज में स्वर और मात्राएं बदलती हैं। परंतु अभी तक किसी भी बोली को हम पहाड़ों की एक अलग भाषा बनाने में नाकामयाब रहे हैं।

हम जानते हैं कि हर प्रदेश की अपनी एक क्षेत्रीय भाषा है, जैसे पंजाब की पंजाबी, हरियाणा की हरियाणवी, राजस्थान की राजस्थानी, किंतु हिमाचल प्रदेश की कोई ऐसी भाषा नहीं है जिसे क्षेत्रीय भाषा का दर्जा मिले। इस विषय पर कई बार प्रदेश में विचारकों की गोष्ठियां और बैठकें आयोजित हुई। कई बार मसला सियासत के गलियारों से होकर गुजरा कि पहाड़ी भाषा को संपूर्ण भाषा का दर्जा मिले। कितने पहाड़ी विचारकों ने पहाड़ी भाषा के विकास के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया, प्रतिफल शून्य रहा। भाषा समाज को एक लड़ी में पिरोने के लिए सूत्रधार का काम करती है। बेशक हम हिंदी को अपनी मातृ भाषा मानते हैं, परंतु हमारी सामाजिक भाषा पहाड़ी भाषा यानि पहाड़ी क्षेत्रीय बोलियां हैं, जो हमारे सामाजिक ताने-बाने को अपनत्व का एहसास दिलाती हैं। हमारे पारिवारिक संबंधों को गूंथने वाली भाषा अपनी क्षेत्रीय बोलियां हैं जो हमें पहाड़ी होने का एहसास दिलाती हैं। परंतु आज ऐसा लगता है कि पहाड़ी भाषा तथा समग्र बोलियां जो पहाड़ी संस्कृति की पहचान हैं, आज अपने अस्तित्व के छोर छोड़ रही हैं।

पहाड़ी भाषा को बोलने वालों की संख्या घटती जा रही है। पहाड़ी में लिखने वाले लेखकों की संख्या लगातार गिरती जा रही है। पहाड़ी आज बुजुर्गों की भाषा रह गई है। आज अधिकतर युवाओं की आबादी ऐसी है कि जो पहाड़ी भाषा न बोलना जानते हैं और न समझते हैं। परिवेश बदलने लगा है। स्कूलों की अलमारियों में बंद, चीखता-चिल्लाता पहाड़ी साहित्य बदलती आबोहवा से परेशान होकर धूल चाटने को मजबूर है। इसकी ओर कोई देखने वाला नहीं है। न विद्यार्थी देखता है, न परीक्षार्थी देखता है। सरकार को तो यह समझ आता नहीं। एक समय ऐसा था कि पहाड़ी भाषा के कवि तथा कथाकार गांव-गांव में मिल जाते थे। नेता लोग पहाड़ी भाषा का जादू दिखा कर लोगों को प्रभावित कर लेते थे। समाज में पहाड़ी भाषा का अलग रुतबा था। गांवों से शहरों तक पहाड़ी भाषा का काफी चलन था, परंतु धीरे-धीरे समाज से पहाड़ी भाषा का चलन समाप्त होने लगा है। प्रदेश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की संख्या दिन-रात बढ़ने से पहाड़ी बोलियां दबने लगी हैं। यहां तक कि हिंदी भाषा पर भी खतरा मंडराने लगा है। यही कारण है कि सरकारी स्कूलों में साल-दर-साल छात्रों की संख्या लगातार घट रही है और आज उन स्कूलों की होड़ में सरकार को सभी सरकारी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम से करने पर मजबूर होना पड़ा। बेशक हमारे पश्चिमी संस्कृति की ओर बढ़ते कदम हमें विकास का दिलासा दिलाते रहें, परंतु हकीकत यह है कि हमें विकास की होड़ में अपनी संस्कृति और भाषा के पदचिन्ह धुंधले प्रतीत होते हैं।