आंतरिक सुरक्षा की दरकार

फिरोज बख्त अहमद

स्वतंत्र लेखक

भारत की विश्व विख्यात शिक्षा स्थली जेएनयू में हाल ही में आंतरिक सुरक्षा को लेकर एक विचार विभोर संगोष्ठी ‘भारत की सुरक्षा ः आंतरिक एवं बाह्या आयाम’ हुई, जिसमें इस बात पर विचार किया गया कि भारत बाहरी शत्रुओं से लड़ने में तो सक्षम है, चाहे वह पाकिस्तान हो, चाहे चीन  अथवा अन्य कोई देश, मगर भारत उन शत्रुओं से कैसे निपटेगा, जो हमारे पूरे सिस्टम में रच-बस गए हैं। ऐसा बार-बार देखने में आया है कि जब सरकार ने कोई पक्ष लिया, तो उसके विरुद्ध टीवी के अंदर कुछ नामचीन हस्तियां उल्टी गंगा बहाती दिखाई दीं। इस प्रकार के लोगों को अंग्रेजी में ‘अपोलोजिस्ट’ कहा जाता है, अर्थात ऐसे लोग, जिन्हें देश की सुरक्षा से अधिक अपने स्वार्थ की फिक्र होती है। क्या खूब कहा है, शायर अफजल मंगलौरी ने, ‘पहले यह तय कर लो वफादार कौन है / फिर वक्त बताएगा, गद्दार कौन है’। वास्तव में पिछले दिनों जब भारतीय वायु सेना द्वारा बालाकोट पर आक्रमण किया गया और आंकड़ों द्वारा यह बात सामने आई कि लगभग 300 आतंकवादी मारे गए हैं, तो इस पर ‘अपोलोजिस्ट’ लोगों ने जोरदार बहस करना शुरू कर दी। सरकार से यह गलती हुई कि उसने भी यह कहकर स्वयं को इस बहस का भाग बना लिया कि  250 लोग मारे गए हैं। फिर क्या था, विपक्ष की तो पांचों अंगुलियां घी में! विपक्षी नेताओं ने शगूफे छोड़ने शुरू कर दिए कि सेना ठीक है या अमित शाह। सेना ने सर्वनाश हुए 300 आतंकवादियों का हवाला दिया था, जबकि सरकार की ओर से एक बड़े नेता ने इनकी संख्या 250 बताई। सरकार को इस प्रकार के पचड़ों में हरगिज नहीं पड़ना चाहिए। इन्हीं तमाम बातों को लेकर इस संगोष्ठी के दो मुख्य वक्ताओं, इंद्रेष कुमार, अध्यक्ष मुस्लिम राष्ट्रीय मंच और संघ विचारक मुकुल कानिटकर ने कुछ बड़े ही महत्त्वूपर्ण मुद्दों पर अपनी बात रखी। इंद्रेष कुमार ने बताया कि जहां तक भारत का संबंध है, इतिहास इस बात की गवाही देता है कि उसने स्वयं किसी भी देश पर आक्रमण नहीं किया, बल्कि जब-जब उस पर आक्रमण हुआ है, आक्रमणकारियों से बचने के लिए ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। विश्वग्राम की संचालिका प्रो. गीता सिंह की चिंता है कि भारत बाहरी दुश्मनों, जैसे पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, अमरीका आदि से तो निपटने की क्षमता रखता है, मगर भारत के उन शत्रुओं को कैसे झेलें, जो एवॉर्ड वापसी गैंग के सदस्य हैं और कभी सामने से हमला करते हैं, तो कभी ‘बगल में छुरी, मुंह में राम’ वाली पालिसी अपनाते हैं। बकौल वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव के अनुसार खेद का विषय तो यह है कि भारत में एक ऐसी लॉबी मौजूद है, जिसके तार विदेश में हैं और जो भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यह लॉबी पूर्ण रूप से धनाढ्य है और इसके पास मीडिया की ताकत है। हमारे मीडिया में ऐसे बाहुबलियों को संरक्षण दिया जाता है, जो ‘डेमोक्रेटिक वैल्यूज’ के आडंबर में  राष्ट्र विरोधी लाइन पकड़कर पूर्ण विश्व को गुमराह करते हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह तो आवश्यक है कि सभी की बात रखी जाए, मगर जब कश्मीर, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट आदि जैसे विषय मीडिया में बहस पर लाए जाते हैं, तो सभी को बहुत सतर्क रहकर और नाप-तौल कर अपनी बात कहनी चाहिए। वास्तव में बेवकूफी उन चैनलों की भी है, जो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कुछ ऐसे तत्त्वों को अपने चैनल पर जगह देते हैं, जिनसे देश विरोध की गंध आती है। इस अवसर पर जेएनयू के प्रांगण में सैकड़ों छात्र मौजूद थे। संघ के विशिष्ठ प्रचारक एवं उसके शिक्षा तंत्र, ‘भारतीय शिक्षा मंडल’ से जुड़े मुकुल कानिटकर ने बताया कि जब सुरक्षा की बात आती है, तो बाह्या सुरक्षा से अधिक महत्त्वूपर्ण आंतरिक सुरक्षा होती है। देश के पहरेदार कान खोलकर यह बात समझ लें कि जब तक शस्त्र और शास्त्र को एक साथ लेकर नहीं चला जाएगा, पूर्ण सुरक्षा नहीं हो सकती, मात्र देश प्रेम से बात नहीं बनेगी। हमें अपने देश पर गर्व करना होगा। गर्व करने का तरीका यह है कि हमें अपने देश की हर चीज को बढ़ाना और चढ़ाना होगा। उदाहरण के तौर पर चंद्रगुप्त मौर्य का, हजारों साल पुराना लोहे का विजय स्तंभ, जो महरौली में स्थित है, आज तक उस पर कोई जंग या धब्बा नहीं लगा। वह उसी हालत में मौजूद है, जैसी अपनी स्थापना के समय मौजूद था। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत में उस समय भी ऐसी तकनीक मौजूद थी, जिसमें लोहे को इस प्रकार से ढाला गया कि उस पर आज तक जंग नहीं लगा। बकौल कानिटकर सुरक्षा की लड़ाई मात्र शस्त्रों की नहीं, मात्र सीमा पर नहीं, मात्र देश के अंदर पल रहे संपालियों से नहीं, बल्कि इन सभी आधारों पर एक वैचारिक लड़ाई है। क्या अमरीका चूक से अपना ही सेटेलाइट मार गिरा सकता है। भारत को अपनी सुरक्षा के लिए कहीं अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि उसके लिए घोर बदकिस्मती की बात यह है, जैसा कि इंद्रेषजी ने समझाया कि देश को ऐसे दुश्मनों से निपटना है, जो स्वयं उसी के शरीर से काटे गए अंग हैं। पाकिस्तान का अस्तित्व ही इस बिनाह पर कायम है कि वह भारत का विरोध करे। बकौल इंद्रेष, जब एबटाबाद से अमरीकी सील्ज ने ओसामा बिन लादेन का नाश कर, उसे पानी में डुबो दिया, तो एक भी अमरीकन निवासी ने यह नहीं कहा कि सुबूत लाओ। बस इतना सा ही फर्क है भारत और अमरीका में। यही कारण है कि अमरीका इतना आगे बढ़ गया। सही अर्थों में हमें मानसिक गुलामी से बाहर आना होगा। विचारों को भावना से अधिक महत्त्व प्रदान करना होगा और साथ ही यह भी करना होगा कि हृदय और मस्तिष्क की लड़ाई में हृदय की बात माननी होगी।