आई रे आई, परेशान माइलह्व

अशोक गौतम

साहित्यकार

तो एक बड़ी खबर! उनका झूठ फिर जीत गया। सो कायदे से अबके फिर झूठ की जीत की खुशी में उन्होंने मां को प्रसन्न करने के लिए जागरण रखवाया। जीता हुआ झूठ खुशी में कुछ भी रखवा सकता है। किसी से भी रखवा सकता है। इधर जब से झक्कास- बकास प्रदूषण बढ़ा है सरकार तो ऊंचा सुनने ही लगी है, प्रभु भी ऊंचा सुनने लगे हैं। पहले भगवान ढोलक से उनके भजन गाते भक्तों के मन की बात मजे से सुन जाया करते थे। जब ध्वनि प्रदूषण कुछ और बढ़ा तो भगवान माइक के सहारे भक्तों के मन की आवाज सुनने लगे, भक्तों के कथनानुसार। इस बकास प्रदूषण के चलते भगवान भारी भरकम लाउड स्पीकर से भी नहीं सुन पाते सो उन्हें इतनी ऊंची आवाज में सुनाना बुलाना पड़ रहा है कि लाउड स्पीकर का गला पुकारते-पुकारते फट जाए, तो फक्त जाए पर आवाज सीधे उन तक पहुंच तो वे सुनें तो सुनें। कई तामसिक भक्तों ने तो अब उन्हें सुनाने के लिए उनके कान के पास ही डिजिटल लाउड स्पीकर फिट कर दिया है ताकि उनकी आवाज सीधे उनके कान में ही जाए। अपने झूठ की जीत की खुशी में उन्होंने एक बार फिर घर में भजन मंडली को माता को दस हजार देकर रौब से बुलाया। वह इलाके की नामी-गिरामी भजन मंडली थी। पिए हुए ऐसा कीर्तन करती कि किसी को क्या मजाल पता चल जाए कि कीर्तन मंडली ने पी हुई है। वैसे बिन पिए सारी रात कोई मां का गुणगान गाकर दिखाए भला? वह कीर्तन मंडली हर भजन अश्लील से अश्लील फिल्मी गीत की तर्ज पर पूरी लगन से यों गाती थी कि उनके भजन को न सुन बहरे भी झूम उठें। उनसे कइयों को तो पता ही न चलता था कि महामाई का गुणगान सुनते-सुनते कब सुबह हो गई। वाह! उनके मुहों से क्या महक!  भक्तों को सुबह होने का तब पता चलता जब सूरज सिर पर आकर बैठ जाता। उधर उनकी मन्नत का जागरण शुरू होने ही वाला था कि इधर मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई। मुझे लगा पड़ोसी ही होगा। जागरण के बहाने सोहणी-सोहणी सूरतों को देखने जाने को ही कहने आया होगा। असल में जिसकी वीबी उसके सौंदर्य के मनमाफिक न हो वह मौके-बेमौके औरों की खूबसूरत वीबियों को देखने के ऐसे ही आध्यात्मिक मौकों की तलाश में होता है। पर दरवाजा खोला तो सामने माई! जागरण वालों की। ‘माई तुम यहां? तुम जागरण में नहीं जा रही हो? वहां कीर्तन कैसे होगा?’ ‘नहीं, इससे पहले कि मैं और कुछ पूछता वह भीतर आ गई और कुर्सी पर बैठ गई दरवाजा बंद कर। ‘पर माई तुम यहां? वे पार तुम्हें जागरण में ढूंढ रहे होंगे?’ मैंने माई से प्रश्न किया तो वह बोली, ‘क्या करूंगी वहां रह कर? मेरे जागरण में फटी आवाज में वे खा- पीकर इतनी ऊंची आवाज में गाते हैं कि आसपास वालों की तो नींद हराम करके रख ही देते हैं पर मेरे कान भी फाड़ कर रख दिए हैं इन कंबख्तों ने। विश्वास नहीं होता तो ये देख लो’ ‘कह माई ने अपना एक कान मेरे आगे यों किया जैसे मैं कोई कान का डोनेशन दे डिग्री लिया डाक्टर हूं। फटे कान के पर्दे वाला होने के बाद भी मैंने माई के कान के भीतर झांका तो सच्ची को माई के कान का पर्दा फटा हुआ था। इतना फटा हुआ कि पूछो ही मत। बताते हुए शर्म तो आ रही है पर इतने तो मेरे घर के पर्दे भी नहीं फटे हुए हैं। ‘तो अब?’ ‘अब क्या! जब तक उनका कान फाडु जागरण संपन्न नहीं हो जाता तब तक यहीं रहूंगी’ ‘कह माई ने मेरी रजाई ली और वहीं सो गई। माई करे, उनका जागरण जल्दी संपन्न हो जाए।