Sunday, November 17, 2019 03:39 PM

आओ जिनपिंग, हम ढोएंगे पालकी

नवेंदु उन्मेष

स्वतंत्र लेखक

1962 में जब चीन ने भारत पर हमला कर दिया था तब कवि गोपाल सिंह नेपाली ने लिखा था चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा, अहिंसा उसे कहते हैं जो हिजड़ों का है नारा। हालांकि आज अहिंसा का नाम जपने वाले हमारे देश के लोग हिजड़े नहीं रह गए हैं। अब तो कहा जा सकता है कि हम लोग मात्र पालकी ढोने वाले रह गए है। चीनी सामान को भारत में बुलाते हैं, लेकिन चीनी सामान का बहिष्कार करने की भी वकालत करते हैं। चीनी सामान की होली जलाने की बातें आसानी से करते हैं, लेकिन चीन निर्मित देवी-देवताओं की मूर्तियां अपने पूजा घर में रखने से गुरेज नहीं करते। चीनी सामान अब हमारे देश की संस्कृति के हिस्सा हो गए हैं। एक समय था जब मेड इन जापान और मेड इन यूएसए के माल को भारत में अच्छा समझा जाता था, लेकिन अब चीनी माल हमारे घर में घुस गया है। यानी हम लोग चीनी सामानों की पालकी ढो रहे हैं। अब तो हम आसानी से कह सकते हैं, ‘आओ जिनपिंग, हम ढोएंगे पालकी’ यही हुई राय मोदी सरकार की। मिल बैठकर रफू  करेंगे फटे-पुराने जाल की। आओ जिनपिंग हम ढोंगे पालकी। अरुणाचल में जब हमारे देश का मंत्री जाए तो उसका विरोध चीन करे। डोकलाम की भारतीय जमीन को चीन अपने बाप का माल समझे। जब चाहे वहां चीनी सैनिकों को तैनात करे और भारतीय सैनिकों से खामख्वाह उलझे, लेकिन फिर भी हम हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते रहे हैं और जिनपिंग की पालकी ढोते रहें। यह दोनों कैसे संभव हो सकता है। पाक प्रधानमंत्री इमरान को जब कहीं कोई सहारा नहीं मिलता है तो हारे के हरिनाम की तरह चीन के दरवाजे पर जाकर अपनी किस्मत का रोना रोता है। और चीन है कि इमरान को ऐसे गले लगाता है मानों उसका लाडला घर आ गया हो। पाकिस्तान के आतंकी चीन की नजरों में स्वतंत्रता सेनानी हो सकते हैं। भले ही अमरीका ने उन पर लाखों डालर का इनाम घोषित कर रखा हो। पाकिस्तान का हर आतंकवादी चीन की नजरों में स्वतंत्रता सेनानी है, लेकिन चीन को यह नहीं मालूम कि अगर उसकी सुरक्षा व्यवस्था में जरा भी चूक हुई तो पाक आतंकी उसे भी अपना शिकार बना सकते हैं। जिनपिंग के मुस्कुराने के अंदाज को देख कर आप इस भ्रम में नहीं रहें कि वह भारत का सच्चा दोस्त हो सकता है। उसके मुस्कुराने के अंदाज में भी कुटिलता छिपी रहती है। आज हांगकांग में क्या हो रहा है। यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। चीन को यह मालूम होना चाहिए कि आज के भारतीय कुर्बानी नहीं देते, बल्कि कुर्बानी लेना जानते हैं, लेकिन हम भारतीयों को यह भी समझना चाहिए कि चीनी सामान टिकाउ नहीं होते। यहां तक कि उसके साथ दोस्ती भी टिकाउ नहीं हो सकती। जिनपिंग से दोस्ती का अर्थ है मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं। जब चीनी माल के लिए अमरीका के दरवाजे बंद हो रहे हैं तो भारत का बाजार उसे बड़ा नजर आ रहा है, लेकिन पाकिस्तान के आतंकवादियों और गधों को वह अपना दोस्त समझ रहा है। पाकिस्तान गधे पैदा करके अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है तो चीन उनसे दवाएं बनाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगा हुआ है, लेकिन भारत न तो गधों की संख्या बढ़ा रहा है और न उसे चीन को निर्यात करने जा रहा है।