Tuesday, June 02, 2020 09:42 AM

आत्मज्ञान की रिकवरी

अशोक गौतम

ashokgautam001@Ugmail.com

वे जो मेरे दोस्त हैं, ईजादिया किस्म के प्राणी हैं। ऑफिस के वक्त भी ऑफिस के अपने हिस्से के जरूरी से जरूरी काम इधर-उधर सरका, सरकवा कुछ न कुछ ईजाद करते ही रहते हैं। कल फिर इन्हीं ईजादिए साहब का फोन आया। सुना तो पहले ही बोल में इतने खुश लगे कि पूछो ही मत! तय था, कोरोनाकाल में फिर जरूर कुछ ईजाद कर गए होंगे। ‘क्या बात है दोस्त? कैसे कट रही है? जहां सारी दुनिया कोरोना के डर से घर से बाहर नहीं निकल रही। हाथ में सेनेटाइजर तो मुंह पर मास्क लगाए राम-राम जप रही है, वहीं तुम आज इतने खुश...कहीं कुछ लॉकडाउन में ईजाद-विज़ाद तो नहीं कर लिया?’ मेरे पूछने भर की देर थी कि वे बल्लियां उछलते बोलेए ‘यार! तुम्हारे ग्रेट दोस्त ने अबके उससे भी कोसों आगे पीछे का विस्मृत एडवांस आत्मज्ञान रिकवर, ईज़ाद कर लिया!’ कह उसने वो ठहाका लगाया कि जो उस वक्त जो उसके आसपास कोरोना भी होता तो वह भी दो पल को असमंजस में पड़ जाता कि इस आपदाकाल में बंदा हंसने की हिमाकत कर रहा है तो क्यों? और वह भी ऐसे जैसे... क्या इसे जिंदगी प्यारी नहीं या...’ ‘आत्मज्ञान और तुम।’ ‘हां यार!’ दोस्त ने कहा और एक बार फिर जोर का ठहाका लगाया तो मैंने पूछा, ‘आत्मज्ञान बोले तो।’ ‘याद है, जब तुम हम दोनों की शादी में सूअर डांस नाचे थे तो मैंने सोचा था मैं बीवी को भी वैसे ही कंट्रोल कर लूंगा जैसे ऑफिस में एक से एक खतरनाक काम करवाने आने वाले को करता आया था। पर बहुत पीड़ाओं के बाद पता चला था कि मैं ऐसा नहीं कर पाऊंगा।’ ‘तो।’ ‘पता है, तब मैंने एक पल खोए बिना अगले बिंदु पर काम शुरू कर दिया था।   ...और मत पूछो दोस्त! तब इस पर काम करते करते मुझे वह आत्मज्ञान प्राप्त हुआ था जो बुद्ध को जंगलों में जाकर भी क्या ही हुआ होगा।’ ‘मतलब?’ ‘मुझे लगा ज्यों मेरा ये दोस्त कोरोनाकाल में बुद्धत्वकाल के बिल्कुल करीब हो। और अगले शब्दों में अब वह अपने बुद्धत्व प्राप्ति की दुखद घोषणा कर देगा ज्यों। वैसे इस कोरोनाकाल ने जानी मानी बुद्धियों के तातों तक को बुद्धुत्व की प्राप्ति करवा दी है। बस, अब क्या, मैंने कोरोना के साथ भी बीवी की तरह जीना सीख लिया। सोचा, बीवी की तरह कोरोना से भी रोज रोज की लड़ाई दवाई किसलिए? जब मैं बीवी के साथ मजे से रह सकता हूं तो कोरोना के साथ क्यों नहीं? ज्यों ही कल बिस्तर में चाय पीते-पीते पता नहीं कहां से ये विस्मृत आत्मज्ञान रिकवर हुआ, तबसे मजे में हूं। यार! मैंने तो बेकार में खुद को और कोरोना दोनों को दिक्कत में डाल रखा था। अब कोरोना भी खुश और मैं भी खुश! और कहो, तुम कैसे हो, बुरा मानों चाहे भला! दोस्त! ये अल्कोहलियों का ही दम है कि जब जब अर्थव्यवस्था के चलने के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं तब तब हम अपनी सेहत जान की परवाह किए बिना देशहित में अर्थव्यवस्था योद्धा हो गिरते पड़ते गिरती पड़ती अर्थव्यवस्था के केवट बन जाते हैं।’