आत्मनिर्भरता की नई अहमियत

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

इस समय संरक्षणवाद की चुनौतियों के बीच यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि देश को आत्मनिर्भर बनाने और देश की वैश्विक तस्वीर को चमकीली बनाने के लिए हमें स्थानीयता पर जोर देना होगा। यानी लोकल को वोकल बनाने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ाना पड़ेगा। यह कोई छोटी बात नहीं है कि कोरोना के संकट में जब दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ढह गई हैं, तब भी लोकल यानी स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था, स्थानीय विनिर्माण, स्थानीय बाजार देश के बहुत काम आए हैं। यदि हम वर्तमान समय में दुनिया में चमकते हुए ग्लोबल ब्रांड्स की ओर देखें तो पाते हैं कि वे भी कभी बिल्कुल लोकल थे। इसलिए कोरोना संकट में न सिर्फ  हमें लोकल प्रॉडक्ट खरीदने हैं, बल्कि उनको हरसंभव तरीके से आगे बढ़ाना भी जरूरी है...

यकीनन कोरोना संकट की वजह से दुनिया में संरक्षणवाद की चुनौती बढ़ते हुए दिखाई दे रही है। ऐसे में भारत वैश्विक संरक्षणवाद से अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के मद्देनजर आत्मनिर्भरता की डगर को आगे बढ़ाते हुए दिखाई दे रहा है। वैश्विक संरक्षणवाद से देश को बचाने और तेजी से विकास करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का मंत्र दिया है। ज्ञातव्य है कि अभी भी कोविड-19 से भारत के अधिक प्रभावित न होने का प्रमुख कारण हमारे घरेलू बाजार, कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती और विदेश व्यापार पर कम निर्भरता ही है। ऐसे में भारत के आत्मनिर्भर होने की संभावनाएं आगे बढ़ सकती हैं। गौरतलब है कि कोविड-19 के बाद दुनिया के विकसित देश अप्रवास (इमिग्रेशन) संबंधी नियम कठोर करते हुए दिए दिखाई दे रहे हैं। पिछले माह 22 अप्रैल को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधिकारिक आदेश जारी कर अमरीका में इमिग्रेशन पर साठ दिनों के लिए पाबंदी लगा दी है। कहा गया है कि साठ दिन बाद वह स्थिति की समीक्षा कर निर्णय लेंगे कि इस पाबंदी को लागू रखना है या हटाना है। ट्रंप का कहना है कि अदृश्य दुश्मन के हमले और देश में तीन करोड़ से अधिक लोगों के बेरोजगार हो जाने के मद्देनजर अमरीकी नागरिकों की नौकरी बचाने के लिए अमरीका में अस्थायी रूप से इमिग्रेशन सस्पेंड करना जरूरी हो गया था। ज्ञातव्य है कि पिछले दो वर्षों यानी 2018 और 2019 में एक ओर अमरीका, चीन, मैक्सिको, कनाडा, ब्राजील, अर्जेंटीन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, यूरोपीय संघ के विभिन्न देशों ने भारत की कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर भारत के निर्यात हतोत्साहित किए, वहीं दूसरी ओर कई देशों ने भारत के बाजार को खोलने और भारत में आयात बढ़ाने का अनुचित दबाव बढ़ाया। अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि कोविड-19 की चुनौतियों के बीच अमरीका और अन्य कई देश कोरोना संक्रमण से बचने और अपने कारोबार को बचाने के लिए अधिक संरक्षणवादी कदमों की डगर पर बढ़ रहे हैं। अतएव अब भारत को भी जहां आयात-निर्यात क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करने के लिए आयात-निर्यात संरक्षण की नई रणनीति पर आगे बढ़ना होगा, वहीं हाल ही में 12 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा घोषित आत्मनिर्भर भारत अभियान को कारगर बनाकर आत्मनिर्भर बनने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ना होगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने कोविड-19 के संकट से चरमराती देश की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान की अहम कड़ी के तौर पर बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच किस्तों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपए से करीब एक लाख करोड़ रुपए ज्यादा यानी 20 लाख 97 हजार 53 करोड़ रुपए के पांच अलग-अलग ब्यौरे प्रस्तुत किए हैं। इस आर्थिक पैकेज से देश के लिए आत्मनिर्भरता के पांच स्तंभों को मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया है। इन पांच स्तंभों में तेजी से छलांग लगाती अर्थव्यवस्था, आधुनिक भारत की पहचान बनता बुनियादी ढांचा, नए जमाने की तकनीक केंद्रित व्यवस्थाओं पर चलता तंत्र, देश की ताकत बन रही आबादी और मांग एवं आपूर्ति चक्र को मजबूत बनाना शामिल है। नए आर्थिक पैकेज के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर भारत की बुनियाद बनाने का रणनीतिक कदम आगे बढ़ाया गया है। कृषि एवं उससे जुड़े क्षेत्रों पर 1.63 लाख करोड़ रुपए के प्रावधान किए गए हैं। सरकार ने आर्थिक पैकेज में खेती-किसानी पर जोर देकर किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने की कवायद की है। निःसंदेह शीत भंडार गृहों और यार्ड जैसे बुनियादी ढांचे के लिए एक लाख करोड़ रुपए का कोष अत्यधिक महत्त्वपूर्ण कदम है। निश्चित रूप से पशुपालन बुनियादी ढांचा विकास फंड से भारत की मौजूदा डेरी क्षमता तेजी से बढे़गी। साथ ही इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 30 लाख लोगों के लिए रोजगार का सृजन होगा। इसी तरह किसानों को कृषि उत्पाद मंडी समिति के माध्यम से उत्पादों को बेचने की अनिवार्यता खत्म होने और कृषि उपज के बाधा रहित कारोबार से बेहतर दाम पाने का मौका मिलेगा। इतना ही नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था से संबद्ध विभिन्न वर्गों को सरल ऋण देने हेतु 2.30 लाख करोड़ रुपए के प्रावधान से अढ़ाई करोड़ से अधिक किसानों को लाभान्वित करने का लक्ष्य रखा गया है। निःसंदेह कोविड-19 के बीच तेजी से आगे बढ़े कृषि सुधारों से भी ग्रामीण क्षेत्रों की आत्मनिर्भरता का एक छिपा हुआ अवसर आगे बढ़ा है। कोरोना वायरस के फैलने के कारण देश में खेती करने के परंपरागत तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। फसलों की बुआई, कटाई और भंडारण के तरीकों में जो परिवर्तन आया है, उसके कारण किसानों के द्वारा खेत तैयार करने, खेत में बुआई और फसल कटाई के काम में मशीनों का अधिक प्रयोग, सरकार के द्वारा गोदामों एवं शीतगृहों को बाजार का दर्जा दिया जाना, निजी मंडियां खोलने को प्रोत्साहनदायक अनुमति, कृषक उत्पादक संगठनों को मंडी की सीमा के बाहर लेन-देन की अनुमति, श्रम बचाने वाले उपकरणों के कारण कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण, फसल विविधीकरण जैसे जो कृषि सुधार दिखाई दे रहे हैं, वे कोविड-19 के बाद भी मुठ्ठियों में बने रहने से देश का कृषि क्षेत्र लाभप्रद दिखाई देगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ते हुए दिखाई देगी। देश के कोने-कोने में ढहते हुए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) को बचाने के लिए नए आर्थिक पैकेज में कुल तीन लाख 70 हजार करोड़ रुपए के अभूतपूर्व राहतकारी प्रावधान घोषित किए गए हैं, जिनमें से इस क्षेत्र की इकाइयों को तीन लाख करोड़ रुपए का गारंटी मुक्त कर्ज दिया जाना सबसे प्रमुख प्रावधान है। निश्चित रूप से एमएसएमई के लिए घोषित राहत पैकेज देश के करीब 6.30 करोड़ एमएसएमई उद्यमियों को उनका कारोबार कई गुना तक बढ़ाने में मदद कर सकता है।

इस समय संरक्षणवाद की चुनौतियों के बीच यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि देश को आत्मनिर्भर बनाने और देश की वैश्विक तस्वीर को चमकीली बनाने के लिए हमें स्थानीयता पर जोर देना होगा। यानी लोकल को वोकल बनाने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ाना पड़ेगा। यह कोई छोटी बात नहीं है कि कोरोना के संकट में जब दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ढह गई हैं, तब भी लोकल यानी स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था, स्थानीय विनिर्माण, स्थानीय बाजार देश के बहुत काम आए हैं। यदि हम वर्तमान समय में दुनिया में चमकते हुए ग्लोबल ब्रांड्स की ओर देखें तो पाते हैं कि वे भी कभी बिलकुल लोकल थे। इसलिए कोरोना संकट में न सिर्फ  हमें लोकल प्रॉडक्ट खरीदने हैं, बल्कि उनको हरसंभव तरीके से आगे बढ़ाना भी जरूरी है। हम उम्मीद करें कि देश की नई पीढ़ी के द्वारा ग्रामीण और शहरी भारत के अमूल्य संसाधनों के पूर्ण उपयोग से देश आत्मनिर्भर बनने की डगर पर आगे बढ़ते हुए दिखाई दे सकेगा।

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