आत्म पुराण

श्वेताश्वतर मुनि फिर कहने लगे, हे संन्यासियों! जब उन ब्रह्मवेत्ता वृद्ध ब्राह्मणों ने सभा में एकत्रित विद्वानों से ऐसा वचन कहा, तो वे सब बहुत संतुष्ट और प्रसन्न होकर उन वृद्धजनों से कहने लगे कि आप ही कृपा करके हम सबको जगत के उस कारण को श्रवण कराओ, जिसे आपने निश्चय किया हो। तब वे ब्रह्मवेत्ता वृद्ध ब्राह्मण उन विद्वानों के तर्क कुशल देखकर इस प्रकार समझने लगे। हे सर्व ब्राह्मणों! यदि तुम यह जानते हो कि यह जगत बिना किसी कारण के ही उत्पन्न हो जाता है, तो यह संभव नहीं। क्योंकि सब पदार्थ किसी कारण से ही उत्पन्न होते हैं। बिना सूत के वस्त्र कैसे तैयार हो सकता है? बिना स्त्री-पुरुष के संयोग के पुत्र कैसे उत्पन्न हो सकता है? बिना अन्न की व्यवस्था किए क्षुधा का निवारण कैसे हो सकता है? यदि बिना कारण ही कार्य का होना मान लिया जाए, तो सब प्रकार के व्यवहार बंद हो जाएंगे। जो बहिर्मुखवादी (नास्तिक) कारण के अभाव को ही कार्य की उत्पत्ति का आधा मान लेते हैं, उनका मत माननीय नहीं हो सकता। ऐसे वादियों से यह पूछना चाहिए कि तुम जो कारण के अभाव को जगत का कारण बतलाते हो वह ‘अभाव’ कैसा है। यह अत्यंताभाव है, या प्रागभाव है, या प्रध्वंसाभाव है, या अन्योन्याभाव है? यदि तुम अत्यंताभाव स्वीकार करते हो, तो अत्यंताभाव तो सब जगह मिल सकता है। फिर उससे चाहे जिस कार्य की उत्पत्ति क्यों नहीं होती रहती है? इसी प्रकार का दोष, प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव में है, क्योंकि किसी भी प्रकार अभाव से नित्य (किसी रूप में सदैव रहने वाला) पदार्थों की पंचभूतों की उत्पत्ति होना संभव नहीं है।

शंका-हे भगवन! यदि अभाव से नहीं तो केवल ब्रह्म से ही जगत की उत्पत्ति हो सकती है, श्रुति में कहा है-‘यतो-वाइमानी भूतानि जायते’-अर्थात ‘जिस ब्रह्म से यह संपूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है।’ इसी प्रकार अनेक अन्य श्रुतियों और स्मृतियों में भी ब्रह्मा को ही जगत का कारण कहा गया है।

समाधान-हे ब्राह्मणों! जिन श्रुति वचनों में ब्रह्म को जगत का कारण कहा है, उनमें भी निर्विकार अद्वितीय ब्रह्म को जगत का कारण नहीं कहा है, वरन् ब्रह्म शब्द का गौण अर्थ जो आकाश आदि हैं, उनको जगत का कारण कहा गया है।

शंका-हे भगवन! जैसे यह भौतिक प्रपंच उत्पत्ति का करने वाला है, वैसे ही आकाश आदि भी उत्पत्ति करने वाले हैं। श्रुति में भी कहा है ‘आत्मन आकाशः संभूव’ अर्थात आदि का कारण ब्रह्म को माना जा सकता है।

समाधान-हे ब्राह्मणो! वास्तव में तो अद्वितीय निर्विकार ब्रह्म में किसी पदार्थ की कारणता नहीं है। पर अनेक श्रुति, स्मृतियों में ब्रह्म को ही जगत का कारण कथन किया गया है। इसलिए हमको ब्रह्म के समीप स्थित कोई अन्य कारण ढूंढना चाहिए।

यह जगत बिना किसी कारण के अथवा अभाव से, अथवा अद्वितीय ब्रह्म से उत्पन्न हो गया ये तीनों विचार असंगत हैं। इसलिए हम सब ब्राह्मणों को जगत क अन्य कारण पर विचार करना चाहिए। अच्छा, अभी संपूर्ण जगत के कारण का विचार रहने दो, पहले यही विचार कर लो कि हमारे इस स्थूल शरीर का कारण क्या है?

शंका- हे भगवन ! इस स्थूल शरीर की उत्पत्ति कैसे होती है। इस तथ्य को समस्त संसार जानता चाहता है।

समाधान- हे ब्राह्मणो! त्वचा, रुधिर, मास, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य इन सात धातुओं में से  जो स्थूल शरीर की उत्पत्ति होती है वे केवल एक ही है और उससे किसी और चीज की उत्पत्ति बिलकुल नहीं हो सकती।

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