Thursday, August 06, 2020 06:45 PM

आत्म पुराण

एक स्थान में आपने श्वेतकेतु ऋषि की भी चर्चा की थी, जो आरंभिक अवस्था में विद्याध्ययन से विमुख रहकर भी अंत में महान ज्ञानी और आध्यात्म विद्या का उपदेश करने वाला हो गया। हम आपसे उसी उपासना को सुनना चाहते हैं। इस पर श्रीगुरुदेव कहने लगे। हे शिष्य! श्वेतकेतु अरुणि नामक ऋषि का पुत्र था। बाल्यावस्था में उसके माता-पिता उससे अत्यंत स्नेह करते थे, इससे वह कुछ भी पढ़ना-लिखना न सीख सका वरन उद्दंड होकर सबसे लड़ाई झगड़ा करने वाला बन गया। वह सबसे अपशब्द कहता मारपीट करता और फिर भागकर घर में घुस जाता। इस प्रकार वह बारह वर्ष का हो गया और तब तक भी उसका उपनयन संस्कार न हो सका। इस पर दुःखित होकर उसके पिता ने कहा,श्वेतकेतु हमारे कुल में अभी तक ऐसा कोई नहीं हुआ जो तेरी तरह इतनी आयु तक विद्या और ब्राह्मण कर्त्तव्यों से विमुख रहा हो। इससे तू आगे चल कर बहुत दुःख पाएगा और परलोक में भी तुझे नरक आदि के बहुत कष्ट सहन करने होंगे। इससे पिता के नाते हमारी भी अपकीर्ति होगी कि इन्होंने झूठे स्नेह के वशीभूत होकर अपने पुत्र जो ऐसा निकृष्ट और ब्राह्मणत्व से रहित बना दिया। अब तू बड़ा हो चला है इससे मेरी शिक्षा का तो तेरे ऊपर प्रभाव पड़ेगा नहीं,इससे तू किसी आचार्य की सेवा में रहकर वेद शास्त्र के अध्ययन का प्रयत्न कर। पिता की बातें सुनकर श्वेवतकेतु को कुछ ग्लानि आई और वह विद्यालय के लिए किसी अन्य स्थान में चला गया। वहां रहकर उसने चारों वेदों का अध्ययन भली प्रकार किया। उसकी बुद्धि तीव्र थी और आचार्य उसे परिश्रम पूर्वक पढ़ाते थे, इससे कुछ ही वर्षों में उसे वेद शास्त्रों की अच्छी जानकारी हो गई। जब शिक्षा समाप्त होने पर  आचार्य ने उसे घर लौटने की आज्ञा दी, तो उसके भीतर एक प्रकार का अहंभाव जाग्रत हो गया। वह सोचने लगा कि अब मैंने अपने पिता और उनके अन्य सहकारियों की अपेक्षा भी अधिक विद्या प्राप्त कर ली। अब मैं उनसे बड़ा माना जाऊंगा और अधिक आदर सम्मान का अधिकारी होऊंगा। इसलिए जब वह अपने घर पहुंचा, तो बिना अपने पिता आदि को प्रणाम किए उच्च आसन पर बैठ गया। उसके पिता आरुणि ऋषि यह देखकर बड़े खिन्न हुए कि विद्या प्राप्त कर लेने पर भी इसके दुर्गुण दूर नहीं हो सके। तो भी इसका सुधार करना हमारा कर्त्तव्य है। यह विचार करने लगे। हे श्वेतकेतु! जिस विशेषता के कारण तूझे इतना अभिमान हुआ है कि तू काष्ठ स्तंभ के समान नम्रता रहित हो गया है और जिस विशेषता के कारण तू अपने को वेद-वेदांग का ज्ञाता मानता है और जिसके कारण तू अपने को सबसे बड़ा विद्वान समझने लगा है,वह विशेषता क्या है। यह हमको बतला? क्या तुमने कभी अपने गुरु से पूछा था कि वह विद्या कौन सी है जिसको सुन लेने से समस्त बिना सुनी हुई वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, जिसका एक मनन करने से समस्त बिना मनन किए हुए पदार्थोें का मनन हो जाता है, जिस एक वस्तु के विज्ञान को जान लिया जाता है।  यदि तू उस विद्या को जानता हो तो उसको हमारे सामने कथन करो।