Thursday, April 18, 2019 06:39 PM

आदमकद देश का बौना चुनाव

कुमार प्रशांत

स्वतंत्र लेखक

 

लोकतांत्रिक इतिहास में सबसे महंगा माना जाने वाला आसन्न आम चुनाव क्या अपनी फूहड़ता, भाषाई अशिष्टता और निजी अपमान के लिए भी याद नहीं रखा जाएगा? सवाल है कि इस सबके बावजूद क्या हमारी राजनीतिक बिरादरी आम जीवन से जुडे़ किसी मुद्दे पर कोई गंभीर बहस छेड़ पाई है? पुलवामा में लाशें गिनकर जो मौत का मंजर बना रहे थे और बालाकोट में जो इसी गिनती की होड़ में पड़े थे कि कितने सर थे, वही राजनेता आज कहते हैं - हम लाशें नहीं, वोट बटोरने आए हैं...

कहते हैं कि चुनाव लोकतंत्र का महापर्व है, लेकिन यह चुनाव ही है जिसमें देश का दर्द-दर्प-गर्व सब धूल-धूल हो जाता है और यह काम वे करते हैं, जो कसमें खा-खा कर देश की दुहाई देते हैं। देश को धूल बनाने वाले इस चुनाव की व्याख्या करते हुए कभी विनोबा भावे ने बड़ी मार्मिक बात कही थी कि ‘हमारे यहां चुनाव का सूत्र है, मिथ्या भाषण, पर निंदा और आत्मस्तुति’। आज चुनाव के सभी स्टार प्रचारक एड़ी-चोटी का जोर लगा कर विनोबा को सही साबित करने में जुटे हैं। जो जितना बड़ा प्रचारक है, वह इस सूत्र का उतना ही बड़ा सूत्रधार है। हमने चुनाव का हाल ऐसा बना दिया है कि वोट मांगने वाला उम्मीदवार नहीं, वोट देने वाला मतदाता ही याचक बना फिरता है। और चुनाव आयोग? उसके हाथ में एक चमकती हुई, दिनोंदिन महंगी होती जा रही तलवार है, जिसका राज यह है कि वह गत्ते की है। चुनाव आयोग के पास इतनी भी ताकत नहीं है कि वह चुनाव की तारीखों की घोषणा स्वविवेक से कर सके, उम्मीदवारों द्वारा घोषित संपत्ति के ब्यौरों को जांच सके और उसके आधार पर कार्रवाई भी कर सके।

चुनाव आयोग के पास ऐसी भी कोई ताकत नहीं है कि वह अपराधियों को उम्मीदवार बनने से रोक सके और ऐसे लोगों को प्रश्रय देने वाले दलों को चेतावनी जारी कर सके। चुनावों का लोकतांत्रिक चेहरा तभी गढ़ा जा सकता है, जब रोज-ब-रोज उभरने वाले उसके दोषों का निराकरण होता चले। अगर यह एक बंद तालाब है, तो इसका सड़ना निश्चित है। लोकतंत्र में चुनाव पंचायत से शुरू होते हैं और कई स्तरों पर चलते-चलते, कालेजों, विश्वविद्यालयों के छात्र संघों तक पहुंचते हैं। जरा करीब से देखिए, तो ये ही वे प्राथमिक स्कूल हैं, जहां बड़े चुनावों की ट्रेनिंग दी जाती है। चुनाव की इस पूरी प्रक्रिया को तोड़-मरोड़ कर इसमें से लोकतंत्र की भावना को दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंकने का प्रशिक्षण यहीं पूरा होता है। चुनाव में व्यक्ति और समाज में छिपे हर गर्हित भाव को उभार-ललकार कर उसे आदमी की बजाय भीड़ बनाना पड़ता है। अगर जनता भीड़ न बने, तो आज के सत्वहीन, चरित्र-विहीन और ज्ञान-संस्कार शून्य राजनेताओं को वोट देगा कौन? इसलिए क्षुद्र-से-क्षुद्र मुद्दे खोजने व भड़काने पड़ते हैं, अर्थहीन नारों में फेफड़ों की ताकत भरनी पड़ती है और बेतुकी बातों की तुकबंदी बिठानी पड़ती है। मेरी बातों से आपको कहीं ऐसा तो नहीं लग रहा है कि मैं चुनाव की व्यर्थता साबित कर रहा हूं? नहीं, मैं तो इतना ही बताने की कोशिश कर रहा हूं कि हमारे चुनाव सार्थक हों, इसके लिए क्या-क्या करने की जरूरत है। चुनाव राष्ट्रीय स्तर का है, तो उसके मुद्दे भी राष्ट्रीय स्तर के होने चाहिएं। राष्ट्रीय मुद्दे होंगे, तो व्यक्ति कहीं पीछे छूट जाएगा और देश आगे आ जाएगा। फिर सीनों की चौड़ाई से राष्ट्रीयता की पहचान नहीं की जा सकेगी, ज्ञान की गहराई से दलों की दशा और दिशा नापी जाएगी। राष्ट्र के सामने सवाल है कि उस आतंकवाद का मुकाबला कैसे किया जाए, जो सीमापार से भी आ रहा है, और सीमा के भीतर भी गाय-जाति-सांप्रदायिकता के नाम पर फूटता रहता है। फूटे कहीं से भी और उसका रंग कैसा भी हो, आतंकवाद राष्ट्र की सामाजिक बनावट को ढीला करता है, समाज को बिखेर देता है। आतंकवाद ऐसे बिखरे समाज के ढेर में आग लगा देता है। अगर राष्ट्र सामने हो, तो आप एक आतंकवाद का विरोध और दूसरे का साथ नहीं ले सकते और न मतदाता एक को कबूल कर, दूसरों से आंखें मूंद सकता है। अगर राष्ट्र सामने है, तो चुनौती बेरोजगारी की है, जो सुरसा की भांति बढ़ती जा रही है। यह एक साथ ही देश का वर्तमान और हमारे युवाओं का भविष्य लील रही है। चुनाव में उतरे सभी चतुर-सुजानों में से कोई एक तो बताए कि पिछले पांच सालों में और पिछले 70 सालों में वह क्या नहीं किया जा सका जिससे बेरोजगारी का ऐसा खतरनाक मंजर सामने आया है? कारण बताने से बीमारी तो दूर होती नहीं है, सो यह भी बताना होगा कि इन सारे जम्हूरों के लिए क्या करेंगे आप कि बेरोजगारी पर लगाम लगे? यहां तो यह भी पता नहीं है कि बेरोजगारी की स्थिति क्या है आज, तो लगाम कैसे लगेगी और कौन लगाएगा? आपने तो आंकड़ों का आईना ही तोड़ दिया है।

गांव-गांव से एक ही चीखती आवाज आ रही है कि किसानों की आत्महत्याओं का क्या करेंगे आप? इन सारे चुनावी दिग्गजों को अब तक जो सूझा है, वह है कर्जमाफी। कर्जमाफी का एक और सिर्फ एक ही मतलब होता है - आज नहीं, तो कल आत्महत्या करना। किसान कहता है - अगर किस्मत में यही बदा है, तो वह कल क्यों, आज ही क्यों न हो जाए।  देश के लोकतांत्रिक इतिहास में सबसे महंगा माना जाने वाला आसन्न आम चुनाव क्या अपनी फूहड़ता, भाषाई अशिष्टता और निजी अपमान के लिए भी याद नहीं रखा जाएगा? सवाल है कि इस सबके बावजूद क्या हमारी राजनीतिक बिरादरी आम जीवन से जुडे़ किसी मुद्दे पर कोई गंभीर बहस छेड़ पाई है? क्या लोकतंत्र का यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान आपस में चुनाव-चुनाव ‘खेलने’ वाले राजनेताओं के भरोसे ‘निपटा’ दिया जाएगा?

पुलवामा में लाशें गिनकर जो मौत का मंजर बना रहे थे और बालाकोट में जो इसी गिनती की होड़ में पड़े थे कि कितने सर थे, वे ही राजनेता आज हमारे किसानों से कहते हैं - हम लाशें नहीं, वोट बटोरने आए हैं। लेकिन मरने वाला फौजी क्या कहता है? उस दिन टीवी पर उनका कमांडर एकदम तटस्थ चेहरे से कह रहा था - हमें जो काम दिया गया था, उसे हमने सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, बस! ‘...नहीं, लाशें गिनना हमारा काम नहीं है’। यह है देश के कद का जवाब - देश के कद को ऊंचा बनाने वाला जवाब। जवाब किसी के पास नहीं है कि हमारे चुनाव कब देश के कद के होंगे? सब भले ही मौन रहें, मेरी तरफ से आप एक सच्चाई जरूर दर्ज कर लीजिए कि हमारे मुद्दे जब तक देश के कद के नहीं होंगे, हमारे चुनाव बौनों के हाथ के खिलौने ही बने रहेंगे।