Tuesday, September 29, 2020 04:17 PM

आनंदमय होने का महत्त्व

सद्गुरु  जग्गी वासुदेव

आनंद और सुख  ये दो शब्द अकसर एक दूसरे के पर्याय के रूप में इस्तेमाल कर लिए जाते हैं, लेकिन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। क्या अंतर है इनमें? मिस्र की एक दंतकथा है। अगर कोई व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश पाना चाहता है, तो स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर उसे दो सवालों के जवाब देने होते हैं। अगर आपने इन दोनों सवालों के जवाब हां में नहीं दिए तो आपको स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। इसमें पहला सवाल है क्या जीवन में आपने खुशी और आनंद का अनुभव किया है और दूसरा सवाल है, क्या आपने अपने आसपास के लोगों को खुशी बांटी है, इन दोनों ही सवालों के लिए आपका जवाब अगर हां है, तो मैं आपको यह बता दूं कि आप तो पहले से ही स्वर्ग में हैं। आनंद बाहर नहीं भीतर खोजना होगा। आप खुद के लिए और अपने आसपास के लोगों के लिए सबसे अच्छी चीज जो कर सकते हैं, वह है खुद को एक आनंदमय इनसान बनाना। खासकर आज के दौर में जब क्रोध, नफरत और असहनशीलता भयानक तौर से लोगों के सिर चढ़कर बोल रही है, ऐसे में आनंदमय इनसान ही सबसे बड़ी राहत में नजर आता है। जो लोग आनंदमय होने का महत्त्व जानते हैं, वही हर तरफ  आनंद का माहौल बनाने की कोशिश करेंगे। सवाल यह है कि आनंद में कैसे रहें? पांच साल की उम्र में आप बागीचे में तितली के पीछे भागते थे, आपको याद होगा। तितली को छूते हुए उसके रंग आपके हाथ पर झिलमिलाते हुए चिपक जाते थे। उस समय आपको यही अनुभव होता था कि दुनिया में इससे बढ़कर और कोई आनंद है ही नहीं। बड़े होने की प्रक्रिया में आपने सभी सुख-सुविधाओं के साधन जमा कर लिए, लेकिन क्या हुआ? कहां गईं आपकी खुशियां, ऐसा इसलिए है कि आप सुख को ही खुशी समझ बैठे हैं, जबकि खुशी या आनंद आपको अपने भीतर खोजना है। सुख किसी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर करता है। बड़े होकर आप अपना अतीत ढोने लगे। जब आप अपने अतीत का बोझ लेकर चलते हैं, तो आपका चेहरा लटक जाता है, खुशी गायब हो जाती है, उत्साह खत्म हो जाता है। मान लीजिए अगर आप पर किसी तरह कोई बोझ नहीं है, तो आप बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह होते हैं। आप इतने साल के हैं या उतने साल के, इसका सीधा सा मतलब हुआ कि आप अपने साथ उतने सालों का कूड़ा ढो रहे होते हैं। इससे कोई फर्क  नहीं पड़ता कि आप किस तरह आनंदित होते हैं। जरूरी यह है आप किसी भी तरह आनंद अनुभव करते हैं। अब सवाल है इसे कायम रखने का, इसे कायम रखने के योग्य कैसे बनें? अधिकांश लोग सुख को ही आनंद समझ लेते हैं। आप कभी भी सुख को स्थायी नहीं बना सकते, ये आपके लिए हमेशा कम पड़ते हैं, किंतु आनंदित होने का अर्थ है कि यह किसी भी चीज पर निर्भर नहीं है। सुख हमेशा किसी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर करता है। आनंद का कुआं अपने भीतर खोदना होगा। आनंद किसी पर निर्भर नहीं करता है, यह तो आपकी अपनी प्रकृति है। आनंद को असल में किसी बाहरी उत्तेजना की आवश्यकता नहीं होती। यह तो अपने भीतर गहराई में खोद कर ढूंढ निकालने की चीज है।