Monday, August 26, 2019 08:42 AM

आनंद की अवस्था

बाबा हरदेव

अध्यात्म में भक्ति-शास्त्र का अध्ययन नहीं हो सकता। मानो भक्ति सोच-विचार और केवल ‘चिंतन’ का विषय नहीं है। उदाहरण के तौर पर हम किसी बागीचे में एक फूल को देख रहे हैं और सोचते हैं कि ये फूल गुलाब का है, कि जूही का है कि चंपा है, कि लाल है, कि पीला है, कि सफेद है, कि सुगंधित है, कि सुगंधित नहीं, देशी है विदेशी है और या फिर हम इस तरह की तुलना करने लग जाते हैं, गुलाब के संबंध में, जूही और चंपा के संबंध में, कि कभी पहले जो गुलाब और जूही, चंपा हमने देख रखे हैं, ये उनसे सुंदर है कि कम सुंदर है, तो निश्चित ही हम चिंतन में लगे हैं। अब अगर मनुष्य का ‘चिंतन’ इस तरह के तर्क में उलझता चला जाता है, या फिर कर्मकांड रूपी खेल में लग जाता है, तो वो कोल्हू के बैल की तरह चलने लग जाता है, यहां तक कि वो प्रभु भक्ति को भी खिलौना समझ बैठता है, कबीर जी फरमाते हैंः

माथे तिलक हथ माला बाणा लोगन राम खिलौना जाना अतः आबद्ध चित्तदशा वाले मनुष्य की वृत्ति ‘मनन’ तक बड़ी मुश्किल से पहुंच पाती है। अब यद्यपि ‘मनन’ सोच-विचार नहीं है, चिंतन नहीं है, फिर भी चिंतन करने वाला मनुष्य अगर ठीक मार्ग से चले तो ये ‘मनन’ की वृत्ति पर पहुंच सकता है। मानो पूर्ण सद्गुरु की कृपा द्वारा जो मनुष्य इतना चेतनशील हो जाता है कि निराधार तर्क और चिंतन की व्यर्थता को पहचान लेता है, तो इसका चिंतन और इसकी चिंतन ऊर्जा ‘मनन’ की वृत्ति में परिवर्तित होने लगती है। मनन भावना है। अब ऊपर वर्णन किए गए उदाहरण में अगर हम केवल मात्र फूलों (गुलाब जूही या चम्पा) को देख रहे हैं और उनके सौंदर्य को आंखों से पी रहे हैं,तो फूल हम में उतर रहे हैं और हम फूलों में उतर रहे हैं और सोच नहीं रहे और न अतीत के फूलों से और न वर्तमान के फूलों से किसी प्रकार की तुलना कर रहे हैं, व्याख्या ओर विश्लेषण और नामकरण नहीं कर रहे हैं, तो फिर हमारे और फूलों के बीच आंतरिक लेन-देन शुरू हो जाता है, जो ‘मनन’ का प्रतीक है। अतः इस अद्भुत दिशा में फूल अपना सौंदर्य और सुगंधि हमारे अंदर उड़ेलने लग जाते हैं। फूल और हम दोनों ही तरंगित होने लगते हैं, एक तरंग में यानी ऐसी दशा जहां न कोई विचार उठता है, जहां विचार की एक भी परत बीच में नहीं रह जाती। जब मनुष्य के हृदय के सारे कपाट खुल जाते हैं और मनुष्य का स्वागत परिपूर्ण रूप अख्तियार कर लेता है, फिर इन फूलों से ही मनुष्य को परमात्मा का हाथ फैला हुआ अनुभव होने लगता है। अतः इस सूरत में एक क्षण ‘मनन’ का ऐसा आ जाता है, जहां मनुष्य ये नहीं कह सकता कि कौन फूल है और कौन मनुष्य है, यानी यहां दोनों की सीमाएं एक-दूसरे पर छा जाती है। यहां दोनों एक हो जाते हैं। अब मनन में भक्तों के वचन हृदय रूपी काल से सुने जाते हैं और कर्म रूपी जुबान से सुनाए जाते हैं, यह केवल नीचे नहीं जाते इनका चिंतन नहीं हो सकता। अतः जब कोई प्रभु भक्त परमात्मा का नाम ले, तो हम यह मत सोचने लग जाएं कि यही प्रभु का नाम है या नहीं। उदाहरण के तौर पर कोई कहे राम, कोई कहे रहमान, कोई कहे गॉड, कोई कहे अकाल पुरख, कोई अंतर नहीं पड़ता।