आपदा प्रबंधन को सुदृढ़ बनाएं

शक्ति चंद राणा

लेखक, बैजनाथ से हैं

 

इस आशय से सरकार को पंचायत स्तर तक जरूरी आदेश द्वारा आवश्यक समितियों का गठन समय रहते कर लेना चाहिए और आवश्यक फोन नंबर सबके पास मौजूद रहें। जहां समितियों का गठन हो जाए, तो हर पंचायत में साधारण सभा के एक दिन वहां सभी ग्रामीण लोगों के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन कर कुछ पै्रक्टिकल और कुछ भाषण द्वारा उन्हें संभावित, अप्रत्याशित आपदा के बारे में जागरूक किया जा सके। हर पंचायत में युवाओं का विशेष सेवादल हो। उनके संपर्क नंबर हर समय पंचायत सचिव व प्रधान के पास हों...

जिस प्रकार मेहमान, मृत्यु और ग्राहक का कोई समय नहीं है, ठीक उसी तरह आपदा प्राकृतिक हो अथवा मानव भूल से उत्पन्न, कभी भी बता कर नहीं आती और कोई पूर्वानुमान भी इसका लगाना कठिन है। यह कब आए-न आए, लेकिन हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम सदा-सर्वदा इसके लिए अपनी तैयारी रखें। बेशक ऐसे आपातकाल में जन-जन के साथ सरकारों का प्रथम कर्त्तव्य बन जाता है कि वे इस बारे हर समय सतर्क, तैयार और संवेदनशील रहें। हमारी तैयारी को लेकर हम क्या कर सकते हैं, इस बारे में  विशेषज्ञों की राय है कि गांवों और नगरों में रहने वाले हर नागरिक को इसके लिए जरूरी ज्ञान, प्रशिक्षण होना चाहिए। स्थानीय स्वशासन व प्रत्येक जागरूक नागरिक ग्रामीण हो अथवा नगर में रहने वाला, उसके पास संपर्क सूत्र और सूचना तंत्र अवश्य कारगर हो। ऐसे समय में उस सूचना को एकत्रित करने और आपदा संबंधी सूचना संप्रेषित करने के लिए फोन अथवा अन्य माध्यम जरूर होने चाहिए, ताकि उनके द्वारा वह आपदा का जायजा, नुकसान का अनुमान तो लगाए ही साथ में इसके बारे में आगे भी उत्तरदायी अधिकारियों तक सूचना पहुंचा सके। जैसे गांव का मुखिया, पंचायत सचिव, स्थानीय चिकित्सक, अस्पताल, पुलिस स्टेशन, जिला स्तर तक सूचना का आदान-प्रदान सरल ढंग से हो और उसकी गंभीरता के अनुरूप दूसरी ओर से उस आपदा से निपटने के लिए तत्काल तथा अर्द्धसैनिक बलों की आसपास यदि कोई यूनिट हो, तो ग्राम पंचायत में वहां आपदा प्रबंधन कमेटियों, समितियों के पास जरूर हों, ताकि उनका समय पर सदुपयोग हो।

इस आशय से सरकार को पंचायत स्तर तक जरूरी आदेश द्वारा आवश्यक समितियों का गठन समय रहते कर लेना चाहिए और आवश्यक फोन नंबर सबके पास मौजूद रहें। जहां समितियों का गठन हो जाए, तो हर पंचायत में साधारण सभा के एक दिन वहां सभी ग्रामीण लोगों के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन कर कुछ पै्रक्टिकल और कुछ भाषण द्वारा उन्हें संभावित, अप्रत्याशित आपदा के बारे में जागरूक किया जा सके। हर पंचायत में युवाओं का एक विशेष सेवादल हो। उनके संपर्क नंबर हर समय पंचायत सचिव व प्रधान के पास हों, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनको ढूंढने के लिए हम अपना समय बर्बाद न करें। पंचायत में ऐसे स्वयंसेवी युवाओं के फोन नंबर भी मौजूद हों या उनकी सूची हो जो, फोन कॉल पर उपलब्ध होकर सेवा एवं राहत कार्यों में सहायता दे सकें। उनकी रक्त समूह की सूचना हो कि कौन किस-किस ब्लड ग्रुप में आते हैं, ताकि रक्त की आवश्यकतानुसार उन्हें बुलाया जा सके। इस संबंध में डिजास्टर मैनेजमेंट एक्सपर्ट की सेवाएं ली जा सकती हैं। जैसे जिला कांगड़ा की बैजनाथ तहसील, उपमंडल के गांव जंडपुर में वायु सेना से निवृत्त फ्लाइट इंजीनियर सुरेश राज शर्मा संस्थाओं द्वारा बुलाने पर विद्यालयों, महाविद्यालयों में अपनी टीम के साथ जाकर दो-तीन घंटे में अत्यंत रोचक ढंग से प्रशिक्षण का कार्य निरंतर जारी रखे हुए हैं। कई बार हमारा अल्प ज्ञान भी हमारी मौत का कारण बन जाता है। कुछ वर्ष पूर्व कांडा पतन में एक नाव दुर्घटना में कुछ लोग जब डूब रहे थे, तो बाहर खड़े अध्यापक ने आवेश में छलांग लगाकर उनको बचाने का प्रयास किया। दुर्भाग्य से वह बेचारा अपने प्रयास में सफल तो नहीं हुआ, परंतु स्वयं भी अपनी जान से इसलिए हाथ दो बैठा, क्योंकि उसे प्रशिक्षण नहीं था कि डूबने वाले व्यक्तियों को बचाने का जोखिम रहित तरीका क्या होता है। आजकल गर्मी का मौसम है और इस मौसम में आमतौर पर अपनी बस्तियों के आसपास हरे-भरे जंगल या तो स्वयं सुलग उठते हैं या फिर घास के लालच में उनको सुलगाने का घोर पाप किया जाता है। इस आग में पौधे तो राख बनते ही हैं, इसके अतिरिक्त इन वनों में गर्मी के मौसम में आमतौर पर पशु-पक्षी अपने बच्चे और अंडे देने का काम करते हैं, जो सब जलकर स्वाह हो जाते हैं।

इस आग से इस तरह कुछ प्रजातियां प्रायः लुप्त ही हो जाती हैं। आज ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने और उससे उत्पन्न होने वाले खतरों के पीछे भी यही कारण है। किसी ने कहा ‘ए स्टिच इन टाइम, सेव्ज नाइन’ अर्थात समय रहते हम आपदाओं से निपटने के ढंग सीख लें अन्यथा स्थिति कितनी गंभीर हो सकती है, उसका अनुमान या कल्पना भी हम नहीं कर सकते। इसलिए उपरोक्त वर्णन के आधार पर सरकार तथा स्वयंसेवी संगठनों की सक्रिय भागीदारी से एक योजनाबद्ध ढंग से काम करें, तो सब संभव है। अन्यथा ‘आग लगने पर कुआं खोदना’ वाली कहावत चरित्रार्थ हो जाएगी। अतः ऐसे समय में हमें अपने विवेक और मानवता के नाते अपने फर्ज निभाने चाहिएं। ऐसे में हर नागरिक का संवेदनशील होना जरूरी है, न कि संवेदनहीन होकर हैवान। जब तक राहत न आए, स्थानीय मौजूद जनसमुदाय में सेवानिवृत्त सिविल तथा रक्षा बलों के स्थानीय निवासियों पर उत्तरदायित्व आता है कि वे सरकारी तंत्र के आने तक ऐसे तत्त्वों को घटनास्थल से दूर रखें।

इस तरह निष्कर्ष यह निकलता है कि हर गांव में: 1. आपदा दल का गठन हो। 2. उसके पास सूचना के आदान-प्रदान हेतु संपर्क सूत्र हों। 3. स्थानीय शासन, प्रशासन, सुरक्षा बलों के फोन नंबर हों। 4. उपरोक्त आपदा प्रबंधन समितियों का प्रशिक्षण और समय-समय पर मानीटरिंग हो। यह तैयारी भूकंप को ध्यान में रखकर हो। 5. युवाओं की स्वयंसेवी संगठनों की (स्थानीय) स्तर पर सूची हो जो जरूरत पड़ने पर सक्रिय हो जाए। 6. युवक-युवतियों के स्वेच्छा से रक्तदान व ब्लड ग्रुप करने के लिए सहमति पत्र पंचायत स्तर पर मौजूद हों। 7. नजदीकी चिकित्सालय, वहां तैनात चिकित्सकों के संपर्क सूत्र हर पंचायत में यह मानकर हर समय तैयार हालात में हो कि कभी भी इनकी आवश्यकता पड़ सकती है। 8. इस प्रकार हमें आपदा प्रबंधन को लेकर तैयार होना होगा। प्रभावित क्षेत्र में भोजन, आवास व वस्त्रों की तत्काल व्यवस्था बारे भी सब योजना में शामिल हों।