Monday, June 01, 2020 02:08 AM

आशंकाओं का मलबा

तहकीकात किस जुर्म की करें, यहां तो हर नींव में अपराध छुपा बैठा है। पब्बर नदी के बीच पुनः विकास का एक पूरा अध्याय नहीं समाया, बल्कि वक्त की चोरी करके कोई सरेआम लूट मचा गया। उद्घाटन की राह देख रहा निर्माणाधीन पुल ढह गया और इसके साथ करीब बारह करोड़ मिट्टी हो गए। जाहिर है पुल का निर्माण सारी प्रक्रियाओं और मानदंडों के अनुरूप ही होना था और यह भी कि इस तरह की परियोजना का अर्थ मात्र विकास नहीं, नागरिक सुरक्षा के प्रति राज्य की चिंता है। यह मात्र गलती नहीं, विभागीय क्षमता का अभिशप्त अध्याय है। यह सिविल इंजीनियरिंग की हिमाचली काया का बदरूप चेहरा और विभागीय निरीक्षण का निर्र्लज्ज प्रदर्शन है। बेशक गुणवत्ता जांच की एक फलती फूलती मशीनरी महकमे के पास रही होगी और बार-बार निरीक्षण-परीक्षण भी हुए होंगे, लेकिन पुल के गिरने से आशंकाओं का मलबा बढ़ जाता है। हो सकता है कल किसी पड़ताल से पता चल जाए कि निर्माणाधीन पुल की चूलें क्यों हिलीं, लेकिन क्या सबक भी मिलेगा। क्या इस अध्याय का अंतिम वाक्य मात्र एक जांच के हवाले से आएगा या कोई गौर करेगा कि बारह करोड़ खाकर पुल का गिरना, हमारी व्यवस्थागत खामियों का परिणाम है या हम इतने अनाड़ी हैं कि पब्बर नदी पर ढंग से एक पुल का निर्माण नहीं कर सकते। जो भी हो ऐसी घटनाएं बताती हैं कि भविष्य के प्रति कितनी लापरवाह व्यवस्था के तहत प्रदेश तरक्की की बाट जोह रहा है। भविष्य की अधोसंरचना निर्माण के प्रति अगर ऐसी घटनाएं होती रहेंगी, तो जांच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। यहां तकनीक, डिजाइन व नवाचार को अपनाने का कौशल प्रश्नांकित है, तो विभागीय आर एंड डी के सूनेपन की शिकायत भी है। कमोबेश हर तरह के तकनीकी पहलुओं में प्रदेश की सफलता को अब लगातार आर एंड डी की जरूरत है। दूसरी ओर निर्माण की जरूरतों में सामग्री से सामर्थ्य तक विभागीय ईमानदारी लाजिमी है। कई विभागों में निर्माण के ढर्रे नहीं बदले हैं, जबकि चुनौतियां बदल गई हैं। यह भी एक विडंबना है कि नए हिमाचल के प्रारूप में सियासत की पसंद के आगे हर पहलू ठिगना होने लगा है। इसी से उभरी ठेकेदारी प्रथा का दौर हर जख्म को कुरेदता है, लिहाजा हर पुल, सड़क, इमारत या अन्य परियोजनाओं के दर्शन में कहीं सियासी हिसाब स्पष्ट है। रेत-बजरी का धंधा हो या हर तरह की ठेकेदारी में मुनाफे का जिक्र हो, सभी जगह कोई न कोई गुर्गा जीत रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कई बार हिमाचल में ठेकेदारी के जरिए वर्षों से पनप रहे माफिया का उल्लेख किया है, तो प्रदेश की विकासात्मक तस्वीर की कंदराओं में ऐसा तंत्र मौजूद है। विकास की हर लड़ी में अगर भ्रष्टाचार की कड़ी पनपने लगे, तो गिरते पुलों के अस्थिपंजर में प्रदेश का चरित्र ढूंढना पड़ेगा और यह बड़ी इकाइयों के ध्वस्त होने का प्रमाण नहीं, बल्कि हर ईंट पर मुलम्मा चढ़ा है। यह गांव में घूमती मनरेगा जैसी योजनाओं में धन के इस्तेमाल से शुरू होता है और फिर विकास के हर पहलू से खुराक मांगने लगता है। जलापूर्ति की कितनी परियोजनाएं बार-बार अपनी मिट्टी पलीद करती हैं या सड़कें अपनी मंजिल भूल जाती हैं। जनजातीय इलाकों में बर्फबारी की तहों के नीचे कितने धन की बर्बादी हर साल होती है या बरसात का आलम सार्वजनिक निर्माण को किस अदा से बहा कर ले जाता है, कभी मंथन नहीं होता। ऐसे में पब्बर नदी पर बन रहे पुल ने अपने मलबे में पुनः वही आशंकाएं समेट ली हैं, जो कमोबेश हर सार्वजनिक निर्माण स्थल पर मंडराने लगी हैं।