Saturday, September 21, 2019 05:00 PM

आश्चर्य किस बात का

हिमाचल में हम जिसे साधारण या रूटीन समझकर नजरअंदाज कर रहे हैं, वह अंततः हमारे मिजाज का दब्बूपन ही साबित करेगा। बेशक बड़ी राय रखने वाला एक बहुत बड़ा प्रबुद्ध वर्ग प्रदेश में है, लेकिन अपने-अपने दायरे के सुख-दुख में बंध हमारे हाथ अब इस काबिल नहीं कि राज्य की राय बना सकें। विधानसभा की चर्चा में पक्ष-विपक्ष के बीच आम नागरिक के बोध की कहानी निरुत्तर है, तो सदमे-शिकायतें भी आश्चर्यचकित नहीं करती। दरअसल अब आम हिमाचली ने आश्चर्य और खेद प्रकट करना छोड़ दिया या जिंदगी के भीतर खुदगर्जी के तराने एकत्रित कर लिए हैं। क्या हिमाचल की जागरूकता, प्रतिबद्धता, परिकल्पना, बौद्धिक विकास और जीवटता अपने मौलिक रूप में सदन में कभी प्रकट हुई या शर्तिया तौर पर कोई यह कहने की हिमाकत कर सकता है कि उसके क्षेत्र का विधायक सारे हिमाचल का प्रतिनिधित्व कर सकता है। फिर भी हमें यह आश्चर्य नहीं कि हिमाचल के तमाम विधायक बिना किसी सार्वजनिक संतुष्टि या वांछित सेवा के अपने भत्ते बढ़ा रहे हैं। यह गणित भले ही किसी जनप्रतिनिधि के प्रदर्शन या मूल्यांकन पर खरा न उतरे, लेकिन सत्य यही है कि निरंतर कर्ज में डूबे हिमाचल के विधायक अपने वेतन-भत्तों को चमका रहे हैं। इसी बीच खबरों के आंचल में रो रहा हिमाचली चरित्र कितना बौना हो गया कि सरकारी पगार पर भ्रष्टाचार का इश्तिहार चस्पां है। धर्मशाला नगर निगम का जेई खुद को अपने कार्यालय के बाहर बेच रहा था, ताकि ईमानदारी से काम न होने की व्यवस्था और प्रथा चलती रहे। सरकारी नौकरी में ऐसे कितने पद और शृंखलाएं हैं, जहां पर हर डाल पर रिश्वत बैठी है। हर कुर्सी डराती है, फिर भी हमारी अंतररात्मा कुछ नहीं बोलती। बेशक जेई पकड़ा गया और इसी तरह कुछ दिन पहले एक डीएसपी पकड़ा गया, लेकिन क्यों नहीं हम इतने सशक्त हैं कि भ्रष्टाचार की नौबत आने से पहले संघर्ष करें। भ्रष्टाचार के खिलाफ सामूहिक जिम्मेदारी का एहसास अगर सतर्कता में बदल जाए या नागरिक समाज दीवार बना दे ताकि भरपेट सरकारी कर्मचारी दूसरे का पेट न काट सकें, तो वास्तव में परिवर्तन आएगा। ऐसे मुद्दों पर विधानसभा सत्र के दौरान कौन क्या बोलता है इससे फर्क नहीं पड़ता, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने का प्रमाण बाहर नहीं आता। आश्चर्य तो यह कि हमारे जनप्रतिनिधि ऐसे मामलों पर आश्चर्य करना भूल गए। आश्चर्य तो यह कि अब विधानसभा को आश्चर्य नहीं होता कि हिमाचल किधर जा रहा है। क्या हमने ऐसे हिमाचल की खोज में ऐसे विधायक खोजे जो यथार्थ में रहते हुए मुकाम बदल दें। जो पांच साल नहीं, भविष्य के इंतजाम बदल दें। ऐसा क्यों हुआ कि मानसून सत्र के दौरान सत्तारूढ़ दल के दो विधायक अपनी ही सरकार को कोसते रहे। ज्वालामुखी के विधायक रमेश धवाला को या तो स्वास्थ्य मंत्री ने सुना नहीं या वह बिना सुने भी जो सुनाना चाहते थे, सबने सुन लिया। दिक्कत भी यही है कि जो जनता सुनाना चाहती है, सरकारी पक्ष सुनना नहीं चाहता और जो विपक्ष सुनाता रहता है, जनता का पक्ष नहीं रहता। हैरत दोनों पक्षों से इसलिए भी है क्योंकि जब वेतन-भत्ते बढ़ाने होते हैं तो न सत्ता और न ही विपक्ष का विधायक अलग-अलग दिखाई देता है। जनता मजबूर नहीं, मजबूर बने रहने की गुंजाइश बन गई है। केवल निजी फरमाइश बन गई है, इसलिए जब कभी विधानसभा का सत्र होता है, तो केवल पर्ची पर स्थानांतरण की ख्वाहिश का जिक्र होता है। इसी सत्र का सबसे अहम चित्रण देखें कि किस तरह नूरपुर के विधायक राकेश पठानिया ने अपने ही मंत्री से उस हार्टिकल्चर मिशन के बारे में पूछा जहां बिना किसी तर्क और संतुलन के ग्यारह सौ करोड़ की राशि से कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर तथा बिलासपुर को वंचित कर दिया। इस पर हैरानी होगी या हम यह मान चुके हैं कि सरकारों में मंत्री केवल अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों के लिए भविष्य में काम करेंगे।