Monday, April 06, 2020 06:24 PM

इंटरनेट और मोबाइल युग में बाल साहित्य की स्थिति

बाल साहित्य लेखन परंपरा में हिमाचल का योगदान-5

अतिथि संपादक: पवन चौहान

बाल साहित्य की लेखन परंपरा में हिमाचल का योगदान क्या है, इसी प्रश्न का जवाब टटोलने की कोशिश हम प्रतिबिंब की इस नई सीरीज में करेंगे। हिमाचली बाल साहित्य का इतिहास उसकी समीक्षा के साथ पेश करने की कोशिश हमने की है। पेश है इस विषय पर सीरीज की पांचवीं किस्त...

विमर्श के बिंदु

* हिमाचली लेखकों का बाल साहित्य में रुझान और योगदान

* स्कूली पाठ्यक्रम में बाल साहित्य

* बाल चरित्र निर्माण में लेखन की अवधारणा

* इंटरनेट-मोबाइल युग में बाल साहित्य

* वीडियो गेम्स या मां की व्यस्तता में कहां गुम हो गई लोरी ?

* प्रकाशन की दिक्कतों तथा मीडिया संदर्भों से जूझता बाल साहित्य

* मूल्यपरक शिक्षा और बाल साहित्य

* बाल साहित्य और बाल साहित्यकार की अनदेखी, जिम्मेदार कौन?

* हिमाचल में बाल पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

* हिमाचली बाल साहित्य में लोक चेतना

* वर्तमान संदर्भ में बच्चों तक बाल साहित्य की पहुंच

कंचन शर्मा

मो.-9418058158

तीव्रता से विकसित हुए तकनीकी साधनों से बाजारोन्मुख, एकाकी व आभासी हुए विश्व और क्षीण होती जा रही बौद्धिक तेजस्विता के साथ भला बाल साहित्य कैसे अछूता रह जाता! पिछले 20 वर्षों में इंटरनेट में आई अंधाधुंध क्रांति ने हमारे समय के बच्चों, यहां तक कि युवाओं के पठन-पाठन, जीने के जो तौर-तरीके हैं वो आजकल के बच्चों को बाबा आदम के जमाने की बात लगती है और हम घिसियाये से उनसे अपने ईमेल, टाइपिंग, फोटो शॉपिंग, फेसबुक के मसले, आनलाइन क्रियाकलाप के लिए बच्चों के आगे याचकों की भांति अनुनय-विनय करते फिरते हैं या फिर साल दो साल के बच्चों की मोबाइल या लेपटॉप पर संलिप्तता के बखान दोस्तों-रिश्तेदारों में बढ़-चढ़कर कर सुनाते हैं। ऐसे में बाल साहित्य की सुध कौन ले। न्यूक्लियर परिवारों ने नाना-नानी, दादा-दादी पहले ही बच्चों से दूर कर दिए हैं। ऐसे में बच्चों को कहानी सुनाए कौन! जबकि बड़े बुजुर्गों की सुनाई कथा-कहानियां बच्चों को उनकी संस्कृति व संस्कार से जोड़ती थी। भाषा व स्थानीय बोलियों को समृद्ध करती थी। साहित्य का बाल मन से संस्कार मां की लोरी से ही स्थापित हो जाता था, मगर अब मां की गोद में बालक तो है, मगर हाथ में मोबाइल। ऐसे में लोरी रूपी प्रारंभिक साहित्य से भी बालमन अछूता होता जा रहा है। स्कूल मार्क्स  उपलब्ध करने के कारखाने बन चुके हैं। हम तो यह कहकर भी इतिश्री कर लेते हैं कि बच्चों का साहित्य से क्या लेना-देना, गोया कि बच्चों के लिए वयस्कों द्वारा लिखा गया साहित्य ही बाल साहित्य है। जबकि बच्चों की छोटी-छोटी जिज्ञासाओं में भी अतुल बाल साहित्य का पिटारा है। वयस्क भी उन्हीं के मासूम सवालों, उनकी मासूमियत, उनकी नटखट शरारतों से बाल साहित्य का एक बहुत बड़ा हिस्सा रच देते हैं। देखने वाली बात यह है कि क्या हम उन्हें बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित भी करते हैं? क्या उनमें लिखने की ललक जगा पाते हैं? आज के परिप्रेक्ष्य में तो न के ही बराबर है। कान्वेंट स्कूलों के चलन ने पहले ही बच्चों को निज भाषा से दूर कर दिया है। ऐसे में हिंदी में लिखे साहित्य से बच्चे बरबस ही दूर हो चुके हैं। बाल प्रतिभाएं केवल लैपटॉप व मोबाइल गेम्ज में परिवर्तित हो चुकी हैं। ये भी सच है कि टैक्नोलॉजी, टिक-टॉक, गूगल, इंस्ट्राग्राम, फेसबुक, यू ट्यूब के दौर में बच्चों को कौआ, मोर, शेर, खरगोश की कहानी सुनाकर नहीं बहलाया जा सकता। बदलते परिवेश ने उनके टेस्ट भी बदल दिए हैं। हमें बाल साहित्य को एक नए रोचक तरीके से लिखना होगा। यही नहीं, उन्हें भी उनकी रुचि की रचनाओं को रचने के लिए प्रेरित करना होगा। बच्चे लैपटॉप व मोबाइल पर ज्यादा व्यस्त रहते हैं तो उन्हें ई-बुक्स पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उसके लिए जरूरी है कि उन्हें बाल साहित्य ऑनलाइन पढ़ने को मिले और यह भी कटु सत्य है कि अभिभावक वर्ग भी स्वयं फेसबुक, व्हाट्सऐप के इंद्रजाल में बसा हुआ है। पर मेरा मानना है कि यह एक ट्रांजीशन फेस है। जल्द ही हमें टैक्नोलॉजी के गंभीर परिणाम जब देखने को मिलेंगे तो हमें वहां से लौट कर अपनी दुनिया में फिर से आना होगा। एजुकेशन सिस्टम को थोड़ा सुधार दिया जाए तो बाल साहित्य से बच्चों को जोड़ना बहुत आसान होगा। भाषा के विषय में कठिन शब्दावली व गूढ़ यथार्थवादी लंबी कविताएं बच्चों को अनजाने में कविता के जटिल होने से ही डरा देती हैं और बच्चा कविता से दूर हो जाता है। जबकि कविता बच्चों को रोमांचित करने वाली, आसान शब्दावली, उनके आयु वर्ग की समझ के हिसाब से हो तो वे स्वतः ही कविता से जुड़ जाएंगे। उपदेशात्मक कहानियों की जगह वैज्ञानिक सोच, हंसी-ठिठोली और उनके स्वभाव से मिलती-जुलती कहानियां बच्चों को बाल साहित्य से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। बच्चों को फेसबुक पर लिखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उन्हें इसी टैक्नोलॉजी, इसी रफ्तार, इसी एकाकी परिवार के माहौल में साहित्य से जोड़ना होगा। हम जिस प्राकृतिक  सूर्य तरंगित वायु में उत्पन्न हुए हैं, लेकिन आज का शिशु सैकड़ों मनुष्य जनित तरंगों जिसमें सैटेलाइट्स, मोबाइल टावर की तरंगों के अलावा पैदा होते ही अपना अपनों की आवाज मोबाइल से सुनी हो या मोबाइल पर अपनों को देखा-सुना हो, उसके हाथ में बाल साहित्य की पुस्तक थमाना मुश्किल तो है, पर नामुमकिन नहीं। सुधार की पहल वयस्क की ओर से होनी है जिसका इंतजार है।