Tuesday, September 29, 2020 04:37 PM

इंटरनेट भी मौलिक अधिकार

सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार इंटरनेट को संविधान से जोड़ कर उसकी ऐतिहासिक व्याख्या की है। पहली बार अभिव्यक्ति की आजादी और बोलने, व्यापार करने के मद्देनजर इंटरनेट को संवैधानिक मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया है। यह फैसला देते हुए सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि अनिश्चितकाल के लिए इंटरनेट पर पाबंदी नहीं थोपी जा सकती। यह असंवैधानिक होगा, क्योंकि लोगों को सूचना और संवाद के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता। सूचना से ही पेशा और व्यवसाय जुड़े हैं और उसी से मानवीय आजादी भी साबित होती है। प्रेस एक पवित्र अधिकार वाला पेशा है, जो बुनियादी  तौर पर सूचना से ही संचालित होता है, लिहाजा ‘वैश्विक कुटुम्ब’ की धारणा वाले दौर में इंटरनेट की उपयोगिता बेहद महत्त्वपूर्ण है। बेशक जम्मू-कश्मीर में करीब 160 दिनों से इंटरनेटबंदी के पीछे राजनीतिक मंसूबों पर शीर्ष अदालत ने कोई सवाल नहीं उठाया, लेकिन अपनी बुनियादी चिंता स्पष्ट की कि न्यायिक पीठ स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन की पक्षधर है। सुप्रीम अदालत का यह फैसला बेशक जम्मू एवं कश्मीर के संदर्भ में दिया गया है, क्योंकि वहां अनुच्छेद 370 और 35-ए समाप्त करने की तारीख 5 अगस्त या उससे पहले से इंटरनेट पर पाबंदी जारी है, लेकिन इस फैसले का प्रभाव राष्ट्रीय होगा। अब इंटरनेट बंद करने के आदेश दिए जाएंगे, तो सरकार/प्रशासन को उसके कारणों का प्रकाशन करना होगा और उसे सार्वजनिक करना होगा, ताकि उन्हें अदालत में चुनौती दी जा सके। इंटरनेट के साथ-साथ धारा 144 को भी न्यायिक समीक्षा के वर्ग में रखने का फैसला शीर्ष अदालत ने सुनाया है। इसके जरिए न केवल इंटरनेट के मोल और महत्त्व को स्थापित करने की कोशिश की गई है, बल्कि इंटरनेट को मानव-जीवन की धुरी तक करार दिया गया है। यह इसलिए भी जरूरी लगता है, क्योंकि दुनिया में 12 फीसदी से ज्यादा इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले भारत में ही हैं और म्यांमार, चाड देशों के बाद सबसे लंबी इंटरनेटबंदी हमारे देश में ही की गई है। जाहिर है कि सर्वोच्च अदालत ने चेताया है कि इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है, जो निजी स्वार्थों और आशंकाओं का शिकार नहीं होना चाहिए। दरअसल अभिव्यक्ति की आजादी हमें संविधान के अनुच्छेद 19 से हासिल है और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन जीने का मौलिक अधिकार दिया गया है। मौजूदा दौर में इंटरनेट ही ऐसा जरिया है, जो एक औसत आदमी को पल भर में ही अंतरराष्ट्रीय बना सकता है। तो उस पर सिर्फ  इन आशंकाओं के तहत ही बंदी नहीं थोपी जानी चाहिए कि सीमा पार आतंकी या कश्मीर में उनके छिपे गिरोह अथवा अलगाववादी संगठन और नेता इसका दुरुपयोग कर व्यवस्था और माहौल को बिगाड़ सकते हैं। उसके लिए भी संविधान में प्रावधान हैं। अनुच्छेद 19(2) के तहत पाबंदी लगाई जा सकती है, जब भारत की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा पर कोई आंच आ रही हो, पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बिगड़ने की नौबत आ जाए और हालात विस्फोटक होने लगें, राज्य में जन-व्यवस्था कायम करनी हो और सामाजिक मर्यादा और नैतिकता की रक्षा करनी हो, तो इंटरनेटबंदी की जा सकती है, लेकिन अब के बाद उन कारणों का सार्वजनिक खुलासा करना होगा। अब धारा 144 का इस्तेमाल भी मनमाफिक और बेलगाम नहीं किया जा सकेगा। इस कारण राज्य एक जेलखाना बनकर रह जाता है, कर्फ्यू के हालात बन जाते हैं। सब कुछ बंद...सिर्फ  सुनसान सड़कें और सेना, सुरक्षा बलों के जवान ही दिखाई देते हैं। हालांकि आज कश्मीर बंदी वाले हालात से उबर चुका है। अस्पताल, सरकारी दफ्तरों और कुछ हद तक सार्वजनिक तौर पर ब्रॉडबैंड सेवाएं बहाल कर दी गई हैं। मोबाइल पर एसएमएस सेवा भी बहाल की गई थी, लेकिन तोड़फोड़ की कुछ घटनाओं के बाद उसे बंद करना पड़ा। अदालत के निर्देश के बाद सात दिनों में ही सरकार और प्रशासन को इंटरनेटबंदी आदि की समीक्षा करनी होगी। वे शीर्ष अदालत के फैसले को नकार और नजरअंदाज नहीं कर सकते, लेकिन अब सार्वजनिक तौर पर बताना होगा कि कमोबेश स्थानीय प्रशासन का क्या जवाब है। यह न्यायिक फैसला तब सामने आया है, जब 15 देशों के राजनयिक कश्मीर प्रवास पर थे और वहां की परिस्थितियों का आकलन करने गए थे। हालांकि इस ऐतिहासिक फैसले पर कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है।