Monday, April 06, 2020 05:33 PM

इंदु गोस्वामी का नया आगाज

भाजपा हलकों में अपनी संभावनाएं तराशती रहीं इंदु गोस्वामी के सियासी संघर्ष को अंततः मुकाम मिला। यह राजनीति का नया एहसास और समीकरणों का ऐसा बीजारोपण है,जो कांगड़ा की बेटी को खुला आसमान दिखा रहा है। करीब पैंतीस वर्ष इस महिला ने कई चक्रव्यूह तोड़े और अपने लिए ऐसी संभावना बरकरार रखीं, जिसके कारण राज्यसभा में यह चेहरा, कल की शिनाख्त में उज्ज्वल भविष्य तय कर रहा है। इंदु गोस्वामी की चुनावी परिपाटी में कई तरह की रुकावटें और साजिशें, राजनीति के इतिहास को चौकन्ना करती रही हैं। कभी टिकट का मिलना या कटना, तो कभी आधिकारिक उम्मीदवारी को सिफर करती भाजपाई जमात का भौंड़ा खेल जाहिर हुआ। खास तौर पर पालमपुर विधानसभा से इनकी उम्मीदवारी पर जो खेल हुए, उनके बाद यह नेत्री आम जनता की भी सहानुभूति बटोरती रही है। ऐसे में जबकि प्रस्तावित नामों की फेहरिस्त से कहीं ऊपर उठकर इंदु गोस्वामी के लिए राज्यसभा का दरवाजा खोला जा रहा है, तो यह केंद्रीय नेतृत्व का वरदान ही साबित होगा। इंदु की सियासत को अब भाजपा के प्रदेश व राष्ट्रीय समीकरणों में पढ़ना होगा और यह भी कि इस वकालत का पूरा फैसला अभी आना बाकी है। राजनीति का हिमाचली घटनाक्रम सदैव उतार-चढ़ाव का रहा है, खासतौर पर भाजपा के भीतर उनके लिए सरहदें बनती और टूटती रही हैं। आरोहण के सिलसिले शांता से धूमल और अब जयराम तक चलते देखे गए, लेकिन ऐसे कितने अन्य नेता होंगे, जो अपने लिए स्थान अर्जित कर पाए। सियासत के भीतरी घावों के उल्लेख में देखें, तो समर्थन व सामर्थ्य के विपरीत सितारों का गुम होना ही ऐसी बिसात है जिसे वक्त के पहिए हमेशा ढोते हैं। बहरहाल इंदु गोस्वामी ने अपने वक्त को विपरीत होने से बचा लिया और इस जमघट से अलग खड़ी हो गई, जहां राजनीतिक सड़ांध ने कई मुहावरे दफन किए हैं। यह आरोहण चुपके से नहीं हुआ और न ही इसकी दमक व चमक केवल एक पद की शक्ल में सियासत की रिक्ति को पूरा कर रही है, बल्कि इसमें प्रदेश स्तरीय आहट के साथ-साथ कांगड़ा की विरासत का ‘कमल’ खिला है। प्रदेश में राजनीतिक शंखनाद बदल रही भाजपा ने कुछ तो कसौटियां बदली हैं। पहले पार्टी अध्यक्ष का पद संवारते हुए संतुलन के धु्रव अगर डा. राजीव बिंदल को थमा दिए गए, तो अब चमत्कारिक रूप से राज्यसभा की सीट पर लगातार पीछे धकेली गई तेज तर्रार नेत्री को आजमाया जा रहा है। गौर करें कि बिंदल किन परिस्थितियों से निकल पार्टी अध्यक्ष पद पर विराजित हुए और ऐसे कौन थे, जो पालमपुर में भाजपा की हार के जिम्मेदार थे। जाहिर है पालमपुर में तब इंदु जीत गई होतीं, तो सत्ता के संतुलन में कांगड़ा की सिसकियां न सुनी जातीं। यहां तो तमाशे थे और तमाशबीन भी, वरना मंत्री पद छुड़वा कर क्यों किशन कपूर से उपचुनाव लड़ाया जाता। क्या विपिन सिंह परमार को विधानसभा अध्यक्ष बनाने के प्रयास में भाजपा की किसी लॉबी को सफल माना जाए या अब इंदु का सामने आना सबसे अहम मास्टर स्ट्रोक माना जाए, जो भी हो राजनीति अपने लिए कुछ नया अध्याय चुन रही है, तो कुछ पन्ने अब अतीत के सन्नाटे में गुम हो सकते हैं। जाहिर तौर पर कांगड़ा अपनी राजनीतिक क्षतिपूर्ति के नजरिए से इंदु के आने की रौनक देखेगा, तो पार्टी के आगामी कदमों की प्रतीक्षा करेगा। सरकार के बीच दो मंत्रियों का घाटा उठा रहा यह क्षेत्र केवल किसी ताज के लिए चेहरा नहीं देख रहा, बल्कि बेताज हुए अस्तित्व में खुद को चिन्हित करने की कसक लिए सामर्थ्य को खोज रहा है। कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य विप्लव ठाकुर की रिक्ति में इंदु गोस्वामी का आगाज कई आशाओं से भरा है। यह भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी का संदेश है कि सतह पर खड़े लोगों में भी आकाश देखा जा सकता है। आश्चर्य यह कि राजनीतिक परिदृश्य में लाभार्थियों की एक ऐसी जमात बन गई है, जो हर बार लड्डू खाना चाहती है। जो अन्य लोग राज्य सभा की उम्मीदवारी के लिए जुगाली कर रहे थे उनकी पृष्ठभूमि में राजनीतिक लाभ की एक किश्ती जरूर डूबी होगी। अभी और कितनी किश्तियां डूबेंगी इस समुद्र में, सियासी गाद कहीं गहरे तक समाई है।