Monday, June 01, 2020 01:46 AM

इतना अनिश्चित क्यों है?

यह अनिश्चितता का दौर है। कोरोना वायरस के कारण ही ऐसा माहौल नहीं है। दरअसल कोरोना को लेकर शोक और भय का परिवेश ज्यादा बुना जा रहा है, लिहाजा आम आदमी अनिश्चित है कि आने वाला कल कैसा होगा? क्या फैसले लिए जाएं? सोमवार को ही गाजियाबाद के रामलीला मैदान, मेरठ के रेलवे स्टेशन, दिल्ली में पटपड़गंज और रेलवे स्टेशन, दिल्ली-उप्र सीमा पर हजारों मजदूरों की जो भीड़ जमा थी, वह अनिश्चितता के कारण ही थी। यह निश्चित नहीं था कि घर-वापसी के लिए ट्रेन या बस में नंबर आएगा अथवा नहीं। उस भीड़ ने जितना संक्रमण करना था, वह कर चुकी, अब उसके नतीजे कुछ दिन बाद सामने आएंगे, तो चौंकिए मत...! ऐसे ही पसोपेश में आईआईएम, अहमदाबाद के पास मजदूरों ने ही आक्रोश में पथराव किया, लिहाजा पुलिस को भी पलट कर लाठीचार्ज करना पड़ा। इसका बुनियादी कारण कोरोना नहीं है। लॉकडाउन के कारण जो अनिश्चितता पसर गई है, उसी की प्रतिक्रिया में ऐसे दृश्य सामने आ रहे हैं। हालांकि कोरोना वायरस ने जो जानलेवा प्रहार अमरीका और यूरोपीय देशों पर किए हैं, उसके कुल शिकार 49 लाख के पार तक पहुंच गए हैं। उनकी तुलना में भारत की स्थिति बहुत बेहतर और सुरक्षित है। देश की 138 करोड़ आबादी में से अभी तक करीब 24 लाख लोगों  के टेस्ट हुए हैं, जिनमें 101139 लोग ही संक्रमित हैं। मौतों की संख्या भी 3100 पार हुई है। सुखद पक्ष यह है कि 39,000 से अधिक मरीज ठीक होकर अपने घरों को लौट भी चुके हैं, लेकिन विदेशों की जिंदगी खिलखिलाने लगी है। उनके कैफे, बार, रेस्तरां खुल गए हैं, जहां खूब रोशनियां हैं। लोग मानसिक सुकून के लिए समंदर किनारे या बीच पर जाकर आराम कर रहे हैं। हालांकि एशिया में ही जापान की इस साल पहली तिमाही में जीडीपी -3.4 फीसदी रही है। यकीनन आर्थिक महामंदी के हालात हैं, लेकिन उसके बावजूद जापान सरकार ने एक ट्रिलियन डॉलर का प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया है। अमरीका ने अपने नागरिकों को नकदी मदद दी है। कुछ देशों ने वेतन की गारंटी के तौर पर आर्थिक सहायता की है। चूंकि भारत में प्रधानमंत्री के 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज पर कई पक्षों ने सवाल उठाए हैं, लिहाजा हालात अनिश्चितता के बन रहे हैं। आम आदमी, किसान, मजदूर से लेकर कारोबारी और उद्योगपति तक अनिश्चित हैं कि उनके आर्थिक संकट का समाधान निकलेगा या नहीं! कुछ विशेषज्ञों के आकलन हैं कि पैकेज में करीब 80 फीसदी पक्ष लोन वाला है। यह दीगर है कि पैकेज में कर्ज की गारंटी सरकार ने देने की घोषणा की है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का आरोप है कि कुल पैकेज 1.86 लाख करोड़ रुपए का ही है, जो जीडीपी का करीब 0.91 फीसदी ही बनता है। इसे हम राजनीतिक दुराग्रह भी मान सकते हैं, लेकिन एक विदेशी आर्थिक विश्लेषण कंपनी का निष्कर्ष है कि दरअसल आर्थिक पैकेज का सरकार पर भार करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए का ही पड़ेगा, जो एक फीसदी से भी बहुत कम होगा, जबकि प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि जीडीपी का 10 फीसदी पैकेज दिया जा रहा है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए, क्योंकि अनिश्चितता गहराती जा रही है कि देश के नागरिक को कुछ हासिल होगा अथवा नहीं! इन सवालों के मद्देनजर ही बैंकों के प्रति अनिश्चितता बढ़ी है, नतीजतन भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नेशनल बैंक सरीखे राष्ट्रीय बैंकों के शेयर, करीब 52 सप्ताह में, इतनी बुरी तरह लुढ़के हैं। दरअसल यह भी अनिश्चित है कि पैकेज देश की अर्थव्यवस्था में जान फूंक पाएगा या नहीं! पैकेज में किसानों, उनकी विविध फसलों, क्रेडिट कार्ड आदि घोषणाएं ऐसी की गई हैं, जो बजट में पहले ही स्थान पा चुकी हैं। किसान देश के किसी भी राज्य या अंचल में ऊंची कीमत पर फसल बेच सकेगा, यह कानूनन प्रावधान बिहार सरकार ने 2006 में किया था, जिसका अनुसरण देश में किया जाता रहा है। बिहार के किसान महंगे दामों पर पंजाब और हरियाणा आकर अपनी फसलें बेचते रहे हैं। केंद्र के पैकेज में इसकी क्या उपयोगिता है? लॉकडाउन-4 के बावजूद सरकारों ने काफी कुछ खोल दिया है। सार्वजनिक परिवहन का एक हिस्सा भी चलने लगा है, लेकिन विशेषज्ञ मान रहे हैं कि जब तक राजकोषीय घाटा बढ़ा कर आम आदमी की जेब में नकदी नहीं डाली जाएगी, तब तक बाजार में मांग नहीं उठेगी, लिहाजा तब तक कारोबार का पुनरोत्थान भी नहीं होगा। बहरहाल प्रधानमंत्री को ही देशव्यापी अनिश्चितता भंग करने के लिए खुद ही एक प्रयास करना होगा। वायरस पहली बार इस देश में नहीं आया है, लेकिन करीब 70 दिनों तक देश तालाबंदी में जरूर रहेगा।