Thursday, November 14, 2019 03:29 PM

इन्वेस्टर मीट के बहाने-3

निवेश के राजनीतिक सिद्धांत से अलग व्यापारिक हिसाब-किताब है, लिहाजा निजी क्षेत्र को आमंत्रित करके हिमाचल सरकार प्रदेश के आचरण में परिवर्तन भी ला रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप राठौर पूर्व में हुए निवेश के मद्देनजर नसीहत देते हुए यह कह जाते हैं कि हिमाचली निवेशक को भी याद किया जाए। जाहिर है पहली बार ऐसी खिड़कियां खुल रही हैं, वरना प्रदेश अपने उजाले केवल सरकारी खर्च पर ही देखता रहा है। पूर्व कांग्रेस सरकार का जिक्र करें, तो परिवहन क्षेत्र में निजी निवेशकों के साथ हुआ सुलूक सभी को याद है और यह स्थिति आज भी पूरी तरह नहीं बदली। यहां राजनीतिक सिद्धांत और व्यापारिक उद्देश्य में अंतर करने की वजह है। हिमाचल में कुल 3243 सरकारी बसों के लिए 27 डिपो की जरूरत को देखें या निजी क्षेत्र की तीन हजार बसों की देखभाल की सराहना करें। सरकारी बसों के दामन में फंसी सियासी इच्छा इन्हें निरंतर कंगाल कर रही है। कमोबेश इसी तरह बोर्ड-निगम अपने घाटे की सियाही से निजी क्षेत्र का औचित्य बढ़ा रहे हैं। ऐसे में सरकारी क्षेत्र के प्रदर्शन की लकीर जहां छोटी हो रही है, उससे कहीं आगे निकल कर निजी क्षेत्र की तरफ राज्य बढ़ रहा है। जाहिर है प्रादेशिक महत्त्वाकांक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए धनराशि चाहिए और राज्यों के बढ़ते वित्तीय घाटे के कारण सरकारें केवल मुलाजिमों की तनख्वाहें और पेंशन बांटते-बांटते ही अपने बजट पर ऋण बोझ बढ़ा रही है, तो अतिरिक्त धनलाने के लिए निजी क्षेत्र को ही आजमाना पड़ेगा। यहां विपक्ष कभी यह स्वीकार नहीं करेगा कि प्रदेश सरकार अपने खर्चे कम करने के लिए किसी तरह की कतरब्यौंत करे। प्रदेश में अनावश्यक शिक्षण-चिकित्सा संस्थानों या कार्यालयों को कम करके सरकारें वित्तीय व्यवस्था सुधार सकती हैं, लेकिन क्या हिमाचल कांग्रेस ऐसी सलाह या सहमति जयराम सरकार को देगी। क्या कुलदीप राठौर दावे से यह कह सकते हैं कि प्रदेश सरकार प्राइवेट ट्रांसपोर्टर को अधिकतम रूट परमिट देकर एचआरटीसी का कर्ज बोझ कम करे। इसमें दो राय नहीं कि निजी क्षेत्र भी रोजगार पैदा कर रहा है, लेकिन इसे दोयम दृष्टि से देखने की मानसिकता नहीं बदली। लिहाजा बेरोजगार तपका अपने भविष्य की तलाशी में सरकारी क्षेत्र की बाट जोहता रहता है। सरकारी क्षेत्र को पूजते-पूजते हिमाचल ने एक तो बूते से अधिक ऋण बोझ उठा लिया, दूसरे निवेश के कई अवसर खो दिए। इन्वेस्टर इंडिया कार्यक्रम ऐसी संभावनाओं का दर्पण है, जहां राज्य अपनी विशेष रणनीति के तहत प्रगति और आर्थिकी की सहभागिता तलाश सकते हैं। बेशक हिमाचल को नजरिया बदलते हुए हर निजी निवेशक को सम्मान देना होगा। एक छोटे से दुकानदार का योगदान, प्रत्यक्ष व परोक्ष रोजगार से लेकर कर अदायगी तक है, लेकिन कारोबार को निवेश की सहूलियतें नहीं मिलीं। कांग्रेस के विरोध से राज्य की निवेश नीति पर सार्थक बहस शुरू हो सकती है और यह भी कि भारी निवेश के साथ-साथ लघु निवेशक की पहचान तथा उसका स्थान तय होना चाहिए। हालांकि बड़े उद्योगों की स्थापना से ही लघु इकाइयां पनपेंगी तथा रोजगार के सीधे अवसर मिलेंगे। इन्वेस्टर मीट तक पहुंच रही जयराम सरकार की कोशिश, अपनी इस पहल को काफी आगे ले जा सकती है। उदाहरण के लिए अगर हिमाचल में पर्यटन की दृष्टि से महामहिम इलाईलामा पर केंद्रित होकर ही सोचा होता, तो अंतरराष्ट्रीय जगत के सबसे बड़े ब्रांड की वजह से प्रदेश की क्षमता का स्तर, हाई एंड टूरिस्ट को आकर्षित करता। कालचक्र जैसे आयोजनों के लिए मकलोडगंज से मनाली के बीच पड़ाव विकसित किया जाता, तो पर्यटन के मायने हिमाचल का परिचय बदल देते। दरअसल हिमाचल को अपनी संभावनाओं का एक व्यापाक सर्वेक्षण कराते हुए यह तय करना होगा कि किस क्षेत्र में कहां और किस सीमा तक निजी निवेश करना होगा। विभिन्न सरकारें योजनाएं और खाके बनाती रहीं, लेकिन वर्षों का इंतजार केवल अनुमानित लागत ही बढ़ाता रहा। जरा गौर करें कि पिछले तीन दशक के चुनावी घोषणा पत्रों में जो कहा गया, उसे कोई एक पार्टी भी क्यों पूरा न कर पाई या जो सरकारी तौर पर कहा जाता है, उससे कितना भिन्न है निवेश का वास्तविक अर्थगणित। हमारा मानना है कि इन्वेस्टर मीट के रास्ते प्रदेश अपनी आंखें खोलकर कम से कम यह तो देख पाएगा कि आगे बढ़ने के वित्तीय इंतजाम होते क्या हैं?