Friday, September 20, 2019 01:04 AM

इन भत्तों में जनता

हिमाचल विधानसभा के मानसून सत्र की उपलब्धियों का वर्णन भले ही पक्ष-प्रतिपक्ष के बीच बहस के हासिल मजमूनों की तारीफ करे, लेकिन जहां जनप्रतिनिधियों की भीतरी दीवारें गिरी वहां लम्हे इसलिए पूजे गए क्यों लाभार्थ के फलक पर मतैक्य था। जनप्रतिनिधियों की कसौटियों तथा यात्रा भत्ता बढ़ाने की कवायद में ‘कबूल है-कबूल है’ के ऊंचे स्वर अब जन अदालत में प्ररिप्रेक्ष्य बदल रहे हैं। इन भत्तों में जनता को लाकर विधायक सुखविंदर सुक्खू ने मामले को इतना आगे बढ़ा दिया कि अब विरोध बनकर पोस्टर मुखातिब हैं या सोशल मीडिया में कठघरे खड़े हैं। जनता को भी विधायकों के विशेषाधिकारों की समस्या नहीं रही और न ही इनके लाभार्थी होने की कोई सीमा रही, लेकिन यहां वजह और विमर्श आम आदमी को तर्क सौंप रहा है। यह किसी सीए के हिसाब से कहीं गहरा प्रश्न बना कि साधारण परिस्थितियोें में असाधरण बढ़ोतरी का अर्थ क्या है। विधायक के भत्तों में जनता को क्या मिलता है या क्षेत्रीय अपेक्षाओं का किस तरह ऐसी सुविधाओं से मिलन होता है, इसकी गवाही नहीं मिलती। व्यवस्थागत खामियों में दरअसल जनप्रतिनिधियों का चरित्र और सियासी सोहबत जिस तरह पेश हो रही है, उससे समाज के भ्रम और अविश्वास बढ़ते हैं। सत्ता-बनाम विपक्ष के पालों में बैठी जनता आखिर किस पलड़े का मूल्यांकन करे, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में झुकना तो उसी को पड़ता है। कमोबेश यात्रा भत्ते की प्रासंगिकता में राजनीति चरित्र की ख्वाहिश अपना असर बटोर कर अगर किसी के तर्क को परास्त करेगी, तो वह आम आदमी की हैसियत ही होगी। यही हैसियत राजनीति के आगे सामाजिक व्यवस्था को अति कमजोर बना रही है। सामाजिक ढांचे का खोना ही राजनीति को पाना है, इसलिए जीवन की शर्तों में सियासी प्रभाव का अमृत्व पाने की होड़ लगी है। आश्चर्य यह कि सार्वजनिक व्यवहार की मर्यादा अब समाज के बजाय राजनीतिक आधार तय करता है। सशक्त जनप्रतिनिधि साबित होने के लिए एक हद तक सुक्खू के तर्क को भी समझना होगा, जहां जनापेक्षाएं भी तर्कहीन तथा अमर्यादित हैं। ऐसे में कम से कम हिमाचल के विधायक को वे सारे कार्य करने पड़ते हैं, जो व्यवस्थागत व कानून सम्मत तरीके से गैरराजनीतिक होने चाहिएं। क्या विधायकों को मिल रही सुविधाओं का ताल्लुक इतना गहरा है कि मुलाकात में चाय की चुस्की भी मोल तोल करने लगी, फिर तो मतदाता की हर सांस को अपना कर्ज उतारना है। आश्चर्य यह कि देश राजनीति का कर्ज उतार रहा है। सरकारों के हर गलत फैसले का ऋण चुका रहा है। सरकारी पगार के हकदार जनप्रतिनिधि होने चाहिएं, लेकिन इनके कर्त्तव्यों व जिम्मेदारी का मूल्यांकन भी तो तय परिपार्टी में हो। सरकारी कर्मचारी और जनप्रतिनिधि की तनख्वाह और फर्ज में अंतर क्यों है। सरकारी कर्मचारी को अगर पाला बदलना है, तो लाभ की सारी व्यवस्था छोड़नी पड़ती है, जबकि पार्टियां बदलकर भी जनप्रतिनिधियों की आत्मा, मर्यादा या आचार संहिता पर बोझ नहीं पड़ता। कर्मचारी अपने सेवा नियमों की गांठ से बंधे सेवक माने जाते हैं, तो क्या किसी विधायक के काम करने का तुलनात्मक अध्ययन यहीं साबित करता है। यहां राज्य के संसाधनों पर प्रथम अधिकार का सवाल भी पैदा होता है और यह साबित होता है कि हिमाचल की राजनीतिक जमात ही सबसे पहले और सबसे अधिक हासिल कर रही है। जिस शिखर पर विधानसभा के विधेयक ने वर्तमान या पूर्व विधायकों को पहुंचाया है, वहां से आम आदमी का ठिगनापन स्पष्ट है। विडंबना यह भी कि जिस प्रदेश में बेरोजगारों की आश्रित और पराजित फौज बढ़ रही है, वहां आर्थिक चौपाइयों में विधानसभा केवल विशेषाधिकार प्राप्त जनप्रतिनिधियों का ही राग अलापती है। इस विरोध को समझिए और आज के युग में जागरूकता के एहसास को अपने नजदीक देखें, तो कमोबेश हर विधायक को मालूम होगा कि जो राष्ट्रवाद हर गली को सरहद बना देता है, उसका विद्रोह अब अपने ही जनप्रतिनिधियों से पूछ रहा है। यह इसलिए भी क्योंकि अधिकांश विधायक जनता के सौ फीसदी तो क्या पचास प्रतिशत भी मत हासिल नहीं कर पाते हैं, तो ये शेखियां कैसे पूर्ण हो सकती हैं। सरकारी नौकरी का अनुबंध पाने के लिए हजारों फीसदी मेहनत व सफलता से जो रोजगार किसी युवा को वेतन विसंगितयों के बीहड़ में खड़ा करता है, उससे अलग पगार पाने का यह कैसा हक जो सरकारी खजाने के पास होने की कीमत से तय होने लगा है। यात्रा भत्ते की किस्तों से पहले अगर सरकारी संसाधन एचआरटीसी की हालत सुधार देते, तो शायद आम आदमी की यात्रा भी सुखद हो जाती।