ईमानदारी-एक जीवन शैली

सुनील वासुदेवा

शिमला

हमारे देश में लगातार भ्रष्टाचार के मामले बढ़ रहे हैं। इससे हिमाचल प्रदेश भी अछूता नहीं है। प्रदेश में विकास के साथ-साथ भ्रष्टतंत्र का भी विकास हुआ है। हाल ही में केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों पर लगाम लगाने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक कानून में कुछ संशोधन किए हैं, लेकिन सिर्फ कानून से यह समस्या सुलझने वाली नहीं है। भ्रष्टतंत्र होने के कारण विभिन्न योजनाओं के लिए आबंटित सरकारी पैसा आमजन तक नहीं पहुंच पाता है। केंद्र भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिए अब लोगों को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान शुरू कर रहा है। इस अभियान को केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा इस साल 28 अक्तूबर से दो नवंबर तक आयोजित किया गया है। प्रदेश में भी भ्रष्टाचार बढ़ने के मुख्य कारण है कि लोग जल्दबाजी में अमीर होना चाहते हैं। एक-दूसरे से अमीर होने की यह होड़ ऐसी लगी है कि इसके लिए गैर-कानूनी तरीके अपनाना भी आम हो चुका है। कुछ सरकारी कर्मचारियों को भ्रष्टाचार की लत लगाने में विशेष तौर पर प्रदेश में ऐसा माना जाता है कि ठेकेदारों व समाज के अन्य वर्गों, नौकरशाहों, नेताओं व उद्योगपतियों का हाथ है। यह अनैतिक गठजोड़ भी एक अहम भूमिका निभाता है। कई ऐसे विभाग हैं जहां कमीशन के तौर पर रिश्वत एक अधिकार के तौर पर बांटी और ली जाती है, हालांकि रिश्वत लेना और देना दोनों जुर्म हैं। परंतु हाल ही में भ्रष्टाचारी कर्मियों के हो रहे खुलासे सराहनीय हैं। भ्रष्ट नौकरशाह व कर्मचारी प्रशासन के निशाने पर हैं। हिमाचल सरकार को भी भ्रष्टाचार के मामलों पर लगाम लगाने के लिए कड़ा रुख अपनाना चाहिए। भ्रष्टाचार के मामलों में गंभीरता के साथ बिना किसी भेदभाव के सख्त कार्रवाई की जाए। वास्तव में भ्रष्टाचार देश व प्रदेश के साथ एक धोखा है। लालच में अब व्यक्ति सामाजिक मूल्यों को ताक पर रख रहे हैं जो आने वाले समय में घातक सिद्ध होगा। सरकारी दफ्तरों में एक-दूसरे को बचाने के लिए भ्रष्टाचार के मामले दब जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में फैल रहे इस नासूर को रोकने के लिए जांच एजेंसियों को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि भ्रष्टाचार के इस दानव से मजबूती से लड़ा जा सके। भ्रष्टाचार के खिलाफ हरेक व्यक्ति को जागरूक होना होगा। ईमानदारी की जीवन शैली के प्रति जनता में प्रचार से विश्वास कायम किया जाए। राजनीतिक इच्छा शक्ति इस दिशा में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकती है, बशर्ते नेता और प्रशासन भी ईमान का सौदा करना छोड़ दें।