Monday, September 24, 2018 03:44 PM

ईश्वर भक्ति और जीवन

श्रीराम शर्मा

वेद ज्ञानी न थे प्रह्लाद ब्रह्मोपदेशक थे, नानक की बौद्धिक मंदता सर्व विदित है। सूर और तुलसी जब तक साधारण व्यक्ति के तरीकों से रहे तब तक उनमें कोई विशेषता नहीं रही, किंतु जैसे ही उनमें भक्ति रूपी ज्योति का अवतरण हुआ अविद्या रूपी आवरण का अपसरण हो गया और काव्य की, विचार की ऐसी अविरल धारा बही कि काव्याकाश में ‘सूर सूर और तुलसी चंद्रमा हो गए...

प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि वह सुख पूर्वक जीवन जिए। सब का प्रेम और स्नेह प्राप्त करे। शक्ति और समृद्धि के पथ पर आगे बढ़ने की इच्छा किसकी नहीं होती। सर्वज्ञता की अभिलाषा भी ऐसे ही सब को होती है। यह दूसरी बात है कि यह संपूर्ण सौभाग्य किसी को मिले या न मिले। मिले भी तो न्यूनाधिक मात्रा में, जिससे किसी को संतोष हो किसी को न हो। परमात्मा संपूर्ण ऐश्वर्य का अधिष्ठाता माना गया है। वह सर्वशक्तिमान है। वेद उसे सर्वज्ञ, सर्वव्यापी बताते हैं। यह उसके गुण हैं अथवा शक्तियां। सांसारिक जीवन में उन्नति और विकास के लिए भी इन्हीं तत्त्वों की आवश्यकता होती है। बुद्धिमान, शक्तिमान और ऐश्वर्यमान व्यक्ति बाजी मार ले जाते हैं। शेष अपने पिछड़ेपन और अभाव का रोना रोया करते हैं।

यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इन तीन तत्त्वों का विकास मनुष्य ईश्वर भक्ति से बड़ी सरलता से प्राप्त कर लेता है। कबीर निरक्षर थे किंतु ईश्वर उपासना से उनकी सूक्ष्म बुद्धि का विकास हुआ था। विचार और चिंतन के कारण उनमें वह शक्ति अभिभूत हुई थी, जो बड़े-बड़े विद्यालयों के छात्रों, शिक्षकों को भी नहीं नसीब होती। कबीर अक्षर लिखना नहीं जानते थे, किंतु वह पंडितों के भी पंडित हो गए। धु्रव वेद ज्ञानी न थे, प्रह्लाद ब्रह्मोपदेशक थे, नानक की बौद्धिक मंदता सर्व विदित है। सूर और तुलसी जब तक साधारण व्यक्ति के तरीकों से रहे तब तक उनमें कोई विशेषता नहीं रही, किंतु जैसे ही उनमें भक्ति रूपी ज्योति का अवतरण हुआ अविद्या रूपी आवरण का अपसरण हो गया और काव्य की, विचार की ऐसी अविरल धारा बही कि काव्याकाश में ‘सूर सूर और तुलसी चंद्रमा हो गए। जिन लोगों में ऐसी विलक्षणताएं पाई जाती हैं वह सब ईश्वर चिंतन का ही प्रभाव होती हैं चाहे वह ज्ञान और भक्ति पूर्व जन्मों की हो अथवा इस वर्तमान जीवन की। उपासना से चित्त शुचिता, मानसिक संतुलन भावनाओं में शक्ति और पंचकोषों में सौमनस्य प्राप्त होता है वह बौद्धिक क्षमताओं के प्रसार से अतिरिक्त है। यह सभी गुण बुद्धि और विवेक का परिमार्जन करते हैं। दूरदर्शन की प्रतिभा का विकास करते हैं।

प्रारंभ में वह केवल किसी वातावरण में घटित होने वाली स्थूल परिस्थितियों का ही अनुमान कर पाते हैं किंतु जब भक्ति प्रगाढ़ होने लगती है, तो उनकी बुद्धि भी इतनी सूक्ष्म और जाग्रत हो जाती है कि घटनाओं के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंग उन्हें ऐसे विदित हो जाते हैं जैसे कोई व्यक्ति कानों में सब कुछ चुपचाप बता गया हो । ईश्वर भक्ति की प्रगाढ़ अवस्था भ्रमर और कीट जैसी होती है। भ्रमर कहीं से कीट को पकड़ लाता है फिर उसके सामने विचित्र गुंजार करता है। कीट उसमें मुग्ध होकर आकार परिवर्तन करने लगता है और स्वयं ही भ्रमर बन जाता है। ईश्वर उपासना में भी वह अचिन्त्य शक्ति है, जो उपासक को उपास्य देवता से तदाकार करा देती है। गीता के 11 वें अध्याय श्लोक 54 में भगवान कृष्ण ने स्वयं इस बात की पुष्टि करते हुए लिखा है ‘अनन्य भक्ति से ही मुझे लोग प्रत्यक्ष देखते हैं। भक्ति से ही मैं बुद्धि प्रवेश करने योग्य बनता हूं। ईश्वर मुखी आत्माओं में जहां सूक्ष्म बुद्धि का विकास होता है और वे सांसारिक परिस्थितियों को साफ-साफ देखने लगते हैं वहां उनमें सर्वात्म भाव भी जाग्रत होता है।