Tuesday, June 02, 2020 10:57 AM

उद्योग-कमजोर तबके को राहत

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार के सबसे बड़े स्रोत मनरेगा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। निःसंदेह कोविड-19 के बीच कृषि सुधारों का एक अवसर छिपा हुआ दिखाई दे रहा है, वह नए व्यापक आर्थिक पैकेज से तराशा जा सकेगा। निश्चित रूप से नए राहत पैकेज के संबल से कोविड-19 के बाद भी ये कृषि सुधार आगे बढ़ते हुए दिखाई देंगे। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस समय जब एक ओर कोविड-19 के कारण भारत में तेजी से गरीबी और बेरोजगारी बढ़ने की वैश्विक रिपोर्टें आ रही हैं, तब सरकार ने कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बीच गरीब वर्ग के लिए जो उपयुक्त राहतें दी हैं, वे  राहतें 38 करोड़ जनधन खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) की मजबूत संरचना के माध्यम से गरीबों की मुठ्ठियों में पहुंच जाने से गरीबी की चुनौती बहुत कुछ नियंत्रण में है...

यकीनन कोविड-19 के महासंकट के बीच भारत को आत्मनिर्भर बनाने के अभियान के तहत हाल ही में वित्तमंत्री सीतारमण के द्वारा घोषित नए आर्थिक पैकेज में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) के लिए जहां तीन लाख 70 हजार करोड़ रुपए के अभूतपूर्व राहतकारी प्रावधान घोषित किए गए हैं, वहीं गरीबों, श्रमिकों, किसानों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों को भारी मुश्किलों से बचाने के लिए 3.16 लाख करोड़ रुपए की राहतों की घोषणा की गई है। गौरतलब है कि देश के कोने-कोने में ढहते हुए एमएसएमई को बचाने के लिए सरकार के द्वारा 13 मई को घोषित पहले आर्थिक पैकेज में सबसे अधिक राहतों की घोषणा की गई है। नए आर्थिक पैकेज में एमएसएमई क्षेत्र के लिए कुल तीन लाख 70 हजार करोड़ रुपए के प्रावधानों में से इस क्षेत्र की इकाइयों को तीन लाख करोड़ रुपए का गारंटी मुक्त कर्ज दिया जाना सबसे प्रमुख प्रावधान है। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि विभिन्न कारणों से एमएसएमई के कई कर्ज एनपीए हो गए थे। ऐसे में उनके पास नकदी जुटाने का कोई रास्ता नहीं बचा था। बैंक एमएसएमई को कर्ज नहीं दे रहे थे। अब नए पैकेज के तहत एनपीए हुए एमएसएमई को भी नया कर्ज प्राप्त हो सकेगा। निश्चित रूप से एमएसएमई के लिए घोषित राहत पैकेज देश के करीब 6.30 करोड़ एमएसएमई उद्यमियों को उनका कारोबार कई गुना तक बढ़ाने में मदद कर सकता है। इस पैकेज में जहां एक ओर एमएसएमई के लिए नई पूंजी की व्यवस्था की गई है, वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र में निवेश की सीमा भी चार गुना बढ़ा दी गई है। चूंकि एमएसएमई की ओर से करीब 12 करोड़ लोगों को रोजगार दिया जाता है, ऐसे में निश्चित रूप से नए पैकेज से इस क्षेत्र में रोजगार चुनौतियां बहुत कुछ कम की जा सकेंगी। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि नए आर्थिक पैकेज के तहत लोकल के लिए वोकल होने की जो संकल्पना की गई है, उससे स्थानीय एवं स्वदेशी उद्योगों को भारी प्रोत्साहन मिलेगा।

वोकल फॉर लोकल अभियान से मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को एक नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि नए आर्थिक पैकेज से देश के असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, प्रवासी श्रमिकों एवं ठेले लगाने वाले श्रमिकों की मुश्किलें कुछ कम हो सकेंगी। वस्तुतः इस क्षेत्र में कोविड-19 के कारण नौकरी और रोजगार बचाना बड़ी चुनौती बन गई है। खास तौर से देश के करीब 45 करोड़ के वर्क फोर्स में से 90 फीसदी श्रमिकों और कर्मचारियों की रोजगार मुश्किलें बढ़ गई हैं। प्रवासी श्रमिकों को फिर से बसाने की चुनौती है। दूसरे आर्थिक पैकेज के तहत राशन की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए आठ करोड़ प्रवासी मजदूरों के लिए 3500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जो नेशनल फूड सिक्योरिटी में नहीं आते या जिनको राज्यों का राशन कार्ड नहीं मिल पाता, उनके लिए यह प्रावधान किया गया है। प्रति व्यक्ति 5.5 किलो गेहूं या चावल मिलेंगे। साथ में प्रति फैमिली एक किलो चना अगले दो महीनों तक मिलेगा। इसको लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। कोरोना के दौरान प्रवासी मजदूरों के लिए शेल्टर होम की व्यवस्था की गई है। जो शहरी लोग बेघर हैं, उन्हें भी इसका फायदा मिलेगा। खास बात यह भी है कि जो प्रवासी मजदूर अपने राज्यों में लौटे हैं, उनके लिए भी नई योजनाएं हैं। जो मजदूर अपने घरों में लौटे हैं, वे अपने गांवों में ही मनरेगा के तहत अपना नाम वहीं रजिस्टर कर काम ले सकते हैं। मनरेगा के तहत मजदूरी 182 रुपए से बढ़ाकर 200 रुपए कर दी गई है। प्रवासी मजदूरों और शहरी गरीबों को सस्ते किराए पर मकान दिलवाने की योजना को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत शामिल किया जाएगा। यदि उद्योगपति अपनी जमीन पर ऐसे घर बनाते हैं तो उन्हें रियायत दी जाएगी। राज्य सरकारों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करेंगे। कोविड-19 के बीच आदिवासी इलाकों और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़े, इसके लिए भी विशेष फंड का प्रावधान किया गया है। नए पैकेज के तहत किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए 2.30 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया हैं। नाबार्ड के जरिए कर्ज देने के लिए 30 हजार करोड़ रुपए के अतिरिक्त फंड की व्यवस्था की गई है। इसका फायदा तीन करोड़ छोटे और सीमांत किसानों को मिलेगा। 33 राज्य सहकारी बैंकों, 351 जिला सहकारी बैंकों और 43 आरआरबी के जरिए कर्ज दिया जाएगा। नए पैकेज के तहत किसान क्रेडिट कार्ड के लिए अभियान चलेगा। मछुआरे और पशुपालक किसान भी इसमें शामिल किए जाएंगे। इसके जरिए 2.5 करोड़ किसानों को दो लाख करोड़ रुपए के रियायती ऋण की सुविधा दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि कोविड-19 में सरकार के प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जो सराहनीय सक्रियता दिखाई दे रही है, वह सक्रियता नए राहत पैकेज से और आगे बढ़ेगी।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार के सबसे बड़े स्रोत मनरेगा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। निःसंदेह कोविड-19 के बीच कृषि सुधारों का एक अवसर छिपा हुआ दिखाई दे रहा है, वह नए व्यापक आर्थिक पैकेज से तराशा जा सकेगा। निश्चित रूप से नए राहत पैकेज के संबल से कोविड-19 के बाद भी ये कृषि सुधार आगे बढ़ते हुए दिखाई देंगे। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस समय जब एक ओर कोविड-19 के कारण भारत में तेजी से गरीबी और बेरोजगारी बढ़ने की वैश्विक रिपोर्टें आ रही हैं, तब सरकार ने कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बीच गरीब वर्ग के लिए जो उपयुक्त राहतें दी हैं, वे  राहतें 38 करोड़ जनधन खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) की मजबूत संरचना के माध्यम से गरीबों की मुठ्ठियों में पहुंच जाने से गरीबी की चुनौती बहुत कुछ नियंत्रण में है। अब दूसरे पैकेज के बाद गरीब और वंचित वर्ग के लिए राहतों के और जो नए प्रयास हुए हैं, उनसे वास्तविक राहत गरीबों, किसानों और श्रमिकों तक पूरी तरह पहुंचने से गरीबी और बेरोजगारी वैसा भयावह रूप नहीं ले पाएगी, जिसके बारे में वैश्विक संगठनों की रिपोर्टों में लगातार कहा जा रहा है। हम उम्मीद करें कि 14 मई को सरकार ने कोविड-19 संकट का सामना कर रहे देश के गरीबों, किसानों और मजदूरों के लिए जो उपयुक्त राहत और विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं घोषित की हैं, उन्हें सरकार कारगर तरीके से लागू करेगी। हम उम्मीद करें कि सरकार के द्वारा आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घोषित किए गए दूसरे आर्थिक पैकेज से कोरोना संकट से निर्मित आर्थिक एवं सामाजिक चुनौतियों के चिंताजनक परिदृश्य को बहुत कुछ नियंत्रित किया जा सकेगा। निश्चित रूप से ऐसे में देश के गरीब, श्रमिक, किसान और कमजोर वर्ग के करोड़ों लोगों को कोविड-19 की गहरी निराशाओं से बचाया जा सकेगा और ये वर्ग भी आत्मनिर्भर भारत अभियान के सहयोगी बनते हुए दिखाई दे सकेंगे।