Monday, October 21, 2019 12:30 AM

उपचुनाव उवाच

मैं धर्मशाला हूं। अंगेजी हुकूमत और कांगड़ा के राजाओं के सुकून का अहम बिंदु। वीरभद्र सिंह ने मुझे बाकायदा दूसरी राजधानी बना दिया। मेरा नसीब देखो कि एक बार अंग्रेजों ने भी मुझे इसी तरह देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की कसरत शुरू कर दी थी, लेकिन हूं मैं वहीं का वहीं। मेरा नसीब चमकता है, लेकिन गले पड़े नेताओं ने मुझे बार-बार छला और मेरे हर चुनाव को लूट लिया। यह उपचुनाव न होता, अगर लोग किशन कपूर को सांसद न बनाते। मुझे तो पता नहीं चला कि इससे किशन कपूर खुश हैं- संतुष्ट हैं या उपचुनाव में भी उनका ही सिक्का चलेगा। सिक्का तो बेचारे सुधीर शर्मा का भी चला, मगर लोग बार-बार मेरे विकास का पतन चाहते हैं, सो लौट कर किशन कपूर को ले आते हैं। किशन कपूर अविवादित रहते हैं, इसलिए मंत्री बनकर भी मेरे लिए कोई विवाद पैदा नहीं करते। यहां तक कि मेरे साथ जुड़ने को आतुर रहे केंद्रीय विश्वविद्यालय को भी इन्होंने मेरी एक इंच न देने की कोशिश की और परियोजना ही मुंह छुपाती घूमती रही। बार-बार मुझे निर्वस्त्र होने से बचाते रहे, वरना चैतड़ू की साढ़े चार सौ कनाल या सराह की पैंतीस सौ कनाल पर नए शहरों का कब्जा हो जाता। इन्होंने एमिटी विश्वविद्यालय को घनियारा में नहीं आने दिया, वरना कितने लोगों को अवैध कब्जा छोड़ना पड़ता। यकीन मानों मेरा नाम इस शख्स ने कभी भी सराय से बड़ा न करके मुझे बचाया, वरना सोचो सुधीर ने तो मेरे दामन पर कभी नगर निगम, कभी स्मार्ट सिटी चिपका दिया। वास्तव में सुधीर जैसे लोग मुझे पसंद नहीं, क्योंकि मेरे हर अंग पर अपने विजन को चुभोते हैं। मुझे तो श्रीमती चंद्रेश कुमारी भी पसंद आई। स्वास्थ्य मंत्री रहते भी प्रस्तावित मेडिकल कालेज मुझसे दूर यानी टांडा भेज दिया। मोहतरमा की शालीनता देखिए, मेरा विकास करके कोई विवाद पैदा नहीं किया। आज की बात यहीं, क्योंकि मुझे इन्वेस्टर मीट के लिए भी तो तैयारी करनी है।

-कलम तोड़