Saturday, September 21, 2019 04:34 PM

उपचुनाव की धर्मशाला

उपचुनाव की धर्मशाला में राजनीतिक श्रम, साधना और संदेश एक साथ कसरत करते हुए दिखे, क्योंकि दीवारों से राजनीतिक फफूंद को हटाने की नौबत आने वाली है। हिमाचल के दो उपचुनाव अपनी पृष्ठभूमि में सरकार का अवलोकन और भविष्य की निगरानी में सही उम्मीदवार खोजने में मदद करेंगे। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने धर्मशाला से यह खोज शुरू करते हुए नए उम्मीदवार की छवि और छाया का इजहार किया है। नई छवि का इंतजार कमोबेश हर विधानसभा क्षेत्र इस ख्वाहिश से करता है ताकि वर्षों के ठहराव को हटाकर नए चिराग जलाए जाएं। दूसरी ओर राजनीति की अपनी रणनीति और समीकरणों का मिजाज कुछ इस तरह का है कि अच्छा विजन या इससे जुड़े माहौल में नेता पैदा नहीं होते। ऐसे में क्या धर्मशाला और पच्छाद के उपचुनावों में जिताऊ उम्मीदवार उपयोगी होंगे या जो क्षेत्र को नेतृत्व दे सकें। विडंबना यह है कि राजनीति खुद को अपने ढंग से परिभाषित करती है और जिन्हें मतदाता नेता मान लेता है, वे वर्षों के फलक को बर्बाद कर  देते हैं। बेशक धर्मशाला उपचुनाव के जरिए यह फैसला फिर होना है कि जनता किसे ढोना पसंद करती है। यह जातीय समीकरणों, वर्ग विशेष की महत्त्वाकांक्षा से पूरा होता है या राजनीति खुद को बुद्धिजीवी वर्ग के पास खड़ा करती है, जहां पहचान के लिए न जातिवाद न क्षेत्रवाद और न ही परिवार खड़ा होगा। हिमाचल की सत्ता को उपचुनावों के जरिए केवल दो सीटें चाहिए या सियासी चेहरों का शुद्धिकरण, यह उम्मीदवारों की घोषणा से साबित हो जाएगा। हकीकत यह है कि राजनीतिक जमीन पर कुछ नेताओं का कब्जा इस कद्र फैल जाता है कि उनसे पार्टियों के समीकरण और कार्यकर्ताओं का सियासी करियर भय खाता है। बहरहाल धर्मशाला उपचुनाव में एक साथ कई समीक्षाएं भी होंगी और सियासत पुनः विकास के विजन से मुकाबला करेगी। एक विकास का विजन उस समय देखा गया जब कांग्रेस के तत्कालीन विधायक सुधीर शर्मा ने विधानसभा क्षेत्र को अग्रिम पांत में लाकर खड़ा किया और अब भाजपा के आरोहण में दो साल का दोराहा मापा जाएगा। निश्चित रूप से वर्तमान सांसद किशन कपूर के बाजू में रहे धर्मशाला विधानसभा के दो सालों का जिक्र उपचुनाव जरूर करेगा। यह उपचुनाव धर्मशाला नगर निगम की परिक्रमा में उस हारते मंजर का जिक्र करेगा जहां आफत में सारा ढांचा और जर्जर सियासत से तौहीन हुआ मुकद्दर देखा जाता रहा है। देश की आरंभिक और शिमला से कहीं पहले घोषित स्मार्ट सिटी के आईने में टूटे वजूद की कहानी पूछी जाएगी, तो पूर्व सरकार की घोषणाओं के ताबूत से चुनाव का जिन्न जरूर निकलेगा। चुनाव या उपचुनाव कुछ कदम चलने का वादा हो सकता है, लेकिन यथार्थ शाश्वत है और बार-बार स्वीकार्य है। सत्ता की दूसरी सीट के रूप में पुरस्कृत धर्मशाला शहर हर बार मुख्यमंत्रियों की नब्ज टटोलता है, इसलिए वर्तमान मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के कंधों पर ही यह उपचुनाव सवार रहेगा। उपचुनाव की स्लेट पर भाजपा अपने भविष्य का नेता चुनती है या समीकरणों की खिचड़ी से एक दाना चुनती है, इस पर मुख्यमंत्री के एहसास का निर्णायक लम्हा इंतजार कर रहा है। भाजपा की जीत की हांडी में जो पक रहा है, उससे कहीं हटकर नए विजन से पोषित उम्मीदवार का इंतजार है। धर्मशाला विधानसभा क्षेत्र के लिए घोषणाओं की कमी नहीं, लेकिन पूर्व से चल रही परियोजनाओं को पूरा करने की इच्छा शक्ति चाहिए। भाजपा के उम्मीदवार के सामने कांग्रेस को चिन्हित करता सुधीर शर्मा का विजन, संघर्ष, विकास और भितरघात खड़ा है। अतीत में सुधीर को हराने वाले कांग्रेसी थे, लेकिन अब भाजपा की जीत में रोड़ा अटकाने वालों की कमी नहीं। यहां हर डाल पर भाजपा का उम्मीदवार है, तो सत्ता का सुख पाने को हर नेता उम्मीदवार है।