Monday, December 16, 2019 06:01 AM

उमर, महबूबा बेचैन क्यों?

जम्मू-कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ही खौफजदा हैं। उन्हें सबसे ज्यादा डर लग रहा है कि न जाने क्या होने वाला है। दोनों नेताओं के समर्थक, कार्यकर्ता और बगलगीर दहशत महसूस कर रहे हैं। पूरा जम्मू-कश्मीर भयभीत, तनावग्रस्त और खौफजदा नहीं है। अलबत्ता अमरनाथ यात्रा के भक्तलोग और पर्यटक हड़बड़ी में हैं। चिंतित भी होंगे, क्योंकि तीर्थयात्रा अधूरी रह गई है और यथाशीघ्र घरों को लौटना है। ब्रिटेन, जर्मनी, ऑस्टे्रलिया आदि छह देशों ने भी अपने नागरिकों को जम्मू-कश्मीर न जाने का ‘परामर्श’ जारी किया है। राज्य के स्कूल-कालेज और एनआईटी जैसे संस्थान एहतियातन बंद जरूर किए गए हैं। हमारे सैनिकों ने पाकिस्तान बैट (बॉर्डर एक्शन टीम) के आधा दर्जन घुसपैठियों को मार गिराया है और उनकी लाशें एलओसी पर ही छोड़ दी थीं, लिहाजा पुष्टि होती है कि सुरक्षा हालात बिगड़े हुए हैं। बैट पाकिस्तान का सबसे बर्बर और क्रूर सैन्य दस्ता है। बहरहाल गृह मंत्रालय और राज्यपाल प्रशासन की ‘सलाह’ से पूर्व करीब 10,000-15000 सैलानी कश्मीर में थे। वे ‘जन्नत’ की वादियों का आनंद ले रहे थे, डल लेक के नजारे खूबसूरत और हसीन लग रहे थे। शिकारे और बाउसबोट सैलानियों से लबालब थे। अमरनाथ तीर्थयात्रा भी जारी थी। यदि सेना और सुरक्षा बलों ने अमरनाथ यात्रा के रूट पर एम-24 अमरीकी स्नाइपर गन बरामद की, बारूदी सुरंगें देखीं, आईईडी कूकर बम और पाकिस्तान की हथियार फैक्टरी में बनाए गए कुछ उपकरण भी बरामद किए, तो क्या सरकार हाथ पर हाथ धरे, खामोश बैठी रहती? 1993 और उसके बाद अमरनाथ यात्रा पर कई बार आतंकी हमले किए गए। वर्ष 2000 के हमले में 32 लोग मारे गए और 60 घायल हुए थे। वह सबसे खतरनाक आतंकी हमला था। क्या उसकी पुनरावृत्ति का जोखिम लिया जा सकता था? अपने नागरिकों की हिफाजत करना सरकार की पहली, बुनियादी जिम्मेदारी है, लेकिन उमर, महबूबा सरीखे सियासतदानों की जमात का लगातार आग्रह है कि प्रधानमंत्री मोदी संसद के जरिए देश को बताएं कि आखिर कश्मीर में कौन-सा ‘तूफान’ आने वाला है? यह आग्रह तब हास्यास्पद लगता है, जब किसी बड़े आतंकी हमले के आसार और आशंका है। प्रधानमंत्री संसद के जरिए भी आतंकवाद विरोधी रणनीति का खुलासा कैसे कर सकते हैं? अनुच्छेद 35-ए और 370 भी संभव नहीं है, क्योंकि फिलहाल ये मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन हैं। एक और नई अफवाह जुड़ गई है कि राज्य को तीन हिस्सों में बांटने की सोच है। उसके मुताबिक जम्मू को पूरा राज्य बनाया जाना है, कश्मीर और लद्दाख संघशासित क्षेत्र होंगे, लेकिन राज्यपाल सत्यपाल मलिक किसी भी संवैधानिक बदलाव का खंडन कर चुके हैं। उमर और महबूबा को उनसे मुलाकात और आश्वासन के बाद भी तसल्ली नहीं है। बेशक  यह स्थिति सवालिया हो सकती है कि जम्मू-कश्मीर में फिलहाल करीब 78,000 जवानों की तैनाती क्यों है? सेना और राज्य पुलिस बल इससे अलग हैं। जब गृह मंत्रालय और राज्यपाल ने आश्वस्त कर दिया है कि सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर जवानों की तैनाती की गई है। चूंकि देश के स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त को राज्य की 6768 पंचायतों पर राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ फहराने का निर्णय मोदी सरकार ले चुकी है, तो उसके मद्देनजर पंचायतों, सरपंचों और पंचों की सुरक्षा भी अनिवार्य है। दरअसल उमर और महबूबा को खौफ तब होना चाहिए था, जब कश्मीर के ‘अलग प्रधानमंत्री’ का बयान दिया गया था, जब आतंकी बुरहान वानी को ‘हीरो’ करार दिया गया था, जब पत्थरबाजों को ‘अपने लड़के’ कहकर उनकी पैरवी की जाती रही थी, जब पाकिस्तान के ‘चूडि़यां नहीं पहनने’ की बात दोहराई जाती रही है, जब पाकिस्तान से हवाला का चंदा बटोरा जाता रहा। दोनों पूर्व मुख्यमंत्री इसलिए दहशत में हैं कि यदि  35-ए को खारिज कर दिया गया, तो उनकी सियासत भी समाप्त हो जाएगी। उनकी बपौती वाली ‘दुकानदारी’ भी बंद हो जाएगी। संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय के सामने जब भी यह मामला आएगा, तो न्यायिक पीठ इसे खारिज करने में वक्त नहीं लगाएगी, क्योंकि यह बुनियादी तौर पर ‘असंवैधानिक’ है। यह उमर और महबूबा का कोई विशेषाधिकार नहीं है।