Monday, November 18, 2019 04:08 AM

उम्मीदों की आहट

अपने वादों और इरादों की परीक्षा में जयराम सरकार अगर समीक्षा कर रही है, तो इन्वेस्टर मीट के आते-आते हिमाचल की प्रस्तुति में उम्मीदों की आहट जरूर सुनाई देगी। खुद को निवेश की नई राजधानी बनाने की फेहरिस्त में रास्ते और मंजिलें जयराम सरकार के डेढ़ साल के कारवां में करीब तेईस हजार करोड़ के एमओयू देख रही हैं, तो पहली बार यह स्पष्टता भी दिखाई दे रही है कि राज्य को जाना किधर है। पहले भी ‘मेक इन हिमाचल’ की कोशिश में विद्युत उत्पादन या फल विधायन के क्षेत्र में उपलब्धियों का ताज पहनकर हिमाचल चला, लेकिन निवेश की निरंतरता में राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय नहीं मिला। एक वक्त था जब प्रदेश भर के फल विधायन केंद्रों व खासतौर पर परवाणू के एचपीएमसी संयंत्र ने सारे देश को हिमाचल का जूस पिलाया, लेकिन आज पर्यटन सीजन में भी यह काबिलीयत काम नहीं आती। कुछ उत्पादनों को निजी क्षेत्र ने हिमाचल का ब्रांड बनाया, तो कुल्लू घाटी से निकले भुट्टिको और ऊना के बीडीएम का जिक्र सामने आता है। ऐसे कई गैर सरकारी संगठन-स्वयं सहायता समूह हैं, जिनकी बदौलत सिड्डू, सेपू बड़ी, दाल कचोरी या स्थानीय उत्पादों की गरिमा में हिमाचल की संभावनाएं सदैव पर्यटन से जुड़ती रहीं। इसी तरह तीर्थाटन की राह पर यह प्रदेश हमेशा संभावनाओं का गुलदस्ता लिए खड़ा रहा। स्वाभाविक निवेश की निगाहों से हिमाचल में पर्यटन के समर्थन या परोक्ष में निजी निवेश हुआ है। इसके अलावा शहरीकरण तथा परिवहन क्षेत्र में हो रही तरक्की में निवेश जाहिर है। ऐसे में रियल एस्टेट में निवेश अगर कुछ उपग्रह नगरों की मिलकीयत में दर्ज होता है, तो भविष्य के शहरों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। हिमाचल की अधोसंरचना में कनेक्टिविटी का सवाल सबसे ऊपर रहा है। अतः इन्वेस्टर मीट के जरिए इस दिशा में उपलब्धियों का खाका सशक्त करना पड़ेगा। राज्य को अपना स्टेट रोड प्लान बनाना होगा, ताकि कुछ अलग तरह की सड़कें मसलन पर्यटक मार्ग, माउंटेन रोड, डिफेंस हाई-वे व माल ढुलाई गलियारे जैसी परियोजनाओं में उच्च गुणवत्ता की सड़कें बनाई जा सकें। जाहिर तौर पर निवेश के जरिए हिमाचल में आधुनिक तकनीक तथा अनुसंधान का इस्तेमाल बढ़ेगा। शिमला, धर्मशाला या कुल्लू-मनाली जैसे शहरों में स्काई बस या वैकल्पिक परिवहन के आधुनिक साधनों के लिए सहयोगी निवेशकों की जरूरत है। हिमाचल की पर्वतीय, भौगोलिक स्थिति, जलवायु तथा प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए नए निवेश से प्रगतिशीलता का आईना बदला जा सकता है। एक तरह से हिमाचल को तीन वर्गों में निवेश की जरूरत है। मैदानी इलाकों में औद्योगिक उत्पादन की हर संभावना मजबूत होगी, मध्य हिमाचल में कला, कौशल, संस्कृति, शिक्षा-चिकित्सा तथा पर्यटन के कई द्वार खोले जा सकते हैं, तो ऊपरी इलाकों में पन विद्युत उत्पादन, साहसिक खेल, जड़ी-बूटियों से जुड़े उद्योग तथा ट्राइबल टूरिज्म की दिशा में नए उल्लेख दर्ज हो सकते हैं। हिमाचल में कर्नाटक की तर्ज पर सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को इनोवेशन एवं टेक्नोलॉजी सोसायटी का गठन करते हुए निवेश के लिए स्थायी तौर पर उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करना होगा। बहरहाल सरकार ने सिंगल विंडो की सरलता में निवेशक के सामने हिमाचल को पेश करने का प्रयत्न किया है, लेकिन इसके साथ यह भी तय होना चाहिए कि जो भी सामने आए, उसकी समाज और पर्यावरण के प्रति भी वचनबद्धता सलामत रहे। हिमाचल को वास्तव में आईटी, शिक्षा, पर्यटन व साहसिक खेलों का हब बनना है, तो अन्य क्षेत्रों में निवेश को इसी लहजे में प्रस्तुत करना होगा।