Thursday, December 12, 2019 03:31 PM

ऊर्जा का स्तर

श्रीश्री रवि शंकर

प्राचीन काल के स्वामी, साधु और लोग कहीं भी किसी भी किस्म की कलह सुनना पसंद नहीं करते थे। यदि उनके पास कोई भी आकर कोई भी शिकायत करता था, तो वे उनके कान पकड़ कर उनसे कहते थे कि तुम ही इससे निपटो। यदि आप समाधान का हिस्सा हो, तो आपकी ऊर्जा का स्तर उच्च होता है, परंतु यदि आप सिर्फ  समस्याओं की बात करते हैं, तो आप की ऊर्जा नीचे आ जाती है। दुनिया हर समय सकारात्मक और नकारात्मक बातों की क्रीड़ा होती है, कुछ समस्याएं और चुनौतियां आती रहती हैं और उनके साथ उनका हल भी आता है। प्राचीन लोग अपनी ऊर्जा के स्तर को उच्च रखने पर केंद्रित होते थे। यदि आपकी ऊर्जा का स्तर उच्च होता है, तो जब लोग आपके पास अपनी समस्याएं लेकर आते हैं, तो उनका समाधान हो जाता है। अकसर जब लोग आपसे अपनी समस्याओं के बारे मे बात करते हैं तो क्या होता है? आपका उनकी समस्याओं के प्रति झुकाव हो जाता है। वे अपनी समस्याओं के बारे बात करते हैं, तो क्या होता है। आप उनकी समस्याओं के साथ बह जाते हैं। इसलिए एक बार इसका प्रयत्न करें, एक दिन यदि लोग आपके पास आकर 100 शिकायत करें, आप सिर्फ  अपनी ऊर्जा को उच्च रखें और अपनी दृष्टि और मन को भीतर की ओर केंद्रित रखें जैसे कुछ भी नहीं हुआ है, तो फिर आप अचानक अपने भीतर मुक्ति महसूस करेंगे। आप इस प्रयत्न को करके देखें। घर पर आपकी सास, पति और हर कोई व्यक्ति किसी भी बात की शिकायत कर सकता है। पूरी दुनिया इधर से उधर हो जाए, परंतु आप सिर्फ  एक विचार को पकड़ कर रखें कि मैं अपनी ऊर्जा को उच्च रखूंगा। आप सिर्फ  यह एक कदम उठाएं और देखें कि समस्याएं और चुनौतियां सिर्फ  इसलिए आती हैं, जिससे कि आप अपने मन को भीतर की ओर केंद्रित करके रख सकें। मन को भीतर की ओर केंद्रित करने की  बजाय जब समस्याएं और चुनौतियां आती हैं, तो आप क्या करते हैं? आप समस्या का पीछा करते हैं और उसी दिशा में प्रवाहित हो जाते हैं और फिर आपकी ऊर्जा का स्तर नीचे आ जाता हैं और आपका पतन हो जाता है। क्या ऐसे ही होता है न? कई बार करुणा और सहानुभूति के नाम पर आप उसी ओर प्रवाहित हो जाते हैं। आपकी करुणा वास्तव में आपकी समस्या का समाधान करने में सहायक नहीं है। यह बहुत चौंकाने वाली बात है कि करुणा में समस्या बढ़ जाती है और उसका समाधान नहीं हो पाता है। जब भी कोई समस्या आती है तो वह व्यक्ति को भीतर के गहन की ओर केंद्रित करने के लिए होती है जिससे व्यक्ति वैराग्य और शांति की अवस्था में जा सके। इसके बजाय आप व्यक्ति को तर्क के द्वारा संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं। समस्या में व्यक्ति को संतुष्ट करना सबसे बुरी बात है। आपको उनको संतुष्ट नहीं करना चाहिए। हर किसी व्यक्ति को उनके कर्म और समस्या को सहन करना चाहिए। यदि आप दुखी या खुश हैं, तो वह भी आपका कर्म है। आप अपने कर्म को बदल दीजिए। यह मनोभाव व्यक्ति को और अधिक स्वतंत्र और मुक्त करता है। आप उनके प्रति करुणा दिखाते हैं और फिर उन्हें और ध्यान पाने की चाहत हो जाती है। आप और करुणामय हो जाते हैं और उन पर और अधिक ध्यान देते हैं और फिर न तो करुणा रह जाती है और न तो आप उन पर उतना ध्यान दे पाते हैं। फिर सिर्फ  परेशानी रह जाती है।