Wednesday, September 18, 2019 04:44 PM

ऋषि अत्रि

हमारे ऋषि-मुनि, भागः 4

अत्रि ऋषि भी प्रजापति पद पर,ब्रह्माजी के मानस पुत्र के रूप में दक्षिण दिशा में वास करते हैं। इनका विवाह ‘अनसूया’ से हुआ। अनसूया के पिता प्रजापति कर्दम, माता देवहूति, भ्राता कपिल ऋषि थे। पति-पत्नी(अत्रि व अनसूया) दोनों भक्ति पद को प्राप्त थे।  पति अति त्रिगुणातीत थे, तो पत्नी अनसूया असूयारहित। ब्रह्माजी ने इस पती-पत्नी को सृष्टि वृद्धि का आदेश दिया। इन्होंने सृष्टि करने से पूर्व ऐसा घोर तप किया, जिसका उदाहरण नहीं। वे अपने इस कार्य को करने से पूर्व भगवान के साक्षात दर्शन करना चाहते थे। तपस्या सफल हुई। तीनों देवों ने दर्शन देने का निर्णय किया। दोनों तपश्चर्या में लीन थे। ब्रह्मा, विष्णु, महेश सामने खड़े थे। मगर पति-पत्नी को खबर नहीं। तप में लीन रहे, उनकी उपस्थिति  में भी। तीनों देवों ने उन्हें तपस्या से उठने को कहा। ये उन्हें देखकर दंग रह गए, गिर पड़े उनके चरणों में। तीनों पहले प्रसन्न थे। जब और अधिक प्रसन्न हो उठे तथा वर मांगने को कह दिया। कोई सांसारिक इच्छा न थी, कोई चाह न थी। ब्रह्माजी की संतानोत्पादन की आज्ञा जरूर याद थी। दोनों ने एक स्वर में मांग लिया, आप तीनों महादेव हमारी संतान के रूप में हमारे घर आएं, यही प्रार्थना है। तथाऽस्तु कहकर तीनों देव अंतर्ध्यान हो गए। समय बीता उपयुक्त अवधि के बाद तीनों ने अनसूया के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। भगवान विष्णु ने दत्तात्रेय के रूप में अंश अवतार लिया। चंद्रमा ब्रह्मा के अंश अवतार हुए और तीसरे दुर्वासा ऋषि शंकर जी का अंश अवतार धारण कर अत्रि तथा अनसूया के आंगन में खेला करते। इन पुत्रों के दर्शन और वात्सल्य ने पति-पत्नी को अपार प्रसन्नता व आनंद प्रदान किया। अनसूया बालकों के लालन-पालन और  चरित्र निर्माण में व्यस्त रहने लगीं। माता अनसूया ने श्रीराम के वनगमन के समय सीताजी को उपदेश भी दिया था।  अत्रि ऋषि तथा अनसूया के विषय में कुछ अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं। उनमें से मुख्य ये हैं। अनसूया कर्दम ऋषि की बेटी न होकर दक्ष प्रजापति की बेटी थी। सूर्य और राहु की बनती न थी। राहु के मन में सूर्य के विरुद्ध आग लगी रहती थी। वह सूर्य से बदला लेने के लिए आक्रमण कर बैठे। सूर्य उखड़कर गिर पड़े। महर्षि अत्रि को पता चला, तो सूर्य की रक्षा की। वरना विश्व जीवन व प्रकाश से वंचित हो जाता। अत्रि ऋषि को तप की अवस्था में पाकर दैत्यों ने उन्हें उठाकर शतद्धार यंत्र में डाल कर आग लगा दी। अश्विनी कुमार आए और अत्रि को बचा लिया। गुणों के लिहाज से अत्रि ऋषि शांत, शतील और अमृतमयी थे। मूर्तिमान होकर आज भी चंद्रमा के रूप में शीतलता बरसाते हैं। अत्रि संहिता एक विख्यात स्मृति है। यह कर्त्तव्य पालन की सीख देती है। महर्षि अत्रि का वर्णन अनेक धार्मिक ग्रंथों में व उनकी जीवनी सभी आर्षग्रंथों में भी उपलब्ध है।

अंगिरा ऋषि

इनकी गणना भी प्रजापतियों में तथा ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में होती है। अपने जप-तप के बल पर इनका तेज अग्नि से भी अधिक हो चुका था। एक रोचक कथा मिलती है कि एक समय अग्निदेव जल में रहकर खूब तप किया करते थे। लोग अग्नि से अधिक अंगिरा के ताप व तेज को मानने लगे थे। अपनी स्थिति को जानकर अग्निदेव ने महर्षि अंगिरा से भेंट कर अपने मन का दुःख सुनाया और कहा, महर्षि अब आप ही अग्नि का कार्य करें। महर्षि अंगिरा ने बड़े ही शांत मन से कहा, नहीं मैं आज से तुम्हें अपने पुत्र के रूप में वरण करता हूं। तुम्हारे रास्ते में आई हर रुकावट को दूर कर दूंगा। निश्चित होकर जाओ। अग्नि के रूप में सभी देवताओं को उनका प्रिय भोजन पहुंचाओ। जो स्वर्ग जाना चाहें, उनका रास्ता प्रशस्त करो। मुमुक्षुओं का अंतःकरण शुद्ध करने के लिए अपनी ज्योति का प्रयोग करो। पुत्र जाओ, हर संताप को मन से निकाल दो। तब अग्नि को बृहस्पति के रूप में अंगिरा का पुत्र माना जाने लगा तथा बृहस्पति को खूब सम्मान भी मिला।            

 - सुदर्शन भाटिया