Wednesday, September 18, 2019 05:30 PM

एक अजब-गजब दास्तां

सुरेश सेठ

साहित्यकार

वह विजय गर्व से मदमा रहे थे। जयघोष करने वालों का अपार जनसमूह उमड़ आया था। वह इन्हें अभयदान देते हुए मंद-मंद मुस्करा रहे थे। यह अभयदान इस देश का वह स्वर्णिम युग लौटा लाने के उनके उस वचन में छिपा था, कि जब इस देश की डाल-डाल पर सोने की चिडि़या बसेरा करती थी। इस युग को गुजरे न जाने कितनी सदियां बीत गइर्ं। अब तो इन डालों पर सोने की चिडि़या कहां कोई दुबली-पतली मरियल चिडि़या भी पंख फटफटाती नजर नहीं आती। बहुत व्याग्रता से तलाश करने जाओ तो यहां-वहां कौए कायं-कायं नुमा भाषण प्रसारित करते नजर आते हैं। सुना है समय परिवर्तन के साथ इन कौओं की उम्र और भी लंबी होती जा रही है। कहीं-कहीं कुछ उदास कबूतर भी इन कौओं को अदलक निहारते दिखाई दे जाते हैं। उन्हें कौओं का यह कर्कश स्वर मधुर लुभावने भाषणों जैसा लगता है। उसे सुन वह अपनी गुटरगूं भी भूल जाते हैं। ऐसा नहीं कि अपने देश में इन कबूतरों की संख्या कम है। जहां कम हो वहां चंद कौए उन्हें नामालूम कोटरों से आयात कर लाते हैं। ये मौन निस्पंद कबूतर अपने पंखों में सिर दे जीते हुए कौओं को अपना रहनुमा मान चुके हैं। उन्हें उनकी चिल्लाहट में ही अपने लिए सपनों की नई बैसाखी सजनी नजर आती है। बहुत दिन से बैसाखी पर इस देश के खेत खलिहानों में लहराती फसलों के साथ बजते ढ़ोलक की थाप मंद हो गई। भांगड़ा नाचते कदम मंद होते-होते बेजान हो गए। लोगों ने कहा हमारी बैसाखी बेजान हो गई। कहां तो फसलों की लागत पर उसका आधा भाग लाभ के रूप में अदा करने का वचन था, और कहां उधार ले कर खर्च कर फसल पर लगा पैसा भी घर लौटता नजर नहीं आता। जब मेहनत की लागत ही कौडि़यों के भाव गिनी जाए, तो उस पर लाभ क्या मिलेगा? क्या मिट्टी और क्या मिट्टी का शोरबा, लेकिन इस देश के करोड़ों कबूतर बन गए लोग शोरबा नहीं खाते। शोरबा क्या यहां तो एक जून रोटी भी अधिकांश को नसीब नहीं। उन्हें कबूतर बनने का रास्ता नजर आया, इसलिए सैकड़ों कबूतरबाज उनके शहरों के गलियों और बाजारों में कबूतरबाजी करने के लिए उतर आए। उन्हें स्वर्ण विहान में बिठा कर दूसरी दुनिया तक पहुंचा देने का मृग जाल बिछाते। फिर पता चलता अरे इन कबूतरबाजों ने तो हमें अपनी जो चल गुलेल पर रख कर समुद्र पार करवाने का जो यत्न किया वह भोथरा था। बहुत बार गुलेल से चले पत्थर भी अपने निशाने तक नहीं पहुंचते। कहीं बीच में गिर रास्ते के अथाह समुद्र में डूब जाते हैं। यह डूबना किसी नौका के उलटने से मिली मौत हो सकता है, या किसी विदेशी हवाई अड्डे से उतरते ही अंधेरे कैदखाने द्वारा स्वागत। कबूतर ही रहे, यहां आकर भी इस देश के हरियत तोते नहीं बन सके। अब अपने देश वापस जाओ, और अपने देश के सुविधा केंद्रों में असुविधा की कतारों में खड़े उदास कबूतरों की कतारों जैसे खड़े हो जाओ। ये तो अब गुटरगूं करना भी भूल चुके हैं।